घोघाबापा का प्रेत – 10

गतांक से आगे…

युद्ध का प्रथम दिन समाप्त होते ही अपने वचन के अनुसार सामन्त, बूढ़े राजगुरु नंदिदत्त को साथ लेकर नान्दौल की ओर बढ़ा. उसके साथ उसकी ‘प्रेत सेना’ का सेनानायक ‘महा’ भी दस सैनिकों के साथ पीछे पीछे चल रहा था.

बाकी की टुकड़ी को सामन्त ने ठीक प्रकार से युद्ध की रुपरेखा समझा दी थे. उन्होंने भी वचन दिया था कि, “सामन्त, तू निश्चिन्त होकर जा. हमारे शरीर से रक्त की आखिरी बूँद निकलने के बाद ही महाराज पर आंच आएगी, उससे पहले साक्षात् यमराज भी कुछ नहीं बिगाड़ सकेंगे.”

यद्यपि उसकी इच्छा थी कि रुक कर महाराज धर्मगजदेव का युद्ध में साथ दे, लेकिन महाराज के कथनानुसार उसको जाना ही पड़ा. उसको बारम्बार यही लग रहा था कि परिस्थितियों ने उसको योद्धा के बजाए एक साधारण सा दूत बना दिया है, केवल एक सन्देशवाहक बन गया है वह.

[घोघाबापा का प्रेत – 1]

जहाँ युद्ध में क्षत्रिय योद्धा अपने प्राणों का उत्सर्ग करते हुए, शत्रुओं के खून से होली खेल रहे हैं, वहीँ सामन्त को मात्र इधर से उधर संदेशा पहुँचाने का कार्य मिला हुआ है.

वो सोच सोच कर झुंझला उठता था कि घोघागढ़ के लोग लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए, उसके पिता वीरता का सर्वोच्च कीर्तिमान रच अपना नाम अमर कर गए. यहाँ अजमेर में भी हिन्दू योद्धाओं को भीषण पराक्रम दिखा, अपना नाम अमर कर जाने का सुअवसर मिला है. बस एक उसी को ऐसा कोई अवसर नहीं प्राप्त हो पा रहा है.

उसने भी सुल्तान की सेना के भीतर जाकर सुल्तान को मारने का प्रयास किया. आज के युद्ध में भी उसके कई तीर सुल्तान को लगे. अगर वो मर गया होता तो आज हिन्दुओं की यह समस्या ही ख़त्म हो जाती. घोड़े पर बैठे बैठे ही, सोचते सोचते वो झुंझला कर नंदिदत्त से अपनी व्यथा कह उठा और पूछा,

“क्या बाबा, क्या मैं इस धरती का कोई अभिशप्त मनुष्य हूँ? आखिर मेरा भविष्य क्या है? मैं क्यों अभी तक जीवित हूँ बाबा, क्यों नहीं अपने पुरखों के साथ वीरगति को प्राप्त हो गया? कम से कम ये पीड़ा तो मुझे नहीं झेलनी पड़ती प्रतिदिन. मैं रातों को नींद से उठ कर बैठ जाता हूँ.

मैं सपने में देखता हूँ कि मेरे सामने एक कई सिर वाला राक्षस खड़ा है. जो मेरी प्रिय वस्तुएं निगलता जा रहा है. मैं उसको तीरों से बेध डालता हूँ, लेकिन वे तीर उसके शरीर में घुस कर विलुप्त हो जा रहे हैं. उसको कुछ असर ही नहीं होता.

मैं गुस्से में उसके हाथ काट डालता हूँ, उसके सारे सिर भी काट देता हूँ. लेकिन कुछ ही क्षणों में उस दैत्य के सारे अंग फिर से उग आते हैं, और वो मेरे सामने खड़ा होकर भयंकर रूप से अट्टहास करने लगता है. बाबा, इस सपने के बाद मैं पसीने पसीने हो उठता हूँ, और मेरी नींद खुल जाती है. मैं क्या करूँ बाबा, मैं क्या करूँ?”

