घोघाबापा का प्रेत – 9

गतांक से आगे…

दो ही दिन पश्चात नंदीदत्त जी, महा के साथ अजमेर पहुंच गए. पहुंचते ही सामंत से मिलकर यवन सेना का सारा हाल सुनाया. तत्पश्चात सारे लोग महाराजा धर्मगजदेव के पास पहुंचे और बताया कि गजनी की सेना 3 दिन पश्चात अजमेर पहुंच जाएगी.

महाराज ने तुरंत सभा में सारे सेनापतियों को बुलाया, और युद्ध पर चर्चा शुरु की. सब लोग एक मत पर पहुंचे कि गजनी की सेना का सामना किले से दूर किया जाए और पुष्कर का मैदान ही युद्ध में हमारे लिए सर्वथा उपयुक्त होगा.

महाराज ने कमजोर, बूढ़ों, बच्चों और कुछ नारियों को, सारे कोष खजाना इत्यादि के साथ एक दूसरे छोटे और गुप्त किले में भिजवा दिया. पतिव्रता सभी नारियां रुकीं, क्योंकि वे संकट में अपने पति को अकेला छोड़ना, किसी भी प्रयत्न से नहीं मानीं.

[घोघाबापा का प्रेत – 1]

अजमेर के किले में सैनिकों के लिए कई दिनों तक की आवश्यक सामग्री एकत्र कर ली गई. किले के चारों ओर बसे गांवों और नगरों को तुरंत खाली करवा दिया. यवन सेना के रास्ते में पड़ने वाली सारी फसलें जला दी गईं, सारे कुएं तालाब इत्यादि पटवा दिए, सड़कें पुल मार्ग सब तुड़वा दिया, ऐसी हर वो चीज नष्ट, बंद कर दी गई, जिससे यवन सेना को थोड़ा भी अवलम्ब मिले. पुष्कर के पवित्र तालाब को अपने अधिकार में करके, धर्मगजदेव ने सेना को युद्ध के लिए व्यूहबद्ध कर दिया.

राजपूतों की सेना के बाईं ओर घने वृक्षों, झाड़ियों से लदी छोटी-छोटी पहाड़ियां थीं और दाई ओर खतरनाक घना जंगल. बीच में युद्ध योग्य थोड़ा सा समतल मैदान था.

सामंत की योजना के अनुसार, दाएँ और बाएं ओर सेना की कुछ टुकड़ी झाड़ियों और पत्थरों के पीछे छुप कर बैठ गई. उसकी योजना छापामार युद्ध की ही थी.

[घोघाबापा का प्रेत – 2]

सामंत ने सेना में से कुछ योग्य, बहुत फुर्तीले घुड़सवार और साहसी युवकों का चयन करके अपनी एक अलग छोटी सी टुकड़ी बना ली, नामकरण किया ‘प्रेत सेना’ जो कि काले घोड़ों और काले वस्त्रों में थी.

उनको उसने अपने ही अनुसार युद्धाभ्यास करवाया. चलते घोड़े से तीरों का सटीक निशाना कैसे लगाया जाय, लगाम मुंह में दाब कर दोनों हाथों से फुर्ती से तलवार कैसे चलाई जाए इत्यादि सबकुछ उसने सैनिकों और घोड़ों को पूरे तीन दिन तक अभ्यास कराया.

सामन्त बहुत ही वास्तविकता में सोचने लगा था. उसने अन्य राजपूत वीरों की तरह खुद को इस मिथ्याभिमान से दूर कर लिया कि, “मैं खुद ही सबसे बड़ा वीर हूँ, और अकेले इतनी बड़ी सेना को काट दूंगा, चीर दूंगा”.

[घोघाबापा का प्रेत – 3]

वो हर पल यह सोचता रहता था कि अपने से पचासों गुना बड़ी और ‘विश्वविजयी’ सेना से कैसे लड़ कर जीता जाय. वो सेना इस समय समस्त संसार की सर्वाधिक अनुशासित सेना भी है, जिसका सफल सञ्चालन बीसों वर्ष से विश्व विजेता महमूद गजनवी कर रहा है.

