नीतियों पर बात करना क्यों ज़रूरी है?

मेरे एक लेख पर प्रतिक्रिया आई कि मोदी सरकार के पक्ष में नहीं लिखा जाये तब भी 2019 जीत जायेंगे. निस्संदेह जीत जायेंगे. निर्वाचन में विजयी होना कोई बड़ी बात थोड़ी है. फिर हम क्यों खुलकर मोदी सरकार का समर्थन करें? क्यों न अपने-अपने विद्वद्पीठ में बैठकर हिंदुत्व, भारत के प्राचीन विज्ञान और सामाजिक समरसता पर ज्ञान बांचें?

इस सन्दर्भ में यह जान लीजिये कि नरेंद्र मोदी सरकार की नीतियों पर बात करना कई दृष्टिकोण से आवश्यक है. एक प्रखर राजनीतिक चिंतक हुआ करते थे श्रीमान रजनी कोठारी. उन्होंने कांग्रेस को एक ‘सिस्टम’ की उपमा दी थी. इस पर मैंने एक लेख जनवरी में लिखा था. वह लेख दूसरे सन्दर्भ में था.

[बिना ‘इस’ व्यवस्था को ध्वस्त किए, विकसित नहीं हो सकेगी नई राजनीतिक प्रणाली]

आज हमें इस पर विचार करना जरूरी है कि कांग्रेस रुपी सिस्टम के विपरीत भाजपा शासन का कौन सा सिस्टम खड़ा करती है. नरेंद्र मोदी के नेतृत्त्व में भाजपा किस प्रकार देश के सिस्टम में बदलाव एवं सुधार ला सकती है यह स्थापित होना आवश्यक है.

इसके लिए दीर्घकालिक सत्ता प्राथमिकता होनी चाहिए. नरेंद्र मोदी को कम से कम तीन कार्यकाल अर्थात् पन्द्रह वर्ष शासन करना होगा. कांग्रेसी सिस्टम ने साठ वर्षों में जो बीज बोये हैं उसने इस देश की जनता को लगभग विवेकशून्य बना दिया है.

विगत पाँच-छः वर्षों से इस देश के भ्रष्ट तंत्र से उकताए लोगों को आवाज मिली है अन्यथा यही लोग अपना गुस्सा कहीं और निकालते थे. शरीर में व्याधि होना अलग बात है, उसका भान होना अलग बात है. जब तक आप स्वीकार नहीं करेंगे कि शरीर में रोग है, तब तक उपचार कैसे करेंगे?

सांस्कृतिक दूषण और आर्थिक अवसरों पर कब्जा हिन्दुओं की कमजोरी नहीं रही, यह भ्रम मात्र है. हिन्दू मात खाता है जब शासनतंत्र अपने जांगरचोर संस्थानों द्वारा उसके मूल्यों के पराभव का कारण बनता है.

जब किसी सरकारी दफ्तर में आपकी सुनवाई नहीं होती, दरोगा रपट नहीं लिखता, आपकी आँखों के सामने चोरी होती है और आप रोक नहीं पाते; केलिफोर्निया और बोस्टन में एक सपनों का घर बसाने का यूटोपिया तभी जन्म लेता है.

आज नरेंद्र मोदी में ही वह शक्ति है कि संस्थानों को सशक्त कर सके. राष्ट्र की शक्ति की क्या परिभाषा है? जब मूल्यों को संस्थागत स्वरूप दे दिया जाता है तब वह शक्ति बन जाती है.

जनता बड़ी भुलक्कड़ होती है. संस्थानों में सुधार की बेहद धीमी किन्तु दूरगामी असर वाली प्रक्रिया का आरम्भ आदरणीय अटल जी के प्रधानमंत्रित्वकाल में हुआ था. मैंने राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति पर अटल जी की नीतियों का गम्भीर अध्ययन किया है इसलिए विश्वास से कह सकता हूँ. दुर्भाग्य से जनता इसे समझ नहीं पायी.