[घोघाबापा का प्रेत – 2]

इस अँधेरे रास्ते पर, नंदिदत्त सारे वार्तालाप के मध्य सामन्त के चेहरे पर अपनी दृष्टि गड़ाए रखे थे. अँधेरे की वजह से उनको सामन्त के चेहरे के भाव स्पष्ट तो नहीं दिखते, परन्तु नंदिदत्त उसके भावों से शत प्रतिशत परिचित थे. हों भी क्यों न, सामन्त के पैदा होने, नामकरण, अन्नप्राशन, तथा वर्णमाला से लेकर शास्त्रों तक की शिक्षा-दीक्षा स्वयं के हाथों ही तो कराया है.

रात्रि दो पहर बीत चुकी है चलते चलते. उन्होंने सहसा सामन्त से कहा, “पुत्र, यहाँ से आधे कोस की दूरी पर एक सरोवर है. वहीँ पर एक प्राचीन शिवालय भी है. मैं उसके प्रांगण में तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हूँ. तुम नहाकर अपना क्षत्रिय वेश छोड़कर, सिर्फ धोती में, कुछ आम्र पल्लव और कुछ फूल लेकर पहुँचो यथाशीघ्र. और ‘महा’ को बोल दो कि तुम्हारे सिवा कोई भी मंदिर में प्रवेश नहीं करेगा.” बोल कर नंदिदत्त ने अपने घोड़े को ऐड़ मार दी.

सामन्त को कुछ समझ नहीं आया अचानक ये बात सुनकर, लेकिन ब्राह्मण नंदिदत्त का वाक्य उसके लिए ब्रह्मवाक्य था. जिसका उसने अक्षरशः पालन किया.

[घोघाबापा का प्रेत – 3]

बाबा के आदेशानुसार केवल धोती पहने, नंगे पैर, आम के कुछ पत्तों और कुछ जंगली फूलों के साथ सामन्त मंदिर के अन्दर प्रवेश किया. इतनी देर में नंदिदत्त ने मंदिर में एक छोटा यज्ञकुंड ढूंढ लिया था. उसकी सफाई करके उसमें लकड़ियाँ, तथा यज्ञ की कुछ सामग्री अपने झोले में से निकाल कर सारी व्यवस्था करके बैठे थे वेदी पर.

उन्होंने अपने सामने, यज्ञकुंड के दूसरी तरफ बैठने का संकेत किया सामन्त को, और स्वयं आँखों को बंद करके कुछ अस्पष्ट सा बुदबुदाते रहे. सामंत अपने बैठने के स्थान पर पहुंचा, और वहां भूमि पर एक ‘यन्त्र’ बना देखकर ठिठक गया. उसकी आँखों को विश्वास नहीं हुआ, वो खड़े खड़े देखता रह गया.

अचानक बूढ़े नंदिदत्त ने अपनी आखें खोलीं, उनकी आँखें एकदम लाल हो रही थीं, सामन्त को लगा यह कोई और ही है, अपने बाबा तो कहीं से भी नहीं लग रहे. एक कड़कती हुई सी आवाज नंदिदत्त के मुंह से निकली, “शीघ्र बैठ जा मूर्ख, समय व्यर्थ ना कर.”

उस आवाज को सुनकर सामन्त को कंपकंपी सी छूट गई, और वह तुरंत उस ‘यंत्र’ के बीचो बीच रखी पीठिका पर बैठ गया. बाबा ने पुनः अपनी आँखें बंद कर लीं, और बड़बड़ाते रहे. धीरे धीरे उनकी बड़बड़ाहट बढती रही, और वे एक थाली में से लाल रंग की कोई हवन सामग्री, एक लम्बे चपटी लकड़ी से उठा उठा कर डालते रहे, और साथ में ‘स्वाहा’ बोलते जाते थे. शनैः शनैः अग्नि की लपटें बढती गईं, और उसी अनुपात में सामन्त के शरीर में गर्मी भी. आग की लपटों के प्रकाश में सामन्त का गेंहुआ शरीर स्वर्ण की भांति चमकने लगा.

[घोघाबापा का प्रेत – 4]

थोड़े समय पश्चात् ही यज्ञ की समिधा समाप्त हो गई. अंत में बाबा ने सारा बर्तन ही उड़ेल दिया. अग्नि की लपटें आकाश छूने लगीं, सामन्त के शरीर में अधिकाधिक गर्मी बढ़ गई. अचानक बाबा ने अपने हाथ में रखे लाल चावल के दानों को, कुछ बुदबुदाते हुए सामन्त के शरीर पर मार दिया.

