काश्मीरीय शैव-दर्शन : भाग 2

प्रातः स्मरणीय, वंदनीय श्री म. महो. गोपीनाथ जी कविराज की पुस्तक का दूसरा अंश, गतांक से आगे

3. प्रत्यभिज्ञासम्मत अद्वैतवाद

यद्यपि आगम और उपनिषदों में द्वैत, अद्वैत, द्वैताद्वैत प्रभृति सभी प्रकार के दार्शनिक वादों के मूल सूत्र देखे जाते हैं, तथापि अधिकार-भेद एवं रुचि-वैचित्र्य के कारण कोई-कोई प्रस्थान किसी एक विशेष सिद्धान्त की प्रधानता स्वीकार करके प्रवर्तित होते हैं.

शंकर, रामानुज, मध्व प्रभृति आचार्यों के उपनिषद और गीता पर किये हुए भाष्यों की तुलनात्मक आलोचना करने से यह बात भली भांति समझ में आ सकती है. यह अवश्य ही स्वभावतः ही होता है. सभी देशों के आध्यात्मिक शास्त्रों के इतिहास में इसके दृष्टांत हैं.

[काश्मीरीय शैव-दर्शन : भाग 1]

इसी प्रकार, आगम की व्याख्या के प्रसंग में काश्मीरीय शैवाचार्यों ने अद्वैतवाद को ही ग्रहण किया तथा इस वाद का महात्म्य दिखलाने के लिए वे एक अभिनव दर्शन-शास्त्र का निर्माण कर गए. भारतीय दर्शन-शास्त्र के इतिहास में यह अद्वैत-सिद्धान्त ईश्वरवाद नाम से प्रसिद्ध है. आचार्य अभिनवगुप्त इस सिद्धांत के सर्वश्रेष्ठ व्याख्याता हैं.

4. अद्वैतवाद के प्रकार-भेद

आचार्य गौड़पाद ने मांडूक्य-कारिका में एवं आचार्य शंकर ने शारीरक सूत्र और उपनिषदादि के भाष्य में ब्रह्माद्वैतवाद की जो व्याख्या की है, आजकल साधारणतः अद्वैतवाद शब्द के एकमात्र अर्थरूप में उसी को लिया जाता है. कहना न होगा कि यह सिद्धांत समीचीन नहीं है.

अद्वैत-प्रस्थान के अनेक प्रकार हैं. ब्रह्मवाद उन्हीं के अन्तर्गत एक मतविशेष मात्र है. श्रीकंठ, रामानुज, वल्लभ प्रभृति के सिद्धांत शुद्ध अद्वैतमत नहीं हैं, यह बात ठीक है; परंतु शुद्ध अद्वैतवाद का भी भारतीय दर्शन-शास्त्र के इतिहास में कभी अभाव नहीं था.

बौद्ध अद्वैतवादी थे. बुद्धदेव का ‘अद्वयवादी’ भी एक नाम था, इसका उल्लेख अमरकोष में पाया जाता है. यद्यपि ‘कथावत्थु’ नामक ग्रंथ में अनेक प्रकार के, विशेषतः अष्टादश भाग में विभक्त बौद्ध सम्प्रदाय के, दर्शन और धर्मसंबंधी मतों का वर्णन है और यह सब परस्पर-विरोधी मत आगे चलकर सौत्रान्तिक, वैभाषिक, योगाचार, और माध्यमिक – इन चार प्रधान श्रेणियों में अंतर्निहित हो जाते हैं, तथापि इन सभी मतों का तात्पर्य माध्यमिक-प्रदर्शित शून्यवाद में है, इस बात को बोधिचित्त-विवरणकार ने स्पष्ट शब्दों में स्वीकार किया है –

“भिन्नापि देशनाsभिन्ना शून्यताद्वयलक्षणा.”

यह शून्यवाद कठोर अद्वयवाद है. सत्, असत प्रभृति कोटिचतुष्टय से विनिर्मुक्त कर तीक्ष्ण युक्तियों की सहायता से नागार्जुनादि आचार्यगण इस शून्य तत्व को द्वैत-विकल्प से सब प्रकार बचाने का प्रयास करते हैं.