उसको कुल मिलाकर यही समझ आया कि कैसे भी करके अगर उस सेना में अफरातफरी का माहौल पैदा कर दिया जाए, उसका अनुशासन भंग कर दिया जाए, तो ही जीत की थोड़ी बहुत सम्भावना बनेगी. इसीलिए उसने अपनी टुकड़ी के युद्धाभ्यास में सर्वाधिक जोर इस बात पर दिया कि कैसे अचानक से प्रचंड तीव्रता से आक्रमण करना है, और फिर दुश्मन सेना को भौंचक्का छोड़ कर एकदम से गायब हो जाना है.

सामन्त ने एक और बात के लिए महाराज धर्मगजदेव को राजी कर लिया कि महाराज खुद मैदानी सेना का प्रतिनिधित्व तो करेंगे, परन्तु सबसे आगे खड़े होकर नहीं. बल्कि उसने तो यहाँ तक कह दिया कि महाराज सेना के बीच में अपने अंगरक्षकों के घेरे में ही रहेंगे, उससे बाहर अत्यंत आवश्यक परिस्थिति में निकलेंगे.

[घोघाबापा का प्रेत – 4]

ये सुनकर सभी राजपूत योद्धाओं के साथ, महाराज को भी अच्छा नहीं लगा. वीरता, पराक्रम, नैतिकता की बहुत दुहाई दी गई, लेकिन अंततः चौहान ने यह कह कर चुप करा दिया कि –

“यह महाभारत का वो धर्मयुद्ध नहीं है जहाँ भीष्म और द्रोणाचार्य जैसे नीतिवान लोग आपके विरुद्ध खड़े होंगे. यह विशुद्ध ‘अधर्मयुद्ध’ है. आपके सामने संसार के पतित पापियों, मलेच्छों, चांडालों की समुद्र जैसी विशाल सेना होगी, जिसको द्वन्द युद्ध में अपनी वीरता प्रमाणित नहीं करनी है. बल्कि उनको किसी भी तरह, येन केन प्रकारेण आपको मार काट कर आपकी स्त्रियाँ लूट लेनी हैं, आपका धन लूट लेना है, आपके राज्य को आग में झोंक देना है, आपकी प्रजा को दास बना कर उनको अत्याचारियों के हाथ बेच देना है, आपके आराध्यों के मंदिर तोड़ कर मूर्तियों को पैरों तले रौंद कर उनपर मल मूत्र विसर्जित करना है. इसलिए इस युद्ध में अगर आप उतरते हैं तो दया, करुणा, नैतिकता को अपने अपने घरों में छोड़ दीजिये. क्योंकि आपका शत्रु एक अत्यंत नीच योद्धा है. वो किसी भी नियम का पालन नहीं करेगा. अतः केवल जीत के लिए उतरिये. अगर युद्ध में पीठ दिखा कर भागने का नाटक भी करना पड़े, तो कीजिये. राजपूती मान, सम्मान, अभिमान बाद में देखा जाएगा.”

[घोघाबापा का प्रेत – 5]

तीन दिन बाद महमूद की सेना पहाड़ियों के बीच एक विशालकाय अजगर की भांति सरकती हुई आती दिखाई दी. जिसकी विशालता की कोई सीमा ही नहीं दिख रही थी, बस वो आती ही चली जा रही थी.

गजनी की सेना यद्यपि रेगिस्तान को पार करने की वजह से थकी हुई थी, परंतु उसने हिन्दू सेना को युद्ध के लिए तत्पर देखकर, अपनी सेना को तुरंत तैयार करवाया. कुछ देर उसने एक ऊंचे टीले से हिंदुओं की सेना की योजना को परखा और अपनी सेना को युद्धस्थल की ओर बढ़ने का आदेश दे दिया. परन्तु इतनी सुसज्जित और योजनाबद्ध सेना को देखकर उसका कलेजा दहल गया.

इस सेना से युद्ध न करना पड़े, इसका अंतिम प्रयास करने के लिए उसने अपने सिपहसालार मसूद, मुल्तान के अजयपाल, और हिन्दू दुभाषिये नाई को पुनः मैत्री सन्देश लेकर भेजा.