सामंत को ऐसा लगा, जैसे उसके शरीर के अन्दर कोई आग का दावानल, खौलता हुआ घुस गया है, और अब उसकी शिराओं, धमनियों में रक्त की जगह अग्नि दौड़ने लगी है. वो गर्मी से पसीने पसीने होकर तड़पने लगा, लेकिन बाबा द्वारा चावल के दाने मारने में कोई कमी नहीं आई. अब उस असाधारण गर्मी को झेल नहीं पाया सामन्त, और अपनी पीठिका से उसी यंत्र में गिरकर तड़पते हुए मूर्छित हो गया.

थोड़ी देर बाद सामन्त की तन्द्रा टूटी, तो देखा कि बाबा उसके सिर पर प्रेम से हाथ फेरते हुए मुस्कुरा रहे हैं. उसको अपने शरीर में अत्यधिक चेतना सी लग रही थी. उसको अपना अत्यंत क्लांत मन, दुखों के बोझ से दबा हुआ ह्रदय, अब असीम शांति से भरपूर लग रहा था. ऐसा जैसे बरसों बाद उसको पर्याप्त निद्रा मिली हो.

उसने उछल कर खड़ा होने की कोशिश की, और वो खड़ा हो भी गया. कहीं कोई कमजोरी नहीं. उसने अपने शरीर को देखा, अपने हाथों, पैरों को निहारा. उसे ऐसा प्रतीत होने लगा कि जैसे उसको एक नया शरीर मिल गया है जो पहले से कहीं अधिक शक्तिशाली, और पहले से अत्यधिक स्फूर्तिवान है. उसने बाबा की ओर हर्षमिश्रित प्रश्नवाचक मुद्रा में देखा.

[घोघाबापा का प्रेत – 5]

बाबा ने मुस्कुराते हुए कहा, “पुत्र, अब पौ फटने का समय होने वाला है. हमें सूर्योदय से पहले ही नान्दौल की सीमा में प्रवेश कर जाना चाहिए. राह में तुम्हारे प्रश्नों का उत्तर भी देता चलूँगा.”

सामन्त बाहर निकला मंदिर से, तो देखा कि उसकी ‘प्रेत सेना’ के दसों सैनिक घोड़े पर सुसज्जित तैयार खड़े हैं. सामन्त ने भी यथाशीघ्र अपना क्षत्रिय वेश धारण किया, और एक ही छलांग में बिना अधिक प्रयास के ही उछल कर अपने ऊँचे से काले घोड़े पर सवार हो गया. सैनिक तो चौंक ही गए, सामंत खुद अपनी क्षमता पर आश्चर्य कर उठा. लेकिन अब समय व्यर्थ करने का कोई अवसर नहीं था, इसलिए टुकड़ी तीव्र गति से नान्दौल की दिशा में उड़ चली.

अब चलते चलते उसने बाबा से पूछा, “बाबा, ये तो भैरवी यंत्र था न? मैंने सोमनाथ मंदिर में वाममार्गी कापालिकों को इसका अध्ययन और अभ्यास करते देखा है, परन्तु आपको कैसे ज्ञात हुआ?”

बाबा मुस्कुराए, “दैवयोग से, मैंने और सोमनाथ के मुख्य पुजारी सर्वज्ञ जी ने एक ही गुरु से शिक्षा-दीक्षा पाई है. मेरे सिवा आज इस धरती पर केवल सर्वज्ञ जी ही इस विद्या को सम्पूर्ण रूप से जानते हैं.”