बहुतों का विश्वास है कि स्वयं शंकराचार्य अपने ब्रह्माद्वैतवाद के लिए विज्ञानाद्वैत अथवा शून्याद्वैत सिद्धांत के सामने ऋणी हैं. बौद्धागम की ‘संवृति’ शंकर के दर्शन में ‘माया’ रूप में स्थान पाती है. दार्शनिक दृष्टि से शंकर की ‘माया’ प्राचीन आर्ष माया से कुछ अंश में विलक्षण है, इसे स्वीकार करना होगा.

फ्रांस देश के सुविख्यात अध्यापक पूसें (Poussin) ने वेदान्त और बौद्धमत की तुलनात्मक आलोचना प्रसंग में गौड़पादकारिका में बौधभाव का प्रभाव प्रदर्शित किया है. पण्डितवर विधुशेखर शास्त्री महाशय ने इसे और भी स्पष्ट करके दिखालाया है.

यद्यपि शंकर योगाचार और माध्यमिक मत का खंडन करते हैं, तथापि अनेक स्थलों पर वे स्वयं उनकी उद्भावित युक्ति, यहां तक कि भाषा भी, ग्रहण करने में नहीं हिचकते हैं.

बौद्धमत और शंकर मत के बीच में केवल एक ही पद का व्यवधान है. परंतु, इस विषय में एक बात याद रखनी होगी. भारतवर्ष में बौद्धमत भी कोई नवीन मत नहीं है. जो यह समझते हैं कि शून्यवाद नागार्जुन द्वारा प्रवर्तित हुआ, पहले ऐसा मत नहीं था, वे महासंघिक मत और उपनिषदादि की आलोचना करने पर एवं आगम की प्राचीनता के संबंध में विचार करने पर यह समझ सकते हैं कि नागार्जुन ने किसी नए सिद्धांत का प्रवर्तन नहीं किया है. पहले जो अस्पष्ट एवं आभासरूप में था, उसी को उन्होंने केवल स्पष्ट और प्रणालीबद्ध कर दिया.

वैयाकरण भी अद्वैतवादी थे. “वाक्यपदीयकार” ने मुक्त कंठ से कहा है कि व्याकरण का सिद्धांत अद्वैतवाद है. व्याकरण के मत से अखंड चिन्मय शब्द-तत्व ही जगत का मूल कारण है, यह एक और अभिन्न है.

त्रिपुरा-सम्प्रदाय भी अत्यंत कट्टर अद्वैतवादी है. इनके मत से मूलतत्व महाशक्ति एक एवं अद्वितीय है. इन सब अद्वैतवादों की विशेषता तथा इनके पारस्परिक संबंध की आलोचना का यहां स्थान नहीं है. परंतु, इन सब सिद्धांतो से यह स्पष्ट ही समझा जा सकता है कि प्राचीन काल में अद्वैतवाद के अनेक प्रकार के प्रस्थान थे. ब्रह्माद्वैत के साथ साथ शून्याद्वैत, शब्दाद्वैत, शाक्ताद्वैत, ईश्वराद्वैत प्रभृति विभिन्न प्रकार के अद्वैत-सिद्धांत उस समय प्रचलित थे.

निगम और आगम – वेद और तंत्र दोनों में अद्वैतवाद था, द्वैतवाद भी था, इस विषय में कोई संदेह का कारण नहीं है. वैदिक सिद्धांत का मूलस्थान प्रधानतः उपनिषद एवं तदवलम्बी दार्शनिक सूत्रग्रंथ – विशेषतः ब्रह्मसूत्र हैं.

तांत्रिक सिद्धांत में आकर ग्रन्थ प्राचीन आगमराशि तथा शिवसूत्र, शक्तिसूत्र, परशुरामकल्पसूत्र प्रभृति सूत्रमाला है. शैव, वैष्णव, शाक्तादि भेद से आगम नाना प्रकार के थे. पाञ्चरात्र और भागवतमत वैष्णवागम-मूलक हैं.

प्रत्यभिज्ञा और स्पन्द शास्त्र, अर्थात काश्मीरीय त्रिकदर्शन, दक्षिण देश के सिद्धांत-शास्त्र प्रभृति तथा व्याकरण शैवागम से उद्भूत होते हैं. त्रिपुरादि सिद्धांत शाक्तागममूलक हैं. अवश्य ही प्रत्येक सम्प्रदाय के आगमो में भी अनेक प्रकार के विभाग हैं.

क्रमशः

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