[घोघाबापा का प्रेत – 6]

मसूद ने महाराज के सामने पहुँच कर चाटुकारिता के शब्दों में कहा, “महाराज, हमने आपके बारे में बहुत सुना है. आपकी वीरता के किस्से सुने हैं हमने. आप प्रजाप्रिय हैं, न्यायी हैं, उदार हृदयी हैं. हम आपके राज्य पर आक्रमण करने नहीं आये हैं.”

लेकिन बोलते बोलते उसके शब्दों में अहंकार झलक ही आया, “हमारे सुल्तान का नाम महमूद है. वो दोस्तों के लिए दोस्त और दुश्मनों के लिए काल समान हैं. आप हमारी विशाल सेना से लड़ने की हठ छोड़कर, हमसे मैत्री कीजिये और हमें सोमनाथ की ओर जाने दीजिये. अपने हठ में अपनी प्रजा और अपनी सेना का नाश करवा देना कहाँ की समझदारी है महाराज?”

मसूद की बात पूरी होते ही सामन्त की जोर की भयानक हँसी गूंजी उस सैनिक पंडाल में. वो डरावनी शैतानी हँसी सुनकर मसूद और अजयपाल के सिर से एक पसीने की ठंडी लकीर पीठ से होकर नीचे की ओर बह चली. उन्होंने इधर उधर देखा परन्तु हँसने वाला अदृश्य ही रहा.

[घोघाबापा का प्रेत – 7]

महाराज ने मसूद की आँखों में आँखें डालकर कहा, “मसूद, घोघागढ़ में केवल 800 सैनिक थे जिन्होंने तुम्हारे छक्के छुड़ा दिए थे. यहाँ तो पचास हजार सैनिक हैं. अपने सुल्तान को कहना कि सैनिकों के मध्य छुप कर रहे. हमारा एक एक सैनिक उसके रक्त का प्यासा है.”

महाराज की बातें सुनकर मसूद का चेहरा लटक गया. तभी अजयपाल एक कदम आगे बढ़कर बोला, “लेकिन महाराज, ये तो सत्य है कि आप जीत नहीं पाएंगे. फिर आत्मघाती विचार क्यों? अपना नुकसान क्यों होने देना? जब महमूद कह रहा है कि वो आपको हानि नहीं पहुंचाएगा, तो उसका रास्ता रोकने का हठ त्याग दीजिये महाराज.”

एक हिन्दू राजपूत के महमूद के लिए वचन सुनकर, महाराज की आँखों में रक्तिम लाली छा गई, उन्होंने घृणा और गुस्से से कहा, “अजयपाल, अगर तू मेरा सम्बन्धी और आज दूत न होता तो अभी तेरे धड़ पर ये तेरा स्वार्थी सिर न दिखाई देता. तुझे क्या लग रहा है कि मैं किसी प्रतियोगिता में अपनी सेना और अपनी संतान जैसी प्रजा को दांव पर लगा रहा हूँ? पूछ इन सब सरदारों से, कि ये किसी हठ में शामिल हैं या अपने महादेव के धाम को मलेच्छों से अपवित्र होने से बचाने के लिए लालायित हैं. ये सब अपने आत्मसम्मान और आत्माभिमान से विभोर होकर साथ खड़े हैं. हम हिन्दुओं की उस अस्मिता को बचाने के लिये अपने प्राणोत्सर्ग के लिए खड़े हैं, जिसको तूने कायरता में कुछ कौड़ियों के भाव बेच दिया है. अभी मेरी नजरों से दूर हो जा, और युद्ध में भी प्रत्यक्ष न दिखाई देना किसी भी सैनिक को, नहीं तो वो सबकुछ भूल कर तुझे मौत के घाट उतार देंगे.”

[घोघाबापा का प्रेत – 8]

अजयपाल अत्यंत ही लज्जित होकर अपना चेहरा जमीन की ओर झुका लिया. आज उसको अपनी कायरता पर निश्चय ही लाज आ रही थी, लेकिन अभी भी वो महमूद के विरुद्ध होने के साहस की बात सोच न सका.

