घोघाबापा का प्रेत – 11

गतांक से आगे…

इतनी विशाल यवन सेना को सिर्फ पुरुषार्थ के बल पर, तीन दिन में ही घुटने टेक देने को मजबूर कर देने से हिन्दू सेना में चहुँ ओर प्रसन्नता व्याप्त थी. लोग ख़ुशी के मारे फूले नहीं समा रहे थे. यवन सेना की सिमटती छावनियां विजय हर्ष को और भी अतिरेक कर रही थीं.

उधर यवनों के खेमे में मुर्दनी छाई हुई थी. सैनिक, सिपहसालार इत्यादि सब घुटनों पर बैठ कर अल्लाताला से दुआ मांग रहे थे. उनके ह्रदय की जैसे चेतना ही लुप्त हो गई थी. महमूद गजनवी ने अपने अंगरक्षकों से कह दिया था कि, “मुझे किसी से भी कोई बात नहीं करनी है. जो भी दरवाजे पर आये उसको भगा देना”.

वो अपनी हार से इस कदर लज्जित था कि वापस जाने के नाम से उसके सीने पर सांप लौट रहे थे. लेकिन अब कोई और चारा ही न रहा. अब तो विश्वविजेता महमूद गजनवी की कीर्ति पताका चंद हिन्दू वीरों के घोड़ों के खुरों तले निर्ममता और निर्दयता से रौंदी जा चुकी थी.

[घोघाबापा का प्रेत – 1]

पूरी रात महाराज धर्मगजदेव के गुप्तचरों ने सतर्कता से यवन सेना की प्रत्येक गतिविधि की सूक्ष्मता से जांच की. उन्होंने यही पाया कि उनकी हिम्मत टूट गई है. और कल सायंकाल तक वो वापस होने लगेंगे.

महाराज ने कुछ सैनिकों को अजमेर किले में रात में भेज कर हिन्दुओं की जीत की सूचना भिजवा दी, तथा राजपुरोहित को किले से अपने पास, पुष्कर की सैनिक छावनी में बुलवा लिया.

यह शुभ समाचार पाकर रात भर किले में ढोल नगाड़े बजते रहे. लोग उल्लासित होकर नाचते गाते रहे. किले में स्थित प्रत्येक निवासियों ने अपने घरों के आगे घी के दीपक जलाए. गौ, ब्राह्मण और किले में प्राण प्रतिष्ठा से स्थापित कुलदेवी शाकम्भरी की आरती की गई. नाच, गाना, गीत, गद्य, पद्य, मद्य इत्यादि से हर कोई अपने अपने तरीके से खुशियाँ मनाया.

[घोघाबापा का प्रेत – 2]

अजमेर के प्रसिद्ध सूफी संत शाह मदार के अड्डे पर कुछ हिन्दू भक्त लोग बैठे थे. शाह मदार की अजमेर और आसपास के इलाकों में दिव्य संत की मान्यता थी. वे किसी से कभी कुछ मांगते नहीं थे. जो भी रुखी सूखी मिल जाती थी, उसी को खा कर अपनी कुटिया में पड़े रहते थे.

अगर कोई भक्त बहुत अच्छा भोजन, मिठाई इत्यादि ले आये तो उसी को प्रसाद में बंटवा देते थे. किसी ने कुछ धन दिया तो गरीबों को दे आते थे. मस्तमौला और फक्कड़ स्वाभाव की वजह से वो सादगी की मूर्ति के समान सबके हृदय में बस गए थे. लोगों के दुखों को दूर करने के लिए अपने परवरदिगार से दुआ करते रहते थे. लोगों को भभूत, भस्म, गंडे, ताबीज़ इत्यादि दिया करते थे.

शाह मदार आज कुछ प्रवचन नहीं दे रहे थे, बस शांत गंभीर मुद्रा में आँखें बंद किये हुए बैठे थे. धीरे धीरे रात गहराने लगी तो शिष्यगण (सारे हिन्दू ही होते थे) शाह मदार को प्रणाम करके, एक एक कर उठ कर चले गए.

[घोघाबापा का प्रेत – 3]

आखिरी बचे दो लोगों ने संत के पैर छूकर प्रणाम किया, तो उन्होंने आँखें खोल कर देखा. दोनों को पहचान कर अपनी कुटिया में जाने का इशारा किया, और खुद दरवाजे पर बैठ गए ताकि कोई अवांछित मनुष्य कुटिया में प्रवेश न कर पाए. अन्दर एक छब्बीस सत्ताईस साला युवक व्याकुलता से बैठा हुआ था. उसकी वेशभूषा राजसी थी, और उसकी पगड़ी से वो सम्मानित पदाधिकारी प्रतीत होता था.

