नकारात्मकता दबी-छिपी हो जिसमें, वो पास न आने देगा

एक स्त्री को तुम देखते रहो; वैज्ञानिक कहते हैं कि तीन सेकेंड तक वह बेचैन नहीं होती, तीन सेकेंड के बाद तुमको वह लुच्चा समझेगी.

तीन सेकेंड सीमा-रेखा है. इतनी देर तक ठीक है. जीवन में देखना इतना तो होगा. लेकिन तीन सेकेंड के बाद अब तुम सीमा के बाहर जा रहे हो, अब तुम सज्जनता की, शिष्टाचार की, सभ्यता की सीमा तोड़ रहे हो.

लुच्चा का मतलब तुम जानते हो? मतलब होता है: घूर कर देखने वाला. और कोई मतलब नहीं होता. लुच्चा शब्द का ही मतलब होता है: घूर कर देखना.

लुच्चा शब्द आता है लोचन से, आंख से. उसी से आता है आलोचक; वह भी घूर-घूर कर देखता है. तो लुच्चा और आलोचक में कोई बहुत फर्क नहीं है. शब्द की दृष्टि से दोनों एक ही धातु से आते हैं. कब आदमी लुच्चा हो जाता है, एक सीमा है.

वैज्ञानिकों ने अध्ययन किया है बड़े गौर से. तो वे कहते हैं कि अगर एक स्त्री तुम्हें एक बार देखे तो कोई बात नहीं; अगर लौट कर देखे तो खतरा है.

तुम एक होटल में गए और एक स्त्री बैठ कर खाना खा रही है; उसने एक दफा तुम्हें देखा, यह ठीक है. एक दफा कोई भी देखता है: कौन आ रहा है? लेकिन अगर वह दुबारा देखे तो तुम सावधान हो जाना; वह तुम में उत्सुक है. खतरे की सीमा आ गई.

इसलिए जो लोग बहुत सी स्त्रियों के साथ खेल करते रहे हों, उन्हें बहुत सी बातों का पता चल जाता है, वे बहुत से आंतरिक कोड पहचानने लगते हैं.

वे उस स्त्री के पास कभी भी न जाएंगे, जिसने एक ही दफा देखा. जिसने दुबारा देखा, उस स्त्री में निमंत्रण है; उसने कुछ कहा नहीं है, लेकिन स्त्री ने निमंत्रण दे दिया है, बड़ा अनजान. शायद उसे भी पता न हो, अचेतन में निमंत्रण दे दिया है. यह स्त्री राजी है; इससे आगे संबंध बढ़ाया जा सकता है.

अगर तुम एक स्त्री के पास खड़े हो, अगर वह तुममें उत्सुक नहीं है तो उसकी कमर पीछे की तरफ झुकी रहेगी, जैसे वह तुमसे दूर होना चाहती है. लेकिन अगर वह तुममें उत्सुक है तो वह आगे की तरफ झुकी रहेगी, जैसे वह तुम्हारे पास आना चाहती हो.

उसे भी पता नहीं है, लेकिन वह निमंत्रण दे रही है; वह तुम्हें कह रही है कि पास आने को मैं तैयार हूं.

खतरा है. क्योंकि जैसे ही कोई व्यक्ति पास आता है, तुम्हारे एकांत पर दूसरे का कब्ज़ा होना शुरू हो जाता है. तुम्हारी प्राइवेसी समाप्त हुई, तुम्हारी निजता अब निजता न रही; एक दूसरा आदमी प्रविष्ट हुआ.

अब तुम्हारा बुरा भी वह जान लेगा, भला भी जान लेगा. एक फासला रखना जरूरी है; तो हम भले बने रहते हैं, बुरे को हम छिपाए रखते हैं.

निकट जो आता है उसके सामने बुरा भी प्रकट हो जाएगा; तुम अपनी सहज यथार्थता में जाहिर हो जाओगे. तुम डरते हो; वह दिखाने योग्य रूप नहीं तुम्हारा, वह बताने योग्य नहीं है.

तो जैसे घरों में तुम्हारा बैठकखाना होता है, जिसको तुम सजा कर रखते हो, ऐसे तुम्हारे व्यक्तित्व का बैठकखाना है, जिसको तुम सजा कर रखते हो. वहां तक मेहमानों को तुम ले जाते हो, उससे भीतर नहीं. क्योंकि उसके भीतर तुम्हारे जीवन का यथार्थ है.

अपने जीवन के यथार्थ में जिसने बहुत कुछ छिपाया हो – रुग्ण, क्रोध, घृणा, हिंसा, वैमनस्य, द्वेष, ईष्या, मत्सर – वह किसी को पास न आने देगा. वह भयभीत होगा कि अगर कोई पास आया तो यह सब जान लेगा; वह जीवन के अंतःगृह में प्रवेश कर जाएगा.

और वहां तो तुम खुद भी जाने से डरते हो, दूसरे को ले जाने की तो बात दूर. तुम खुद भी वहां पीठ किए रहते हो. तुम खुद भी देखने से डरते हो, क्योंकि इतना कूड़ा-कचरा, इतनी गंदगी, इतनी दुर्गंध वहां है.

ओशो (ताओ उपनिषद, प्रवचन 108)

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