दूत टुकड़ी ने लौट कर सारी सूचना महमूद को दी, अब अन्य कोई चारा न देख महमूद ने लाचारी में सेना को आक्रमण करने का आदेश दिया.

इधर रणभेरी बजी, हिन्दुओं के पायल पहने घोड़े धौंसे की ढम ढम की आवाज के साथ कदमताल करने लगे. यवन सेना, जो अभी हाल ही में घोघागढ़ के 800 सैनिकों की वीरता देख चुकी थी, अकेले सज्जन सिंह चौहान ने रेगिस्तान के तूफ़ान में जो कहर ढाया था, के बाद इस अपेक्षाकृत बड़ी सेना के धौंसों/ नगाड़ों की आवाज सुन कर उनके दिल दहलने लगे.

सुल्तान खुद उहापोह की स्थिति में था कि अब ये सेना उसकी कितनी क्षति करेगी जबकि अभी गुजरात की सेना से निपटना बाकी है. अभी सबकुछ लेकर वापस गजनी भी जाना है. लेकिन वो भी एक वीर योद्धा तो था ही, जल्दी ही चिंता से उबार लिया खुद को. तत्पश्चात घूम घूम कर अपने मजहब के नाम पर, लूट के माल के नाम पर, जन्नतनशीन होकर मौला के कृपापात्र होकर जन्नत के सारे ऐशो आराम के सपने दिखा दिखा कर, उसने सेना के मनोबल को पूर्ववर्ती ऊंचाई तक पहुंचा दिया.

जैसे ही दोनों ओर की सेनाएं एक दूसरे के आमने-सामने पहुंची, तीरों की सनसनाहट गूंज उठी. राजपूती सेना पहले से ही तैयार थी और इधर उधर वृक्षों और पत्थरों के पीछे सुरक्षित स्थानों में सरक कर, छिप कर वहां से बाण वर्षा आरंभ कर दिया. यह देखते ही महमूद ने भी अपनी सेना को ऐसा ही करने का आदेश दे दिया. बाण वर्षा से दोनों ही ओर की सेनाओं की क्षति होने लगी.

दो पहर तक ऐसे ही युद्ध चला. राजपूत योद्धा आमने-सामने तलवार से युद्ध करने के लिए तड़प रहे थे लेकिन सब बेकार थे तीरों के आगे. यह देखकर अचानक सामंत ने पत्थर के पीछे से, बड़ा भारी धनुष कानों तक खींच कर, एक कई तोले का तीर महमूद को दे मारा. तीर हवा में सनसनाता हुआ लपका और महमूद की बाईं भुजा में घुस गया.

क्षणांश में सामंत ने कई तीर मार दिए. दो और तीर महमूद की जांघ में घुसे और कई घोड़े के शरीर प्रविष्ट हो गए. तत्क्षण घोड़ा चिंघाड़ मार कर नीचे गिर गया, उसी के साथ महमूद भी नीचे गिर कर मूर्छित हो गया. महमूद को घेरे खड़े उसके अंगरक्षक भौंचक्के रह गए कि यह क्या हुआ और कैसे हुआ. और जैसे ही अनहोनी समझ आई, यवन सेना में हाहाकार मच गया.

सारे सिपहसालार महमूद की ओर दौड़े, और उसे घेरकर सुरक्षित कर लिया. उसके तीर सावधानी से निकाल कर कुछ मलहम इत्यादि लगाकर उसकी पट्टी कर दी गयी. परन्तु इतनी ही देर में यवन सेना अव्यवस्थित हो गई, और तीरों की वर्षा में शिथिलता आ गई.

झाड़ियों, पत्थरों के बीच छिपी सामन्त की ‘प्रेत सेना’ और सामने खुले में खड़ी महराज धर्मगजदेव की राजपूती सेना तो जैसे इसी क्षण की प्रतीक्षा कर रही थी.

सामंत ने अपनी टुकड़ी के साथ यवन सेना के बाई तरफ से अत्यधिक तीव्र गति से हमला बोला. ये काली आंधी जैसी परछाईं वाली टुकड़ी थी, जिसकी कालिमा में सिर्फ नंगी तलवारें ही चमक रही थीं. दोनों हाथों में तलवारें लिए इस टुकड़ी ने सम्पूर्ण अग्रिम ‘धनुर्धारी पंक्ति’ को रेत दिया.

