धूल से भरे शब्द

चार-पांच सालों से अब मैं कहानी नहीं लिखता. इसके कई कारण हैं. एक तो यही है कि पिछले दिनों मुझे हिंदी की एक प्रतिष्ठित पत्रिका मिली, जिसमें अपनी एक कहानी देख कर मुझे स्वयं आश्चर्य हुआ था, क्योंकि कहानी को लिख कर पत्रिका को भेजे आठ-नौ साल हो गए होंगे, या फिर ज्यादा भी, मैं तो यह भूल भी चुका था. और फिर इन साहित्यिक पत्रिकाओं को कौन पढता है, शायद लेखक वर्ग ही! आमजन तो ये सब पत्रिकायें लेता नहीं. बहरहाल, अपनी लिखी आखिरी दो कहानियों में से एक यहां पोस्ट कर रहा हूँ !

धूल से भरे शब्द

उसने आगे बढ़कर दरवाजा खोला तो आवाज कुछ-कुछ उसी की तरह की थी जैसे किसी हॉरर फिल्म के दृश्य में विशेष प्रभाव लाने के लिए डायरेक्टर को फोटोग्राफर के साथ-साथ संगीतकार की भी विशिष्ट मदद लेनी पड़ती है. मगर यहां डर नहीं पैदा हो पा रहा था. थका हुआ दिमाग वैसे भी कुछ नहीं कर सकता. हां, यह जरूर लग रहा था कि दरवाजा कई दिनों बाद खुला है. अचानक अंदर से आई सीलन से भरी हवा ने इस बात पर मुहर लगाई थी.

भीतर कमरे में अंधेरा पसरा हुआ था. मगर उसके सधे हुए पांव कुछ ही देर में स्विच बोर्ड के नजदीक पहुंच चुके थे. बल्ब के जलते ही पीला प्रकाश चारों तरफ फैल गया था. मेरी नजर अनायास ही चारों तरफ घूम गई थी. हर ओर दीवार के साथ खड़ी लकड़ी की बड़ी-बड़ी रैक-अल्मीरा जिनके कांच में से अंदर रखी हुई किताबें झांक रही थीं.

पढ़ने में कुछ नहीं आ पा रहा था. कांच धूल से धुंधले पड़ चुके थे. किताबों के कवर पर छपे शब्द तक रोशनी मुश्किल से पहुंच पा रही थी. हां, यह तो जरूर दिख गया था कि इनमें से कुछ बड़ी मोटी किताबें थीं. मैं इनकी संख्या को देखकर हतप्रभ हो रहा था. इतना विशाल व्यक्तिगत संकलन! मैंने आश्चर्य में एक लंबी सांस ली थी.

नजरें एक बार फिर सक्रिय हुयी थी. दरवाजे के ठीक दायीं ओर एक विशिष्ट टेबल थी जिस पर ठीक पीछे सीढ़ीनुमा लकड़ी की पटरियां लगाई गई थी. हर पायदान पर कई सारी ट्रॉफियां. ऊंचाई के अनुसार, सबसे नीचे सबसे छोटी और फिर अगली सीढ़ी पर उनसे ऊंची.

ये मुझे आकर्षित कर अपने पास बुला पातीं, इसी बीच वो आगे बढ़ चुकी थीं. उसने आगे बढ़कर सामने की दीवार पर बंद पड़ी खिड़की के पल्लों को खोला था. बाहर की रोशनी धड़धड़ा कर ऐसे अंदर घुसी कि मानो महीनो से इंतजार कर रही हो.

शाम हो चली थी. सूरज खिड़की के रास्ते अंदर तक पहुंचने में ही खुश हो रहा था. तो यह पश्चिम दिशा होनी चाहिए. धूप के गोलाकार बीम में हवा ने अपना अस्तित्व बना लिया था. रास्ते में असंख्य धूल के कण किरणों के साथ अचानक तैरने लगे थे. इनसे ही तो धूप की पहचान बनी थी, नहीं तो इनका अपना अस्तित्व कहां दिखाई पड़ता. अजीब है प्रकृति का नियम, दूसरे को रोशनी देने वाले की खुद कोई चमक नहीं.