फिर बाबा का मुख वितृष्णा से भर उठा, बोले, “पुत्र, ये वामपंथी कापालिक अब पतित हो चुके हैं. तंत्र साधना के नाम पर मांस, मदिरा, और नारी देह का भोग लगाना ही इनका उद्देश्य हो चुका है. अब केवल भोगी बनना ही इनका उद्देश्य है, योगी नहीं. सामन्त, मेरी एक बात गाँठ बाँध लो, अगर किसी भी राज्य, देश का सर्वनाश करना हो तो उसके शिक्षा तंत्र को पंगु बनाते ही उसका सर्वनाश तय हो जाता है. जितने भी विद्वान और विचारक हों उनको मांस, मदिरा, और उन्मुक्त यौनाचार की लत लगा दी जाए, तो उस राज्य या देश को देवता भी नहीं बचा सकते. देवता भी ऐसी पतित भूमि छोड़कर शीघ्र ही चले जाते हैं. सदियों से ‘अध्ययन’ के लिए विख्यात सोमनाथ मंदिर में यही सब हो रहा है आजकल.”

“कभी भारत के यही मंदिर अकाल पड़ने पर, अतिवृष्टि होने पर अपना अथाह धन, राजाओं को देकर, मानव समाज की सेवा करते थे. आज ये धन, कापालिक अपने भोग विलास में व्यर्थ करते हैं. शिक्षा के मंदिर को अन्धविश्वास और ढकोसलों से भर दिया है. लोग अब मंदिरों से श्रद्धा नहीं रखते वरन डरते हैं कि कहीं ये वामपंथी कापालिक कुपित होकर कुछ अनिष्ट न कर दें. वैसे ये कोई अनिष्ट कर भी नहीं सकते किसी का, इनकी इतनी तंत्र सामर्थ्य नहीं रह गई है. परन्तु जनता को डरा कर उनपर अत्याचार करने में सफल हो जाते हैं.”

[घोघाबापा का प्रेत – 6]

सामन्त ने उत्सुकता में पूछा, “बाबा, सर्वज्ञ जी तो त्रिकालदर्शी माने जाते हैं. वो तो सब जानते होंगे, तथा वही इस समय मंदिर के मुख्य पुजारी भी हैं. वे क्यों नहीं रोकते इस अनाचार को?”

“सोमनाथ जैसे वृहत मंदिर का पुजारी और मुख्य पुजारी होना एक सुदृढ़ व्यवस्था का अंग है पुत्र. जिसमें कोई भी एक अकेला व्यक्ति अपने मन से कार्य नहीं कर सकता. बड़ी संख्या में पुजारियों की एक समिति होती है, उसमें बहुमत से जो निर्णय पारित होता उसको सुचारू रूप से लागू करवाने की जिम्मेदारी मुख्य पुजारी की होती है. और तुम्हें यह जानकर दुःख होगा सामन्त कि, मंदिर की समिति में वामपंथियों की संख्या बढती ही जा रही है. सुरक्षित भोग विलास, लिप्सा हर व्यक्ति को आकर्षित करती हैं पुत्र. केवल सच्चे योगी ही इन प्रलोभनों से खुद को दूर रख पाते हैं. सर्वज्ञ जी नितांत अकेले पड़ गए होंगे. अगल बगल के राजा भी उनकी बात सुनेंगे अवश्य, लेकिन समिति का निर्णय ही मान्य होता है. सब लोग समिति को ही मानेंगे. यही संविधान होता है मंदिरों का.”

सामन्त चिंतातुर होकर बोला, “बाबा, तो अब क्या भविष्य है इस देश का? क्या हमारी धर्मध्वजा के पतन का समय आ पहुंचा है? मुझे तो अब तक लग रहा था कि राजपूत जातियां ही कायर होती जा रही हैं. परन्तु अब तो हर जाति ही निकृष्ट कर्म में धंसती जा रही है. कौन रोकेगा इन सबको, अब जब ब्राह्मण भी पतित और पथभ्रष्ट हो चुके हैं?”

[घोघाबापा का प्रेत – 7]

“पुत्र, व्यर्थ चिंता क्यों करते हो? बुराई हमेशा ही अच्छाई की तुलना में, विशाल और शक्तिशाली दिखती रही है. परन्तु पराजय भी अंत पन्त हमेशा बुराई की ही हुई है. और अभी चिंता की क्या बात है? अभी तुम हो, धर्म गजदेव हैं, उनके धर्मपरायण सैनिक हैं. महावीर, महा धनुर्धारी महाराज भीमदेव हैं, सर्वज्ञ जी हैं, मैं हूँ. हम सबको धर्म के प्रति अपना अपना प्रयास निःस्वार्थ और निष्काम भाव से करना चाहिए. आगे जैसी सोमनाथ महादेव की इच्छा. गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने यही तो कहा है.”

