मधुर द्वंद्व प्रकृति और पुरुष का बस यूं ही चलता रहे, जय पराजय से परे रति अनंग कौतुक यूं ही फलता रहे

ठीक मध्याह्न में व्याप्त सांध्यकालीन अंधकार,
शीत अपने नित्य अधिकार को पुख्ता करने में रत,

प्रभात में हुई “चरित्रहीन” वर्षा और उसका कानन पुत्र यह तीव्र प्रगालक शीत,
अस्थियों तक विजय चिह्न आरोपण को आतुर, क्लांत शीत,

ऊष्मा को तारणहार की तरह ताकती देह,
लिहाफ को प्रिय की तरह चाहती देह,
स्थायी समाधान हेतु राह को नापती देह,

ऐसे में विरह से व्याकुल देह जैसे चिरशीतनिशा में मार्ग पर सोता कोई कालहत:,
भासहीन गड़गड़ाते मेघ, पवन, तड़ित सब शीत के संग सँझीकृत,

हे प्रिये! क्या यह उचित समय है स्वार्जित विरह का?
सहज नहीं यह, लगता प्राणदंड हो जैसे अप्रिय जिरह का,

विरह की अग्नि भी हो जैसे मिल गई अब शीत से,
देखो अग्नि भी अब कैसे जमा रही अंग नवरीत से,

विचलित हो आत्मरक्षार्थ विकल्प विचार को उद्यत,
करूं मानसिक आह्वान वसंतसेना, लावण्या सम्मत,

करूं प्रकल्प दिव्य देहो के साथ रमण के साहित्यिक छल का,
हो प्रकट प्राणरक्षक ऊष्मा हरले शीत देकर वर कामज्वर का,

नीरव, उन्मत्त, काननों में कुसुमाकर का राज हो,
शीतोष्ण से परे मात्र प्रणयध्वनि बजाते साज हो,

लावण्य के आधिक्य से विपुलित वसंतसेना सज्ज हो,
उन्नत पयोधर, सुतल उदर नेत्रों में स्वयं मकरध्वज हो,

वक्र कटि अत्यल्प होकर नितंबो को दर्शित करें,
शोभा मुखमंडल की स्वयं चंद्रमा को मूर्छित करें,

गजगामिनी होकर के जब वह मेरी ओर चली आये,
मन्मथाधीन विस्मित इंद्रियां ज्यो स्वतः ही छली जाये,

अनावृत विग्रह की ऊष्मा दृष्टि की शीतलता से लड़े,
मृगशावकों सी चंचल अंगुलिया तनश्रृंगों पर जा चढ़े,

रसास्वादन को मधुरस प्रतीक्षा में जिह्वाग्र अतिव्याकुल हो,
स्वर्ण मोतीक्य चुगने ज्यों मानसरोवर में हंसो के संकुल हो,

क्रीड़ा हो निसंकोच, चुम्बन, दमन, घर्षणमय आक्रमण की,
भुजंगयुग्म ज्यों नृत्यमग्न हो प्रणयधुन पर बीन की,

स्पर्श हो आहुतियों से, रोम रोम ऊष्मामंत्र जप रहे हो,
स्वेद से पूरित हो देह ज्यूँ ज्येष्ठ भास्कर तप रहे हो,

मधुर द्वंद्व प्रकृति और पुरुष का बस यूं ही चलता रहे,
जय पराजय से परे रति अनंग कौतुक यूं ही फलता रहे,

हर चेतना को प्रदत्त निजी, नित्य, नव संसार है,
सृजन-लय, प्रणय-विरह का रचनाकार को अधिकार है।।

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