उसने रोषपूर्ण मुद्रा में कहा, “सुल्तान हार गया है, और कल वापस चला जायेगा तो मेरे वायदे का क्या होगा?”

एक आगंतुक जो कि हिन्दू वेशभूषा में सुल्तान का सिपहसालार मसूद ही था, उसने कंधे लटका कर निराशा से कहा, “अब सुल्तान अपने वायदे को कैसे पूरा कर सकते हैं जब वो खुद हार चुके हैं. अब कुछ नहीं हो सकता है.”

[घोघाबापा का प्रेत – 4]

उस युवक ने कहा, “महाराज ने किले में से पुरोहित को बुलवाया है. वो पुष्कर में ही पूजा करेंगे कल और तत्पश्चात रणभूमि को छोड़कर अजमेर के किले में पहुंचेंगे. तुम सुल्तान से कहो कि एक जांबाज़ सिपहसालार और कुछ हजार दुर्जय योद्धाओं को तैयार रखकर अपनी छावनी अभी से ही हटाना शुरू कर दे. जब महाराज ब्रह्ममुहूर्त में उठकर पूजा करने के लिए जायेंगे, वही समय उचित होगा हमला करने के लिए.”

“लेकिन महाराज के सैनिक? वो तो ख़ुशी में और भी प्रचंड हैं. उनके सामने जब हमारी इतनी विशाल सुसज्जित सेना नहीं टिक पाई, तो ये कुछ हजार घुड़सवार क्या कर लेंगे?”

“सुल्तान को कहो कि हिन्दू सैनिकों की चिंता न करे. उनको रणभूमि से हटाना मेरी ज़िम्मेदारी है. वो बस तुरंत अपनी छावनियों को पीछे ले जाना शुरू कर दे, और अपना वायदा याद रखे.”

“सुल्तान को अपना वायदा याद है, शाह मदार इस बात के गवाह रहेंगे.”

[घोघाबापा का प्रेत – 5]

वो युवक महाराज धर्मगजदेव के प्रधानमंत्री का पुत्र सोढल था, जो उपसेनापति भी था. मुख्य सेनापति के इस युद्ध में वीरगति प्राप्त करने के बाद, महाराज के पश्चात अब सेना पर आदेश इसी का चलना था.

महाराज भी इसको अपने पुत्र के समान ही मानते थे. यह मरने से डरता था, इसलिए बीमारी का बहाना बनाकर युद्ध में भी नहीं भाग लिया था. कोई ख़ास वीरता का अब तक कोई कार्य भी नहीं किया था, जिससे युद्ध में किसी को इसकी याद आती, या आवश्यकता महसूस होती.

महाराज धर्मगजदेव ने, अपनी छावनी में उपस्थित मंत्रियों और योद्धाओं से हर्ष मिश्रित स्वर में कहा, “मुझे तो अभी भी विश्वास नहीं हो रहा है कि हम इतनी विशाल विश्वविजयी सेना को धूल चटा चुके हैं.”

[घोघाबापा का प्रेत – 6]

राजपुरोहित जी ने कहा, “किम आश्चर्यम राजन? महाभारत के वन पर्व (अरण्य पर्व) अध्याय के छब्बीसवें श्लोक में कहा गया है कि जो क्षत्रिय, ब्राह्मणों की रक्षा करते हैं, उनका सम्मान करते हैं उनकी कभी हार नहीं होती है. ब्राह्मण क्षत्रियों से और क्षत्रिय ब्राह्मणों से मिल जाएँ, तो दोनों प्रचंड शक्तिशाली होकर अपने शत्रुओं का उसी तरह विनाश कर देते हैं, जैसे अग्नि और वायु मिलकर समस्त वन को जला देती है. राजा बलि से लेकर, चन्द्रगुप्त तक ने यह साबित किया है कि योग्य ब्राह्मणों के वेदवाक्य की धवनियों का लेप अपने अस्त्रों पर चढ़ाकर क्षत्रिय विश्वविजयी हो जाता है.”

सभा में उपस्थित सभी जनों ने ‘साधु साधु’ का उच्चारण करते हुए राजगुरु को उठ कर प्रणाम किया और राजगुरु ने अपने दोनों वृद्ध हाथों को उठा कर आशीर्वाद दिया. तभी, रात्रि के दूसरे प्रहर में सोढल, महाराज धर्मगजदेव की सभा में पहुंचा.

