मसीही धर्म शिक्षा भाग – 5 : ‘बाईबल’ को जानिये

‘पुराने-नियम’ का मसला सुलझने पर आया तो नये-नियम के किताबों का मसला सामने आ गया. ‘नया-नियम’ को लेकर और भी समस्या शुरू हो गई. जामनिया की धर्मसभा से भी अधिक खून-खराबा Nicea की धर्मसभा में हुआ.

ईसा मसीह का जन्म, उनका अज्ञातवास, कथित सूलीकरण, उनका पुनर्जीवन और फिर आसमान पर उठाये जाने या भारत आने की मिथक कथाओं के बीच ईसा के आरंभिक शिष्यों में काफी मतभिन्नताएं थी.

[मसीही धर्म शिक्षा भाग – 1 : ‘बाईबल’ को जानिये]

ये बड़ा हैरतनाक है कि ईसा ने जिन बारह शिष्यों का चयन किया था उसमें एक भी उनके प्रति वफादार नहीं था. लोग तो ईसा के बारह शिष्यों में से केवल जुडास (यहूदा) को ही ईसा को धोखा देना वाला मानते हैं.

पर सच ये है कि उनका एक भी शिष्य संकट की घड़ी में उनके साथ खड़ा नहीं था. मार्क, 14:50 में इसका वर्णन करते हुये कहा गया है, Then all his disciples deserted him and ran away.

[मसीही धर्म शिक्षा भाग – 2 : ‘बाईबल’ को जानिये]

मसीह ईसा अपने शिष्यों के इस व्यवहार से बड़े आहत थे और ये दर्द उन्हें सारा जीवन रहा. उनका दर्द ये था कि संकट की घड़ी में उन बारह में कोई एक भी उनके साथ खड़ा नहीं हुआ. E.Thelma Johnson ने तो मसीह के इस दर्द को आधार बना कर ‘जीसस इन टीयर्स’ नाम से एक पूरी किताब लिख दी.

यानि ईसा के बारह शिष्यों में से कोई भी उस सूलीकरण वाली घटना का eye and ear-witness नहीं था, कोई भी ईसा के प्रति पूर्ण वफादार नहीं था इसलिये उस घटना के बाद से ही उनके शिष्यों ने अपने-अपने हिसाब से मसीह ईसा की जीवन-गाथाएँ लिखनी शुरू की और उनके उपदेशों का संग्रहण आरम्भ कर दिया.

[मसीही धर्म शिक्षा भाग-3: ‘बाईबल’ को जानिये]

हुआ ये कि सूलीकरण के करीब तीन सौ साल के अंदर-अंदर ईसा के जीवन और उपदेशों पर आधरित करीब 104 सुसमाचार रचे गए, जिनमें आपस में जबर्दस्त मतभिन्नताएं थी. किसी भी दो सुसमाचार की विषय वस्तु एक सी नहीं थी.

परिणाम ये हुआ कि एक मत या मंथ के रूप में ईसाईयत को स्थापित करना असंभव हो गया. 325 ईसवी में ईसाइयत को धराशायी होता देखकर उसे फिर से एक करने हेतु उस समय के रोमन सम्राट Caesar Flavius Constantine ने Nicea नाम के स्थान पर ईसाई मत के तमाम विद्वानों की एक सभा बुलाई, जिसे इतिहास में “Council of Nicea” के नाम से जाना जाता है.

[मसीही धर्म शिक्षा भाग – 4 : ‘बाईबल’ को जानिये]

इस बैठक के बुलाने के एक उद्देश्य तो ईसाईयत के भीतर के झगड़ों का समाधान खोजना था और इसके बाकी उद्देश्यों में ईसा के धर्मशिक्षाओं में से सही और गलत का चुनाव करना था. यहाँ ये भी तय किया जाना था कि ईसा पैगंबर थे या खुदा के बेटे, साथ ही ईसा के जीवन तथा ईसाई त्योहारों की तिथियाँ भी निरुपित की जानी थी.

नीसिया के इस धर्मसभा में 300 बिशप तथा 104 दस्तावेज मौजूद थे जिसमें हरेक का दावा था कि उसका सुसमाचार ही सबसे प्रमाणिक और सत्य के करीब है. इस धर्मसभा में झगड़े शुरू हो गए और सिर्फ 18 लोगों के बहुमत से नये-नियम के नए स्वरुप को थोप दिया गया.

इसमें केवल मैथ्यू, मार्क, लूका और जॉन नाम के चार लोगों के सुसमाचारों को ही शामिल किया गया और बाकी सुसमाचारों को Constantine ने नष्ट करवा दिया.

इसका अर्थ ये है कि वर्तमान ‘नया-नियम’ मूल या प्रामाणिक है ऐसा दावा नहीं किया जा सकता क्योंकि बिना किसी आधार के ‘नीसिया धर्मसभा’ में 100 सुसमाचारों को ख़ारिज कर दिया गया था और उन्हें जबरन नष्ट करने की कोशिश की गई थी.

इन सुसमाचारों में ‘मेरी मेगडेलेन’ की लिखी हुई गॉस्पेल भी थी….

जारी…

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