कई यवनों के हताहत होने के बाद जब तक कुछ समझ में आता तब तक ये आंधी गधे के सर से सींग की तरह गायब हो चुकी थी. यवन सेना की दूसरी पंक्ति ने बौखला कर बाई ओर तीरों की वर्षा शुरू कर दी कि अचानक दाईं ओर से कोल भीलों इत्यादि की जंगली सेना ने, जंगल से निकलकर भयानक आक्रमण कर दिया.

इधर कुछ ही क्षणों में सुल्तान की मूर्छा दूर हो गई. अब वह तुरंत दूसरे घोड़े पर सवार होकर अपनी सेना को पुनः नियंत्रित करने लगा. राजपूती सेना का यह छापामार युद्ध देखते हुए सुल्तान ने खूंखार बर्बर बलूची सेना को मोर्चे पर लगाया.

बलूच पहाड़ों ही की एक बर्बर जाति थी, उन्होंने अपने सधे हुए घोड़ों और अत्यधिक लंबी मुड़ी हुई तलवारों के साथ राजपूतों का विनाश करना शुरू कर दिया. उनके घोड़े और उनकी तलवार दोनों ही अत्यधिक लम्बे थे. जब तक हिन्दू सेना का कोई वीर इनके पास पहुँचता, ये लम्बी तलवार से उसपर पहले ही हमला बोल देते थे.

इस खतरनाक आक्रमण से राजपूतों के पैर उखड़ने लगे. त्राहि त्राहि मच गई. अब सामन्त यह देख कर उस बलूच सेना के सम्मुख भिड़ गया, अपनी छोटी सी टुकड़ी लेकर. सामंत और उसकी टुकड़ी की तत्परता, तेजी देखते ही बनती थी.

चूँकि बलूच सेना की संख्या अधिक थी, तथा उनकी तलवार भी अत्यधिक लम्बी थी, तो मनवांछित सफलता तो नहीं मिली सामन्त को, परन्तु बलूच सेना भी अब निष्प्रभावी होने लगी राजपूतों के आगे. अब सामंत के मोर्चे पर लग जाने से, इस त्वरित आक्रमण के बाद राजपूत भी संभल गए.

शाम के बाद अँधेरा होने लगा तो युद्ध विराम कर दिया गया. दोनों ही सेनाओं की क्षति पर्याप्त हो चुकी थी. महमूद को तो कुछ असर नहीं होना था इस क्षति से, क्योंकि उसकी सेना अत्यधिक विशाल थी. परन्तु राजपूतों की सेना की संख्या में कमी अवश्य दिखने लगी थी. एक तिहाई सेना का नाश हो चुका था.

महाराज धर्मगजदेव ने पुनः सभा बुलाई, और हर सेनापति से प्रश्न प्रतिप्रश्न करना आरम्भ किया. इतने में सामन्त पहुंचा, तो महाराज ने कहा, “देख सामन्त, तू वीरों का वीर है. परन्तु अब तक इतना तो समझ ही गया होगा, कि अब महमूद की इतनी विशाल सेना को अधिक दिन तक हम लोग नहीं रोक पाएंगे. अतः अपने वचन के अनुसार तू अभी आगे निकल. राह के सब राज्यों को सावधान कर. समय रहेगा तो अन्य लोग योजना भी बना लेंगे.”

सामन्त बहुत कसमसाया, लेकिन महाराज टस से मस नहीं हुए. फिर उसने कहा, “ठीक है मामा, मैं जाता हूँ. परन्तु मैं यहाँ उपस्थित सेनापतियों से कुछ कहना चाहता हूँ. वो ये कि ये कोई ऐसा शत्रु नहीं है, जिसके लिए हम धर्मयुद्ध का पालन करें. वो बिलकुल भी नहीं पालन करेगा. तो आवश्यक यह है कि अपनी शर्तों पर लड़िये. यवन सेना अभी थकी हुई है. वो उचित समय तक कल आराम करेंगे. इसलिए प्रातः होने की प्रतीक्षा मत करियेगा. जैसे ही उजाला हो, अपनी सेना को अप्रत्याशित रूप से आक्रमण करने का आदेश दीजियेगा.”

