चोरों को पहुंच गया संदेश कि होशियार, कड़क और निर्मोही है कोतवाल

मेरे लेखों को नियमित रूप से पढ़ने वालों ने पाया होगा कि मैं प्रधानमंत्री मोदी जी द्वारा भारत में रचनात्मक विनाश किए जाने के बारे में लिखता रहता हूं. ऐसी क्या बात है कि मैं रचनात्मक विनाश को किसी राष्ट्र के विकास के प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण समझता हूं?

सरल शब्दों में, स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस के शासकों ने एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण किया जिसमें जनता की भलाई और सेकुलरिज्म के नाम पर अपने आप को, अपने नाते रिश्तेदारों और मित्रों को समृद्ध बना सकें.

अपनी समृद्धि को इन्होंने विकास और सम्पन्नता फैलाकर नहीं किया, बल्कि जनता के पैसे को धोखे और भ्रष्टाचार से अपनी ओर लूट कर किया.

मैं ज़ोर देना चाहता हूँ कि उन्होंने ऐसी भ्रष्ट व्यवस्था की संरचना जानबूझकर की थी, ना कि नासमझी में. उनका पूरा ध्यान अपने आप को और अपने मित्रों को समृद्ध करना था और उन्हें धनी बनाना था. जनता को जानबूझकर गरीब रखना था, क्योंकि गरीब जनता को वह बहला-फुसलाकर, लॉलीपॉप देकर वोट पा सकते थे.

उदाहरण के लिए, पारिवारिक संपत्ति या भ्रष्टाचार से अर्जित किए हुए धन के बलबूते पर लोगों ने उद्योग का प्लान बनाया. उस उद्योग को बढ़ाने के लिए उन्होंने सरकारी बैंकों से दिल्ली में ‘पहचान’ के बूते करोड़ों-अरबों का लोन ले लिया, जबकि उनके उद्योगों का आधार, संरचना और सफलता संदिग्ध थी.

कई केसों में मूल की बात तो छोड़िए, वह उद्योगपति ब्याज भी जमा नहीं कर पाते थे. अगर बैंक उनसे ऋण की वसूली की प्रक्रिया शुरु करता था तो दिल्ली से ‘फोन’ आ जाता था. अगर बैंक कोर्ट से मूल और ब्याज को वापस को वापस करवाने के लिए केस करते और उन उद्योगपतियों के उद्यम को बेचने का प्रस्ताव रखते, तो वह केस वर्षो तक चलने के बाद भी सफल नहीं होता था.

इस मायाजाल को तोड़ने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले वर्ष संसद से एक कानून पास करवाया जिसके तहत बैंक किसी भी लोन न चुकता करने वाली कंपनी के विरूद्ध कोर्ट में कार्रवाई शुरू कर सकता है जिसे विशेष अदालत को 18 महीने के भीतर निपटना होगा. यदि आवश्यक हुआ तो कंपनी को liquidate या नीलाम कर दिया जायेगा और भागते भूत की लंगोटी की तरह जो भी मिला सकेगा, वसूल लिया जायेगा.

इससे भ्रष्ट उद्योगपतियों की हालत ख़राब हो गयी. लेकिन धूर्त लोगों ने इसका भी तोड़ निकाल लिया. नीलामी के समय वे स्वयं या उन्ही की अन्य कंपनी वाले नीलाम होने वाली कंपनी को सस्ते दाम में खरीद लेंगे. इस तरह से उन्हें बैंक को लोन भी नहीं चुकता करना होगा (क्योकि बैंक तो कंपनी नीलाम करके पैसे वसूल रहा है) और बैठे-बिठाये कुछ घाटे (नीलामी में दिया पैसा) में उद्योग पुनः उनका.

जैसे ही इसकी भनक प्रधानमंत्री को पड़ी, वे पिछले महीने ऑर्डिनेंस के जरिए एक नया कानून ले आए, जो बिकने वाली कंपनी के मालिक को और उसके कर्ता-धर्ता को उस उद्यम या उस ग्रुप से जुड़े किसी भी अन्य उद्यम पर बोली लगाने से प्रतिबंधित करता है.

इसके पीछे की कहानी यह है कि रूइआ बंधुओं, जिनका एस्सार ग्रुप है, ने अपनी एस्सार ऑइल कंपनी तो बेच दी जिससे वे बैंक का ऋण चुका सके. लेकिन अब उनकी एक अन्य कंपनी एस्सार स्टील नीलामी पर लगी हुई है. उन्होंने इस कंपनी को नीलामी में वापस खरीदने का प्रयास करना चाहा जिसे रोकने के लिए सरकार यह ऑर्डिनेंस (अध्यादेश) लेकर आई है.

इस शिकंजे में जेपी ग्रुप, GMR ग्रुप जिन्होंने दिल्ली तथा अन्य कई एयरपोर्ट को बनाया है, यह सभी आ चुके हैं. विजय माल्या यद्यपि लंदन भाग गया है लेकिन उस पर भी शिकंजा कस रहा है और उसकी कई कंपनी और संपत्ति भारत में बेची जा चुकी है.

रिज़र्व बैंक ने अब तक ऐसे 30 बकायादारों की सूची जारी की है जो 12 लाख करोड़ रुपए (एक बार फिर से पढ़िए और अनुमान लगाने का प्रयास कीजिये कि 12 लाख करोड़ रुपये कितनी बड़ी रकम है) का लोन लेकर डकार गए हैं और चुकता नहीं कर रहे. ये लिंक देखिए –

[Banks start moving on NPA accounts in RBI’s second defaulter list]

प्रधानमंत्री इनके हलक में हाथ डालकर जो खाया है, उसे निकाल रहे है. सारे चोरों को यह संदेश पहुंच गया है कि कोतवाल होशियार, कड़क और निर्मोही है.

भ्रष्ट शासकों और रेवड़ी पर पल रहे इन उद्योगपतियों का रचनात्मक विनाश किए बिना एक नए भारत की नींव नहीं पड़ सकती.

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