आज बड़ा विचित्र लगता है जब अटल जी के कार्यकाल की नीतियों पर बात तक नहीं होती. उस भविष्यद्रष्टा राष्ट्रऋषि को लोग अजीब से तर्क देकर कोसते हैं. मैं अटल जी की राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति पर पृथक लेख लिखूंगा.

अभी यह ध्यान देना आवश्यक है कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री न रहने पर आप किस चीज पर चर्चा करेंगे? क्या चर्चा के लिए यही रह जायेगा कि इस्लामिक बैंकिंग जो शुरू होने वाली थी वो तो नहीं हुई लेकिन ऐसी प्रणाली की बात उठी ही क्यों? क्या किसी विषय के उठने अथवा न उठने पर बात होगी?

नहीं. बात उन नीतियों की होनी चाहिए जिनसे देश का मानस अपने मूल्यों को मूर्तरूप होता प्रत्यक्ष देख सकता है. आपने कब कल्पना की थी कि आपके एक ट्वीट को रेल मंत्रालय तवज्जो देगा? अथवा ये कि आपके सुझाव सुनने के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय में एक अफसर बैठा होगा?

संस्थागत विकार और सुधार दोनों ही एक दिन में नहीं होते. दशकों लगते हैं. इस देश के लोगों को कांग्रेस ने दशकों चरस पिलाकर मूर्छित रखा ताकि वे कभी सरकार के खिलाफ बोल ही न पायें. जो बोलता था वह यूनियन का नेता बन जाता था. कांग्रेस ने ऐसी व्यवस्था बनाई कि सरकार का विरोध कर जेपी के पीछे चलने वाले नेतागिरी करने लगे और कालांतर में बुरे वक्त में कांग्रेस के काम आये.

ध्यान दीजिये तो आज सरकार को कोसने वाले की भी अपनी अलग हैसियत है उसे किसी जेपी की आवश्यकता नहीं. ऐसा इकोसिस्टम केवल नरेंद्र मोदी ही दे सकते हैं.

हिंदुत्व की बात करें तो प्रभु श्रीराम के मन्दिर निर्माण में बाधाएं आ सकती हैं किन्तु आज नहीं तो कल मन्दिर बनकर ही रहेगा और नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में ही बनेगा. मुझे इसमें कोई संशय नहीं, जिन्हें है, वे अपने पास रखें. करोड़ों लोगों की श्रद्धा और आस्था व्यर्थ नहीं जाएगी.

प्रश्न है कि मन्दिर बन जाने के उपरान्त भारतीय जनता पार्टी की क्या उपयोगिता होगी? मन्दिर नीति नहीं है हिन्दू श्रद्धा का प्रतीक है. आप लिखकर रख लीजिये मन्दिर बनने के पश्चात हिन्दू चुप मारकर बैठा जायेगा और भाजपा जैसी कोई पार्टी थी यह भी भूल जायेगा. आप भाजपा को उस मिस्त्री मजदूर की भांति अलविदा कह देंगे जिसने आपका मकान बनाया पैसा लिया और अपने घर चला गया.

वामपंथी अपूर्वानंद ने कुछ दिन पूर्व ही उपिन्दर सिंह की पुस्तक का हवाला देते हुए एक बड़ी महत्वपूर्ण बात लिखी है. उसने लिखा है कि भारत परम्परागत रूप से कभी एक अहिंसक समाज नहीं बल्कि हिंसा के प्रति ‘असहज’ समाज रहा है. इस कथन में से भारत हटाकर हिन्दू लिख दीजिये तो यह उक्ति एकदम सटीक बैठती है.

मन्दिर बन जाने के बाद हिन्दू लड़ाई झगड़ा नहीं करेगा. वो फिर कैलीफ़ोर्निया और बोस्टन के हसीन सपने देखने लगेगा. इसलिए आज नीतियों की बात करना आवश्यक है ताकि हमारे बच्चे जो आज बड़े हो रहे हैं उन्हें कल यह पता चले कि हिंदुत्व का आईडिया ऑफ़ इंडिया क्या है.

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