साथ साथ चलते नंदिदत्त उसको समझा रहे थे कि, “पुत्र चौहान, महाराज ने तुम्हें भेज कर बिलकुल ठीक किया. तुम्हारे ही सिर अब भारत की और सम्पूर्ण हिन्दुओं की भी प्रतिष्ठा बचाने की महती जिम्मेदारी है. तुम इसे केवल एक संदेशवाहक का कार्य न समझो. हर राजा को समझ बुझा कर महमूद के खिलाफ खड़ा करना कोई सन्देश वाहक के बल की बात नहीं है पुत्र.”

अब जंगल सघन हो रहे थे. रास्ते में फलों के हरे भरे वृक्ष भी बहुतायत से दिख रहे थे. सामन्त को याद आया कि ये जगह तो कंदमूलों के लिए विख्यात है. यहाँ के लोग तरह तरह के कंदमूल जमीन से उखाड़ कर खाते थे, और ये जंगलों में अनायास ही उग जाते थे. इनकी खेती भी नहीं करनी पड़ती थी. मार्ग में सरोवर भी यथास्थान मिलते गए. पक्षियों और जानवरों के झुण्ड के झुण्ड दिखाई दे रहे थे.

किसी और परिस्थिति में तो यह अत्यंत ही रमणीक और मनोहर स्थल होता, परन्तु अभी सामन्त चिंतित हो उठा. यहाँ तक अगर यवन सेना किसी भी प्रकार पहुँच गई, तो उसको पुनः नया जीवन मिल जाएगा. ताजे भोजन के साथ स्वच्छ जल प्रचुर मात्रा में उनको अनायास ही उपलब्ध हो जाएगा. उनके हाथी, घोड़े, खच्चरों, ऊँटों इत्यादि को भी भरपूर मात्रा में चारा मिल जाएगा.

उजाला फूटने लगा था, और वे नान्दौल की सीमा में प्रवेश कर चुके थे.

(उपरोक्त घटनाक्रम, पहले दिन के युद्ध के बाद की रात्रि का है. आप लोग दूसरे दिन हिन्दुओं का प्रलयंकारी युद्ध पिछले भाग में पढ़ चुके हैं. अब आगे… )

[घोघाबापा का प्रेत – 8]

दूसरे दिन का भीषण युद्ध देखकर सुल्तान की आँखें फटी की फटी रह गईं. युद्धविराम उसने जल्दी करवा दिया ताकि वो अपनी बिखरती टूटती सेना को संभाल सके. उनको पलायन करने से रोक सके. वो रात रात भर घोड़े पर चढ़कर, तो कहीं पैदल चलकर अपनी धार्मिक पुस्तक में से सन्दर्भ निकाल निकाल कर सैनिकों को सुनाता रहा.

उसकी सेना के मनोबल की बुरी तरह क्षति हो रखी थी. कहीं कोई उत्साह नज़र नहीं आ रहा था. जन्नत की लालच और काफिरों के माल-ओ-शबाब की लूट का ख्वाब भी सैनिकों का उत्साह वर्धन नहीं कर पाया, तो तीसरे दिन सुलतान ने भोर होने से पहले पुनः एक दूत भेज कर सुलह करने की कोशिश करनी चाही. उसको लगा कि शायद इतनी मौतें देखकर महाराज धर्मगजदेव अब हमें मार्ग दे दें.

महाराज ने दो टूक उत्तर भिजवा दिया, “अभी भी सुल्तान अगर उलटे पाँव वापस अपने देश लौट जाता है, तो हम उसको जाने देंगे. परन्तु सोमनाथ का रास्ता तो मृत्यु से ही होकर जाएगा. चाहे वो मरे या हम.”

सुल्तान खीझ उठा यह जवाब सुनकर, फिर उसने अपनी सेना के सामने एक गर्वीले भाषण में वो कह दिया जो आज से पहले उसने आजीवन कभी नहीं कहा था. उसने कहा,

“मेरे वीरों, आज से पहले यही हिन्दुस्तान हमारे घोड़ों की टापों के नीचे सोलह बार रौंदा जा चुका है. हम इन काफिरों के माल, हीरे जवाहरात अपने अपने घोड़ों पर बोरों में भर कर ले गए हैं. इनकी खुबसूरत स्त्रियाँ हमारे हरम में हमारी बांदियाँ हैं. इनके पुजारी हमारे यहाँ दासों के रूप में कौड़ियों के मोल बिक रहे हैं. इन मूर्तिपूजकों के मंदिरों की मूर्तियों के पत्थर हमारे मार्गों में जड़े हैं, जिनपर हमारे जानवर दौड़ते हैं.

अगर यहाँ से भाग गए तो, क्या मुंह लेकर जाओगे अपनी स्त्रियों के पास? तुम्हारी मर्दानगी पर तुम्हारी हरम की औरतें थूकेंगी. फिर भी, फिर भी ये सुल्तान का वचन है कि अगर आज हम नहीं जीते, तो आज हम लौट जायेंगे. पर आज लड़ो, और ऐसी जंग लड़ो कि हिंदुस्तान काँप उठे.

जीते तो तमाम दुनिया के ऐशो आराम हमारे क़दमों में, और अगर मारे गए तो,. परवर दिगार बहुत रहमदिल है. वो हमें जन्नत में हजारों हजार सालों तक दुनिया की सबसे खुबसूरत औरतें देगा. जन्नत में शराब की नदियाँ होंगी तुम्हारे लिए.”

[घोघाबापा का प्रेत – 9]

अपने इन जाहिल और बर्बर कौम के लड़ाकों को किस तरह उपयोग में लेना है, इसका अनुभव सुलतान को वर्षों से रहा है. सेना उसके जोशीले भाषण को सुनकर फिर से तैयार हो गई, अपने दीन ईमान के नारे को चिल्ला चिल्लाकर सुल्तान और उसके सिपहसालार सेना में हिम्मत फूंकते रहे.

उधर हिन्दुओं की सेना तो अपने कल के पराक्रम और बढती हुई जीत से अत्यधिक उत्साहित थी. अच्छी बात यह रही कि एक दैवीय सहायता भी प्राप्त हो गई उनको. पड़ोसी राज्य साम्भर के राजा ढूंढिराज अपनी बीस सहस्त्र सैनिकों की तीव्र अश्वारोहियों की सेना लेकर रात में ही हिन्दू सेना में शामिल हो गए थे. इससे हिन्दुओं का उत्साह आसमान को छूने लगा था. महाराज धर्मगजदेव ने भी एक संक्षिप्त भाषण दिया अपनी सेना के बीच. उन्होंने ओजस्वी स्वर में कहा,

“मुझे भरोसा है कि हमारे वीर सैनिक कल ही युद्ध की पूर्णाहुति करने में सक्षम थे. परन्तु हमारी संख्या एकदम कम रह जाने से मैंने थोड़ा सुरक्षित दांव खेला और मलेच्छों की युद्धविराम के निवेदन को स्वीकार कर लिया. इससे अच्छा ही हुआ, और भोलेनाथ की कृपा से महाराज ढूंढिराज भी अपनी मारक सेना लेकर आ पहुंचे हैं. आज निर्णायक युद्ध होना ही चाहिए. आज मलेच्छों के रक्त से ये धरती लाल हो जानी चाहिए. तो,.. आज भी हम अपनी पुरानी योजना पर ही चलेंगे. कोई नियम नहीं, कोई नैतिकता नहीं. भीषण तेजी, और भयंकर प्रहार. हर…. हर…. महादेव….!!”

और जब हिन्दू सेना ने आज जवाब में,…. “हर,… हर,… म…हा.. दे… व…” का नारा दिया, तो आस पड़ोस की पहाड़ियां भी गुंजायमान हो गईं. यवनों के कलेजे दहलने लगे. कायरता को फिर से उभरने से वे रोक ही रहे थे कि तबतक रही सही कसर “ढम ढम” की आवाज वाले धौंसों और अत्यधिक विशाल नगाड़ों ने पूरी कर दी.