हिन्दू सेनापति असहमत तो हुए, लेकिन सामन्त ने सुल्तान की बेरहमी की कथाएं सुनाकर पुनः सबको सहमत कर लिया कि ‘युद्ध अपनी जीत की शर्तों पर ही लड़ा जाएगा, किसी आदर्शवादिता को ढोकर नहीं.”

अगले दिन राजपूती सेना यवनों को सँभलने का अवसर दिए बिना टूट पड़ी. इस बार सामन्त के कथनानुसार पहाड़ों की मेर जाति के योद्धाओं की सेना को बलूचों के सामने उतार दिया धर्मगजदेव ने.

मेरों को तलवार भाले तनिक भी नहीं सुहाते थे, उनको प्रिय थीं टेढ़ी मेढ़ी लम्बी बरछियाँ. जिनकी ख़मदार काँटों जैसी नुकीली नोकें दुश्मनों की अंतड़ियाँ भी एक ही वार में बाहर खींच ले रही थीं.

शत्रु सेना, विशेषतः बलूचों में हाहाकार मच गया. उनके घोड़े तक मेरों के आगे आने से कांपने लगे, और जिधर सींग समाये उधर ही भाग ले रहे थे. मेर घोर जंगली थे, वे नियम कानून की कोई सीमा या परिभाषा ही न जानते थे, न ही मान रहे थे. सवार हाथ में नहीं आया तो बरछी घोड़े को ही घोंप दी. घोडा छनमना कर उछला और सवार गिरा, तो उस असावधान सवार की पीठ में बरछी घुसेड़ दी. मतलब मलेच्छों के सामने ये दुर्दांत हत्यारों की सेना लग रही थी.

जहाँ मेर थोड़े कमजोर या संख्या में कम दिखाई दिए, वहां धर्मगजदेव ने अपने पराक्रमी चौहान घुड़सवारों की टुकड़ी घुसेड़ दी. बलूचों को तो भागने की राह भी नहीं दिख रही थी. राजपूतों को मनचाहा अवसर मिल गया था इस अव्यस्थित शत्रु को देख कर. उन्होंने अपनी तेजी और कौशल से युद्ध की दिशा और दशा दोनों ही बदल कर रख दिया.

महमूद काँप उठा अपनी विश्वविजयिनी सेना का ये अंजाम देखकर. उसने अपने दीन ईमान का वास्ता देकर भागती हुई बलूच टुकड़ी को रोका. उस टुकड़ी को पुनः सँभलते देखकर धर्मगजदेव ने अपनी तीव्र घुड़सवारों की सुरक्षित रखी हुई सेना भी झोंक दिया इस बार. इस नई सेना का धक्का यवन सेना बिलकुल ही नहीं झेल पाई. उसके पाँव उखड़ने लगे.

भीषण युद्ध हुआ. जगह जगह यवन सैनिकों की कटी फटी लाशों से मैदान पट गया. शाम होते होते अश्वारोहियों को अश्वसंचालन में भी परेशानी होने लगी. सुलतान को लगा कि आज उसके विश्वविजय की कीर्ति पर धब्बा लग ही जाएगा. उसने सूर्यास्त से पूर्व ही युद्ध रोकने का इशारा कर दिया.

यद्यपि संख्या की तुलना के अनुरूप, हिन्दू सेना की भी भारी क्षति हुई थी, लेकिन राजपूत अत्यधिक उत्साह में थे. वो आज ही इस युद्ध की पूर्णाहुति कर देना चाहते थे. लेकिन महाराज धर्मगजदेव ने सेना की थकान और क्लान्ति को देखते हुए महमूद की युद्धविराम की विनय को स्वीकार कर लिया.

चारों तरफ हर हर महादेव के नारे गूँज उठे, और इस गूँज को सुनकर उस ‘विश्वविजयी मुग़ल सेना’ का कलेजा मुंह को आ रहा था. सबको अपना देश, अपने घर, अपनों की शक्लें याद आने लगीं.

क्रमशः…

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY