भारत में भी लिबरल ‘वायरस’ को फैलाने की फिराक में ओबामा

लिबरल वायरस से ग्रस्त ओबामा ने भारत में आकर सरकार को सलाह दी कि वो अपने देश की शांतिदूत आबादी का विशेष ख्याल रखें.

उनका मतलब यह था कि शांतिदूतों को 70 साल से मिले दामाद वाले दर्जे में किसी प्रकार की कोई कमी नही आना चाहिये.

घाघ लिबरल आज पूरी दुनिया में इन शांतिदूतों के लिये रात दिन दुबले हुऐ जा रहे हैं कि इनको किसी प्रकार की कोई असुविधा तो नहीं हो रही.

ये लिबरल हर वो उपाय और कानूनी व्यवस्था कर रहे हैं जिससे इन शांतिदूतों को अपनी योजना को अमली जामा पहुंचाने में कोई कमी न आये.

इसका ज्वलंत उदाहरण न्यूयॉर्क के राज्य प्रशासन का हालिया निर्णय है… उजबेकिस्तान से अमेरिका आऐ ISIS के आतंकवादी सैफुल्ला सैपोव ने 31 अक्टूबर को न्यूयॉर्क की सड़कों पर ट्रक से हमला कर 8 लोगों को कुचलकर मार डाला…

तब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और राष्ट्रवादी नागरिकों ने उसके लिये फांसी की मांग की… किंतु सैफुल्ला को फांसी न हो जाए इसके लिये न्यूयॉर्क के राज्य प्रशासन ने मृत्युदंड के प्रावधान को ही कानून बनाकर खत्म कर दिया… नागरिक भले ही मरते रहें पर शांतिदूत आतंकवादी को मृत्युदंड नहीं होना चाहिये…

यहीं हाल जर्मनी की लिबरल चांसलर एंजेला मर्केल का है… यूरोप की इस मोमता बानो ने अपने वोटबैंक को पक्का करने के लिये अब तक लाखों इराकी-सीरियाई शरणार्थियों को अपने देश में बसा लिया हैं और ये संख्या बढ़ती ही जा रही है…

हालत ये हो गयी है कि जिस तरह भारत के पश्चिम बंगाल के अनेक गांवों, शहरों और जिलों में हिंदू/भारतीय अल्पसंख्यक हो गये हैं वैसी ही स्थिति जर्मनी में बनने लगी है…

जर्मनी के लोअर सक्सनी प्रांत के सल्जगिटर शहर में शांतिदूत शरणार्थियों की वजह से वहां के अनेक स्कूलों में शांतिदूत विद्यार्थियों की संख्या 60 से 80% तक पहुंच गयी हैं… स्थानीय जर्मन विद्यार्थी और नागरिक अल्पसंख्यक होने की कगार पर पहुंच गए हैं…

अनेक शहरों में उपद्रव, हिंसा और बलात्कार होना अब एक सामान्य बात हो गयी है… स्थानीय नागरिक अपने भविष्य, जानमाल और नौकरियों को लेकर चिंतित और भयभीत हो उठे है…

पर एंजेला मर्केल लगातार शरणार्थियों को जर्मनी में बसाकर पूरे देश के जनसंख्या संतुलन को बिगाड़कर अपने पक्ष में करने में लगी हुई हैं… ताकि उनका वोटबैंक पक्का हो जाये और वो सालों साल जर्मनी पर राज करती रहें…

वो तो भला हो अमेरिकी मतदाताओं का जिन्होंने हिलेरी क्लिंटन को हराकर डॉनल्ड ट्रम्प को चुन लिया, नहीं तो जो हाल आज जर्मनी का हो रहा है वहीं हाल अमेरिका का हो गया होता…

हिलेरी की मुख्य सलाहकार हुमा आबेदिन पाकिस्तान मूल की थी… और यदि हिलेरी चुनाव जीत जाती तो आबेदिन चीफ ऑफ स्टाफ बन जाती और तब अमेरिका बड़ा पाकिस्तान बन जाता…

राष्ट्रवादी अमेरिकी मतदाताओं ने खतरे को भांपकर डॉनल्ड ट्रम्प को सत्ता सौंप दी… पर अमेरिकी मीडिया, प्रशासन, न्यायपालिका, सीनेट, प्रतिनिधि सभा में बैठे घाघ लिबरल लगातार ट्रम्प की राह में कांटे बिछा रहे हैं…

इन लिबरलों का एक ही उद्देश्य हैं- “दुनिया चाहे बरबाद हो जाये… आतंकी भले ही विमानों से हमला कर ट्विन टॉवर गिरा दे… पर इन शांतिदूतों को खरोंच नहीं आना चाहिये…”

यहीं कारण है कि न्यूयॉर्क राज्य में मृत्युदंड को ही समाप्त कर दिया गया… अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव में असफल होने के बाद बिल और हिलेरी क्लिंटन के ‘चेले’ बराक ओबामा अब भारत में उन लिबरल वायरस को फैलाना चाहते हैं जो 2014 में मौनी बाबा की सरकार के विदा होने के बाद भारत में प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं…

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