तुकोजीराव महाराजा की दरियादिली

फोटो : विपुल विजय रेगे

इस रेलवे ट्रेक को मामूली मत समझिये. सन 1864 के बाद इसे बनाना शुरू किया गया था. इंदौर-महू के बीच के अत्याधिक दुर्गम क्षेत्र में रेल का जाल बिछाना अत्यंत दुरूह कार्य था. महाराजा तुकोजीराव (द्वितीय) ने 1864 में इस पर योजना बनाने का प्रयास किया था लेकिन रेलवे ब्रिटिश सरकार के अधीन आती थी.

तुकोजीराव ने कई बार इस योजना को लेकर बात की लेकिन ब्रिटिश पैसों की बात को लेकर ये प्रस्ताव टालते रहे. यूँ समझ लीजिये कि ट्रेक परियोजना का काम ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था.

अंग्रेज़ों को मालवा के इस अत्यंत दुरूह भाग से कुछ विशेष लेना-देना नहीं था. तुकोजीराव भी ज़िद के पक्के थे. उन्होंने उस ज़माने में भिखारी ब्रिटिशों को एक करोड़ के लोन का प्रस्ताव दिया.

महाराजा तुकोजीराव द्वितीय ने लगभग डेढ़ सौ साल इंदौर में रेल लाइन डालने की योजना बनाई थी, लेकिन जटिल रास्तों और अत्याधिक खर्च की वजह से इसे अमल में नहीं लाया जा सका.

उस वक्त देश में रेलवे पर ब्रिटिश एकाधिकार था. महाराजा ने भारत सरकार से अनुरोध किया कि इंदौर को खंडवा से रेल मार्ग के जरिए जोड़ दिया जाए. होलकर स्टेट और ब्रिटिश सरकार के बीच लगभग 6 साल तक इसे लेकर लिखा-पढ़ी चलती रही.

आर्थिक संकट का हवाला देकर ब्रिटिश सरकार ने परियोजना को रद्द करने का निर्णय लिया. महाराजा को खबर लगी तो उन्होंने ब्रिटिश सरकार को एक करोड़ रुपए की राशि लोन के रूप में देने की पेशकश की.

इस पर भी लुटेरों ने क़र्ज़ वापस करने के लिए सौ साल की मियाद मांगी. प्रजा के हितैषी राजा ने इस छल को भी लोक कल्याण के लिए स्वीकार कर लिया.

अँगरेज़ यही नहीं रुके. उन्होंने ब्याज भुगतान के बाद आमदनी का आधा हिस्सा भी मांग लिया. पहाड़ों को काटकर, बोगदे बनाकर, सर्पिलाकार रास्ते बनाकर पटरियों के लिए जगह बनाई गई. पुरे नौ साल तक ये काम चला. ब्रिटिशों का दिमाग/हमारा पैसा और कामगारों ने नौ साल में ये ट्रेक बनाकर तैयार किया.

मालवा के निवासियों के लिए इस ट्रेक पर रेल की सैर करना किसी हिल स्टेशन की सैर से कम रोमांचकारी नहीं होता. चोरल नदी के सानिध्य ने इस क्षेत्र को अनुपम प्राकृतिक सौंदर्य प्रदान किया है. 2016 में इस ट्रेक को रेल विभाग ने ‘हेरिटेज’ का दर्जा दे देकर हम पर बड़ा उपकार किया है.

क्रांतिकारी टंट्या भील की आत्मा आज भी इसी ट्रेक पर घूमती है. अंग्रेजों की नाक में दम करने वाला स्वतंत्रता सेनानी. कहते हैं आज भी आधी रात में यदि कोई ग्रामीण भटक जाए तो खुद टंट्या चले आते हैं बचाने को. यहीं आगे पातालपानी में उनका मंदिर भी है.

फोटो : विपुल विजय रेगे

टंट्या जी की समाधि, ये सर्पिलाकार पटरियां, अंधकार से भरे बोगदे हमें बहुत प्रिय हैं. यहाँ आकर लगता है समय ठहर गया है. फिर ट्रेन की सीटी तन्द्रा भंग कर देती है और बताती है कि रेलगाड़ी और पटरियों के बिछोह में बस चंद बरस रह गए हैं. फिर ये पटरियां हमेशा के लिए अकेली रह जाने वाली है.

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