[घोघाबापा का प्रेत – 7]

सोढल ने पहुँच कर महाराज को प्रणाम किया और बोला, “महाराज, मलेच्छों की सेना अबतक आधी वापस जा चुकी है, कुछ ही देर में बाकी भी लौट जायेंगे. मेरा विचार यह है कि अब सैनिकों को अपना सैनिक वेष त्याग देना चाहिए. तीन दिन से वो रात दिन भारी भारी कवच, ढाल, तलवार भाला इत्यादि धारण किये हुए हैं, अब उनको भी थोडा आराम मिलना चाहिए. तथा जो घायल हैं उन्हें तत्काल किले में भेजकर उपचार की व्यवस्था करनी चाहिए.”

महाराज ने मंत्रियों से हँस कर कहा, “वाह, देखो तो हमारे नए सेनापति को! यह तो अभी से अपने सैनिकों की चिंता में जुट गया लगता है. ठीक है, तुम जैसी चाहो व्यवस्था कर लो.”

सोढल महाराज को प्रणाम करके बाहर निकल आया. फिर पहले तो उसने घायलों के नाम पर सेना कम की. क्योंकि अब युद्ध में थोड़ा बहुत घायल तो हर मनुष्य हो जाता है. स्वयं महाराज भी महमूद के भाले से घायल ही थे.

उसने सभी सैनिकों को किले में भेजते हुए कहा, “यह तो हमारी अखंड जीत की रात्रि है, प्रसन्नता की रात्रि है. किले में हर चौराहे पर मद्य के के भांड रखवा दिए गए हैं. जी भर के खुशियां मनाओ और जी भर के मद्य पियो.”

[घोघाबापा का प्रेत – 8]

उसने महाराज के अंगरक्षकों और कुछ थोड़े और सैनिकों को ही छोड़ा. सामन्त की ‘प्रेत सेना’ ने तो महाराज के साथ ही रहने का वचन दिया था, इसीलिए उस टुकड़ी के भी युद्ध में बचे पैंतीस सैनिक महाराज के साथ रुके रहे. कुल सौ के आसपास लोग थे.

महाराज ब्रह्ममुहूर्त में राजगुरु के साथ पुष्कर के पवित्र तालाब के किनारे पूजा में बैठ गए. अभी सूर्य उदय होने में अधिक समय शेष था, अतः अँधेरा विद्यमान था. पूजा मन्त्रों के उच्चारण के बीच महाराज को कुछ संदिग्ध हलचल महसूस हुई.

इसी समय प्रहरी ने जोर की चिंघाड़ मारी, “विश्वास…..घा….त….”!! फिर उसकी चीख दब गई और ‘अल्ला-हू-अकबर’ की गर्जना उठती चली गई. महाराज के अंगरक्षक और प्रेत सेना, तुरंत महाराज की ओर भागे.

कुछ को बीच राह में ही बर्बर बलूच घुड़सवारों ने घेर कर मारना काटना शुरू कर दिया. लेकिन कुछ महाराज को घेर कर उनकी सुरक्षा में खड़े हो गए. महाराज ने भी वेदी से नीचे उतर कर नंगे बदन, केवल उत्तरीय ओढ़े हुए, अपने दोनों हाथों में तलवार थाम लिया.

[घोघाबापा का प्रेत – 9]

उन्होंने राजपुरोहित को वापस भेजना चाहा परन्तु वो गए नहीं और बोले, “राजन, अपने प्रजापालक राजा के लिए जान देना, मेरा भी कर्तव्य है. आज इस कर्तव्य से विमुख न कराएं.” कहते हुए वृद्ध राजपुरोहित ने भी अपने हाथ में तलवार उठा ली और शक्तिस्त्रोत का पाठ करने लगे.

शीघ्र ही बलूचों की सेना पास आ गई और महाराज पर टूट पड़ी. सभी हिन्दू सैनिकों ने अप्रतिम युद्ध किया, लेकिन एक एक करके वीरगति को प्राप्त होते गए. सैनिक अभी उन्नींदे ही थे, कोई कवच नहीं, जो जिस हाल में था वैसे ही उठ कर अपने राजा की सुरक्षा में भागा था.

बाकी सारी सेना को सोढल ने किले में पहुंचा ही दिया था. वे सारे मद्यपान में बेसुध थे. महाराज ने युद्ध करते हुए हर क्षण दूतों पर ध्यान लगाए रखा, पर सूचना यही मिल रही थी कि अभी तक किले का द्वार नहीं खुला, अभी सेना अजमेर के किले से बाहर नहीं निकली है.

धीरे धीरे महाराज को समझ आ गया कि आज उनका आखिरी क्षण आ पहुंचा है. उन्होंने बहुत कठिनता से कुछ प्रेत सैनिकों को राजी किया कि वे भाग कर सामंत के पास पहुंचें और उसको सूचना दें. ताकि वो कहीं जीत की ख़ुशी में ‘सोमनाथ को बचाने का’ अपना अभियान न शिथिल कर दे.

[घोघाबापा का प्रेत – 10]

बाकि सब सैनिक ‘हर हर महादेव’ का जयघोष करते हुए साका के लिए जूझ पड़े. महाराज को दस बलूच घुड़सवार घेर कर वार कर रहे थे. उनके अंगों से खून के झरने फूट पड़े थे. लेकिन साधनहीन राजा कितनी देर तक लड़ पाते, पीछे से एक तलवार उनकी गर्दन पर पड़ी और वे कटे वृक्ष की तरह धराशायी हो गए. राजपुरोहित पहले ही वीरगति को प्राप्त हो चुके थे.

‘प्रेत सेना’ ने अंगरक्षकों को महाराज और राजगुरु का पार्थिव शरीर लेकर जल्दी से किले में भिजवाया. और स्वयं अंतिम सांस तक लड़े. बलूचों ने यही योजना बनाई थी कि राजा के मरते ही सैनिक तितरबितर होकर भाग खड़े होंगे. लेकिन उनका सामना ऐसे योद्धाओं से आजतक हुआ ही न था, जो अपनी मातृभूमि पर जान न्योछावर कर देने के लिए साका करते हों.

प्रचंड युद्ध हुआ, महाराज के पार्थिव शरीर के पीछे लपकने वाले हर बलूच को हिन्दुओं ने काट डाला. अंग भंग होते रहे, साथी गिरते रहे लेकिन ‘हर हर महादेव’ का नारा आखिरी सैनिक के गिरने के बाद ही बंद हुआ. एक एक सैनिक दसों दुश्मनों को मार कर ही मरा.

अंदर किले में महाराज के पार्थिव शरीर पहुँचते ही हंगामा मच गया. अभी जो विजय की ख़ुशी में रास रंग चल रहा था, अचानक ही उसका स्थान करूण क्रंदन ने ले लिया. महारानी थोड़ी देर तक तो स्तब्ध रहीं. फिर रोती हुई अन्य स्त्रियों से एक गर्वीले स्वर में कहा, “अरी बावलियों, ये रोने में समय व्यर्थ न करो. शीघ्रता से अग्निरथ सजाओ और उसमें बैठ कर अपने अपने पतिधाम पहुंचो.”

पुरोहितों ने मन्त्र पाठ करते हुए चितायें सजवाईं, और फिर उस समय महल में उपस्थित हर स्त्री ने जलती चिता में कूदकर जौहर कर लिया. अग्निप्रवेश के समय किसी भी स्त्री की आँखों में आंसू की एक बूँद भी नहीं थी, वरन उनके मुखड़े दिव्य आभा से दमक रहे थे. वे इस विश्वास से पूर्ण थे कि मलेच्छों के गंदे हाथ उनकी दैवीय देह को छू नहीं सकेंगे कभी.

पौ फटते ही महमूद की सारी सेना ने मसूद के नेतृत्व में किले पर आक्रमण कर दिया. जितने भी पुरुष मिले, उनको लूटकर काट डाला गया. मद्य में लड़खड़ाते सैनिक कुछ प्रतिरोध ही न कर सके यवन सेना का, और सस्ते में कट मरे!!

कुछ दुर्भाग्यशाली औरतें, बच्चियां जो मिलीं उनका निर्ममता से बलात्कार करके मार दिया गया. कुछ औरतों ने तो अपनी बच्चियों का खुद गला घोंट कर मारने के बाद खुद को भी मार लिया.

मसूद जब महल के बाहर पहुंचा तो उसको वहां अनगिनत चिताएं ही जलती हुई मिलीं. महल के रक्षकों ने खूबसूरत और कीमती महल को स्वयं आग लगा दिया, जिससे मलेच्छ कुछ भी लूट न पाएं. हर ओर तबाही मचाकर यवन सेना किले से बाहर आई.

सोढल से सूचना मिली थी कि कीमती सामानों, हीरे सोने इत्यादि के साथ कम वय के युवराज को महाराज ने वीटली दुर्ग में भेज दिया है. मसूद ने अपने घुड़सवारों के साथ अल्प समय में ही पहुंचकर वीटली को घेर लिया. लेकिन जब सीधी खड़ी पहाड़ी पर बने दुर्ग को उसने देखा तो समझ आया कि इस दुर्ग को जीतने में महीनों लग जायेंगे. तत्पश्चात वो छावनी में सुल्तान के पास लौट आया.

कुछ समय पश्चात् महमूद की छावनी में सोढल को लाया गया. उसने कहा, “सुल्तान, अब अपना वायदा पूरा करें, और मुझे अजमेर का राजा घोषित करें.”

महमूद ने उससे पूछा, “तुम राजा क्यों बनना चाहते थे?”

“क्योंकि महाराज की एक पुत्री थी. जिसको मैं चाहता था, लेकिन वो मुझे नहीं पसंद करती थी. वो कहती थी कि न तो तुम कहीं के राजा हो, न ही तुमने आजतक कोई वीरोचित कार्य किया तो मैं तुम्हें क्यों वरूँ?”

“और महाराज के पुत्र? उनके पास सेना भी है. अगर बाद में उन्होंने तुम पर आक्रमण कर दिया तो? तुम हो तो एक कायर ही, लड़ तो सकते नहीं.”

इस अपमान से भी सोढल बिना अपमानित हुए ढिढाई से बोला, “युवराज तो अभी उम्र में बहुत छोटे हैं. और अगर भविष्य में ऐसा हो भी तो सुल्तान हमारी रक्षा करें. मैं इस सहायता की कीमत दूंगा.”

“अच्छा, महाराज ने तुम्हारे साथ कभी कुछ गलत किया था, जो तुमने गद्दारी की ऐसे महावीर के साथ? अब उनकी पुत्री तुमसे विवाह कर लेगी?”

“अफ़सोस कि अब भी मेरा विवाह राजकुमारी के साथ नहीं हो सकता क्योंकि उसने रानी के साथ ही जौहर कर लिया. और महाराज तो मुझसे पुत्रवत स्नेह रखते थे, उन्होंने कुछ भी गलत नहीं किया मेरे साथ. पर मुझे राजा बनना ही था, और इसके अलावा मैं किसी और तरीके से बन नहीं सकता था.”

सुल्तान ने कड़क कर आवाज लगाई, “मसूद, इस गद्दार के हाथ पैर बेड़ियों में जकड़ कर इसके गले में सन्देश लटका दो, जो जो इसने किया है. फिर वीटली दुर्ग के दरवाजे पर छोड़ आओ.”

सोढल काँप उठा ये सुनकर, वो सुल्तान के सामने हाथ जोड़कर जमीन पर लेट गया और रिरिया उठा, “माफ़ी जहाँपनाह, पर आपने तो वादा किया था मुझे राजा घोषित करने का. ये तो गलत है, ये जुल्म है सहायता करने वाले लोगों के लिए.”

सुल्तान ने कहा, “मैंने तुम्हें राजा घोषित करने का वादा किया था, तो घोषित कर दे रहा हूँ.” फिर वो मसूद से बोला, “मसूद, अजमेर के इस राजा को बांधकर वीटली दुर्ग पर छोड़ आओ.”

फिर वो सोढल से कहा, “मैंने अपना वायदा पूरा किया. अब एक वीर, अपने से वीर पुरुष के साथ गद्दारी करने वाले को सज़ा दे रहा है. सुल्तान वीरों का हमेशा सम्मान करता है. ये राजे महराजे, सुल्तानों और वीरों की बातें हैं, जो तुझ जैसे गद्दारों, धोखेबाजों की समझ में नहीं आएँगी.”

और इस प्रकार पुनः ‘महानता की श्रेष्ठ नौटंकी’ करके, महमूद ने अपनी सेना और अपने सिपहसालारों का दिल पुनः जीत लिया. उधर इस युद्ध में भी हिन्दू योद्धाओं ने अपनी गलतियों से सबक नहीं लिया और शुरू से सतर्क रहने के बावजूद अंत में ‘भरोसा करके क्षमा करने वाली गलती’ कर ही बैठे! जिसका परिणाम भयानक ही रहा है इतिहास में!!

क्रमशः…

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