यवन सेना के घोड़े हिनहिना के मचलने लगे, हाथियों ने आगे बढ़ने से इनकार करना शुरू कर दिया. सैनिकों, सिपहसालारों से जुदा हालत सुलतान की भी नहीं थी. उसको भी लग रहा था कि आज उसके जीवन का आखिरी युद्ध हो सकता है यह. लेकिन वो सुल्तान था, गजनी का सुल्तान. हार या जीत से सिर्फ उसी के नाम, कीर्ति और यश को फर्क पड़ेगा. सेना का क्या है? ये तो जाहिल जंगली लुटेरे हैं. महानता तो सुल्तान की नष्ट होनी थी.

अब गुस्से में सुल्तान की आँखों से चिनगारियाँ फूटने लगीं. उसने हौसलाअफजाई तो किया अपनी सेना का, साथ में यह भी जोड़ दिया कि… “अगर कोई पीठ दिखाकर भागा तो दुश्मन से भले बच जाएँ, पर मेरे अपने तीरंदाज ही उनको मार देंगे.”

उसका ये उपाय काम कर गया, सेना को लगा कि पीठ दिखाकर मरने से अच्छा है कि काफिरों को मारकर मरें, कम से कम जन्नत में ऐश और मौज तो मिलेगी.” फिर हुंकार भरती यवन सेना भी आगे बढ़ी. लेकिन उनकी हुंकारों में अब वो दम नहीं रह गया था.

सेनाओं के पास पहुँचते ही दोनों ओर से तीरों की वर्षा पुनः शुरू हो गई. दोनों ही ओर के सैनिक तीर खा खा कर गिरने लगे. लेकिन आज हिन्दू सेना तैयार थी, सैनिकों ने तीरों की परवाह किये बगैर, अपनी बड़ी बड़ी ढालों से स्वयं को और अपने घोड़ों को भी बचाते हुए, तीर की तरह ही यवन सेना में भीतर तक धंस गए.

फिर ‘हर हर महादेव’ के गगनभेदी नारे के साथ शुरू हुआ दोनों हाथों से तलवार, लम्बे भाले, और लम्बी घुमावदार नुकीली बर्छियां चलाने का कार्यक्रम. मेरों को तो खैर किसी नियम कानून की कोई परवाह थी नहीं, परन्तु आज राजपूत और चौहानों ने नैतिकता को ताक पर रख दिया. घोड़ों के सिर काट दिए, हाथियों के सूंड और पैर रेत दिए. जो जिस अवस्था में मिला, उसको उसी अवस्था में काट डाला.

एक राजपूत को बीसों तीर लगे, और उसने गिरते गिरते भी दो बलूचों को घोड़े सहित काट दिया. नीचे गिर कर भी आसपास से गुजरने वाले यवनों के पैर, घोड़ों के पैर दोनों हाथों में पकड़ी तलवारों से काटता रहा. और अंत में “हर हर महादेव” बोल कर उसके प्राण निकल गए. सुल्तान ने उस सैनिक को अपनी आँखों से देखा. इतना भीषण और प्रचंड युद्ध देखकर वो भीतर तक काँप गया.

फिर खुद को संभाल कर वो एक लम्बा भाला लेकर शत्रुओं को ललकारते हुए प्रत्यक्ष आगे को बढ़ा. उसको आगे बढ़ते देखकर यवनों में भी कुछ साहस जागा. लेकिन इतने में राजा धर्मगजदेव ने सिंह की भांति अपना घोड़ा कुदा दिया महमूद के सामने. दोनों में भयंकर युद्ध छिड़ गया.

राजा, महमूद के भाले से घायल होकर गिरने लगे, लेकिन गिरते गिरते भी उन्होंने अपनी तलवार का एक भरपूर वार महमूद पर कर ही दिया. तलवार महमूद के जिरह बख्तर को भेदती हुई, बाएं कंधे से पीठ तक छीलती हुई उसकी जाँघों को चीर बैठी. वो भी अपने घोड़े से गिरकर मूर्छित हो गया. उसके अंगरक्षक उसको उठा कर ले भागे.

धर्मगजदेव थोडा संभले तो देखे कि बलूच टुकड़ी पुनः बर्बरता दिखाने लगी थी. तो उन्होंने सामन्त की “प्रेत सेना” के सुरक्षित अश्वारोहियों की सेना उतार दी उस ओर. प्रेत तो प्रेत ही थे, जीवन मरण से दूर, सिर्फ और सिर्फ हत्यारे पिशाचों की सेना, जिसे स्वयं सामन्त ने छांट छांट कर चुना और उनको छापामार युद्ध का रात दिन अभ्यास करवाया था. उनकी तेजी, स्फूर्ति और प्रचंड प्रहार के सम्मुख क्षण मात्र में बर्बर बलूच हाहाकार कर उठे.

सुलतान घायल होकर मैदान छोड़ चुका है, इसकी खबर फैलते ही हिन्दू सेना और उत्साह में आकर दुगुने साहस से लड़ने लगी. इसी खबर का असर यवनों पर उल्टा हुआ, उनके पैर उखड़ने लगे. अपने अपने सिपहसालारों के आदेश को न मानकर, सारी सेना पीछे मुड़ कर भागने लगी.

सैकड़ों जंगली भैंसों के झुण्ड में जैसे कुछ शेर घुस जाते हैं, तो भैंसे प्रतिरोध किये बिना इधर से उधर भागने लगते हैं, ठीक वैसे ही भैंसों की तरह यवन सेना में भगदड़ मच गई. इतनी बड़ी सेना अव्यवस्थित और अनियंत्रित होकर इधर उधर भागने लगी. ठीक वैसे ही जैसे किसी विशाल मेले में भगदड़ मच जाए. और हिन्दू सेना खदेड़ खदेड़ कर उनका शिकार कर रही थी.

दिन के तीसरे प्रहर के बीतने के बाद महमूद को होश आया, और वो अपनी छावनी से लपक कर बाहर आया. बाहर अपनी सेना की अकल्पनीय दुर्दशा देख कर उसको हताशा में पुनः चक्कर आ गए. पास खड़े सिपहसालारों ने उसको सहारा देकर बिठा दिया.

उसने अपनी उखड़ती साँसों पर काबू पाते हुए, एक श्वेत घोड़े पर श्वेत कपड़े पहने, और श्वेत झंडा लेकर एक दूत भेजा धर्मगजदेव के पास, कि, “युद्ध बंद कर दिया जाय, हम वापस चले जायेंगे”.

धर्मगजदेव ने जवाब भिजवाया कि, “अभी इसी क्षण यवन सेना युद्ध मैदान छोड़कर, अपनी छावनियां उखाड़ कर तुरंत वापस हो, तभी यह युद्ध रुकेगा”.

महमूद ने यह उत्तर सुना तो अपना सिर पीट लिया. वो इतना घायल था कि अभी यात्रा भी नहीं कर सकता था, उसकी अधिकांश सेना और सिपहसालारों की यही हालत थी. उसने फिर से दूत को महाराज धर्मगजदेव के पास भेजकर विनय करवाया कि, “हे वीर श्रेष्ठ, हे नीतिवान पुरुष, आज की रात्रि हमें विश्राम करने दीजिये, हम लोग कल चले जायेंगे. अभी हमारी हालत पर तरस खाइए. हम शरणागत होते हैं आपके.” और अपनी हार स्वीकार करते हुए यवन सेना की हर छावनी पर, झुका हुआ श्वेत झंडा टंगवा दिया.

राजा ने अपने सेनापतियों से विचार कर, यह विनय स्वीकार कर ली और युद्ध को बंद करने का संकेत दे दिया गया. हिन्दू सैनिकों की ख़ुशी का पारावार न रहा. वो युद्ध क्षेत्र में ही घोड़ों के ऊपर खड़े होकर नाचने लगे, और “हर हर महादेव” के नारों से समस्त धरा को गुंजित कर दिया.

उधर इतनी छोटी सी सेना से, इतनी बड़ी पराजय मिलने से, महमूद के खेमे में मरघट जैसी निराशा फैलती गई. डरे हुए और अपमान से लज्जित, सारे यवन सैनिक अपना-अपना साजो सामान बाँधने लगे वापस जाने के लिए.

क्रमश:..

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