मैंने चारों ओर फिर नजर घुमायी, यहां तो धूल का साम्राज्य था. जिसने चारों ओर कब्जा जमा रखा था. रोशनी में उसके चेहरे की झुर्रियां एक बार फिर साफ नजर आ रही थी मगर चेहरे पर आज न जाने क्यूं दमक रही थीं. उसने एक लंबी सांस ली थी और फिर गर्व से चारों ओर देखने लगी. मुझसे अधिक.

मेरी निगाहें अब भी जगह-जगह पर अटक रही थीं. सब कुछ धूल में नहाया हुआ था. जाते हुए सूर्य की किरणों ने धूल को और उजागर किया था. वातावरण में बिखरे धूल के कण अब चमक रहे थे. हमारे आने से यहां के शांत वातावरण में खलबली-सी पड़ गयी थी, तभी तो कमरे में चारों ओर इन कणों की हलचल बढ़ गयी थी. मानो उन्हें हमारे आने की सूचना मिल गयी हो.

उधर, रोशनी ने रैक, किताब, टेबल यहां तक कि कांच को भी अपनी कहानी कहने के लिए उकसाया था. मगर धूल इसे रोकने के प्रयास में था. कांच की चमक धूमिल थी. वे धूल से ढके होने पर अपनी निराशा जाहिर कर रहे थे. कांच में पीछे रखी किताबें खामोश थीं और शब्द छिप गये से प्रतीत हो रहे थे. क्या अब उनका कोई अस्तित्व बचा था?

मैंने कोशिश की मगर मुझे उनका अहसास नहीं हुआ था. मुझे थोड़ा अटपटा लगा था. क्यूं? इन शब्दों की ट्रॉफियां भी तो मृतप्राय पड़ी हैं! धूल का साम्राज्य इन पर भी तो था. क्या इनकी अब कोई कीमत नहीं? नहीं-नहीं, यह कितनी अनमोल हैं. इसे पाने के लिए तो मैं खुद कितनी मेहनत कर रहा हूं. ये अगर मुझे मिल जाएं तो मैं कितना खुश हो सकता हूं?

मैं शब्दों से खेलने वाला, लेखक, इन खुशियों को व्यक्त करते समय शायद शब्दों में ही उलझ जाऊं. ऐसा होता है. इतनी ही खुशी तो अमृता मैडम को भी मिली होंगी? जब ये सब सम्मान उन्हें प्राप्त हुआ होगा.

मेरा उत्साह बढ़ा था और दोगुने उत्साह से मैंने धूल के पीछे झांकने की कोशिश की तो पाया शब्द अब भी बाहर निकलने को प्रयासरत थे. उन्हें पहचाना जा सकता था. कुछ इनमें राज्य सरकारों के अकादमी के द्वारा दी गयी थीं. कई मंच और सम्मेलनों के नाम जाने-पहचाने लग रहे थे. सभी अपनी-अपनी लकड़ी और धातु की ट्रॉफियों में से बाहर निकलने की कोशिश कर रहे थे.

इसी कतार में सोवियत संघ की एक ट्रॉफी पर नजर गयी थी. इसने मुझे आकर्षित किया था. आज सोवियत संघ इतिहास में दफन था तो यहां उसकी ट्राफी धूल में सनी पड़ी थी. मैं उसकी ओर आगे बढ़ा था. सोवियत और हिन्दुस्तान के बीच शब्दों के आदान-प्रदान का लंबा इतिहास रहा है. मगर आज? अब वो बात कहां? शब्द क्या अदृश्य हो गए थे? या ये भी धूल में छिप गये? पता नहीं.

मन में जिज्ञासा हुई थी, लगा उठाकर देख लूं उस इतिहास को. मगर संकोच ने मुझे रोका था. मैंने चतुराई से धीरे से घूमकर देखा तो वो पीछे अब भी मंद-मंद मुस्कुराते हुए चुपचाप खड़ी थीं. इस बार हमारी निगाहें टकरायी थीं. उनके चेहरे पर मुस्कुराहट एक बार फिर उभरी थी. उसमें इस वक्त एक बार फिर विशिष्ट भाव थे…

मैं शब्दों के लिए एक बार फिर चूक रहा हूं …शायद उनका अभिमान या अपने प्रति विशेष लगाव… या अपनी उंचाइयों को किसी और की नजरों में देखने की खुशी. बड़ा मुश्किल है कहना. वो चुपचाप थी एकदम स्थिर. दोनों हाथ पीछे. यहां चेहरे से अधिक आंखों की ऊर्जा व्यय हो रही थी. उन्हें यहां शब्दों की आवश्यकता नहीं थी.

शायद मैं समझ रहा था. वो देख भी रही थीं और समझ भी रही थीं कि मैं उनकी उपलब्धियों को, उनके विशिष्ट पुरस्कारों को, सम्मानों को न केवल देख रहा हूं, उनके महान होने को प्रमाणित भी कर रहा हूं. उसके चेहरे का गर्व मुखर हो रहा था.

मैंने आगे बढ़कर एक बार फिर चारों ओर नजरें घुमाई थीं. इस बीच एक अलमीरा के नजदीक पहुंचा था. अंदर की किताबें करीने से रखी हुई थीं. यकीनन इन्हें महीनों नहीं, वर्षों कहना चाहिए, खोला नहीं गया होगा.

पीछे हुई हलचल ने मेरा ध्यान अपनी ओर खींचा था. खिड़की के पास स्थित टेबल पर पड़े टेबल क्लाथ को उन्होंने इसी बीच उठाया था. लगा कि मानो कमरे में घमासान शुरू हो गया हो. धूल के कणों की आपस में धक्का-मुक्की तेज हुई थी. सूरज की किरणों में इन्हें तेज गति से दौड़ते हुए देखा जा सकता था. इस पर विज्ञान वाले शोध कर चुके होंगे. मगर ये मुझे अच्छे लगते हैं. फिर चाहे ये ऐसा जिस लिये भी करते हों. कणों के रंग भी बदल रहे थे. इस पर कविता भी लिखी जा सकती है और साहित्य का सृजन किया जा सकता है. मगर फिलहाल ये धीरे-धीरे आसपास के शब्दों पर फिर जमने लगे थे.

टेबल क्लॉथ के नीचे, यह स्टडी टेबल होनी चाहिए, उसका रोज़वुड कलर उभरकर आया था. धूल यहां तक नहीं पहुंची थी. कितना सुंदर फर्नीचर रहा होगा? नहीं, है. सिर्फ धूल झाड़ने की तो बात है. साथ में रखी थी एक उंची कुर्सी. शायद इसी पर बैठकर वो लिखती हों. वह टेबल क्लॉथ के साथ फुर्ती से दरवाजे से बाहर की ओर निकली थी. शायद धोने डालने की तैयारी थी.

इसी बीच मैं थोड़ा स्वतंत्र हुआ था. अकेला कमरे में जो रह गया था. क्या करूं? कहां से शुरू करूं? समझने की कोशिश में अभी भी लगा हुआ था. मगर न जाने क्यूं धीरे-धीरे किताबों के उपर की धूल मेरे मन-मस्तिष्क पर भी महसूस होने लगी थी. मैंने हड़बड़ाकर अपने विचारों को झकझोरा था. तभी मेरी निगाह दीवार पर टंगे फोटोफ्रेम पर पहुंचकर रुक गयी थी. मैडम की फैमिली फोटो थी.

एक बार फिर मैं उनके चेहरे की ओर देख रहा था. वो यहां भी मुस्करा रही थीं. तब भी चेहरे पर गर्व था. लेकिन मुझे इस बार उनकी आंखों ने अधिक ध्यान आकर्षित किया था. उसके लिए शब्द एक बार फिर धूमिल हो रहे थे.

फोटो कोई पचास साल पुराना होना चाहिए. हां, दोनों बच्चे, जो मेरी उम्र के ही हैं, तब अपनी बाल्यावस्था में थे. वैसे मैडम जूडे़ में फूल लगाकर सुंदर लग रही थीं. बगल में खड़े थे सहगल साहब.

यकीन ही नहीं होता कि ये वही शख्स है जो बाहर बिस्तर पर लेटा हुआ है. पिछले दो-तीन सालों से वे चल-फिर नहीं पाते. वे लगता है अब यहां से जल्द से जल्द जाना चाहते हैं. उनकी आंखों से निकलते भाव के लिए एक बार फिर शब्द कम पड़ रहे थे. तो क्या हुआ, मैं सब समझ रहा था, ये क्या कम है?

इन बच्चों को मैंने कभी आते-जाते देखा नहीं. देख भी कैसे सकता हूं? सुना है पिछले बीस-पच्चीस वर्षों से दोनों न्यू ज़ीलैंड में स्थायी रूप से रहने लगे हैं. आते हैं, बड़े आत्मविश्वास के साथ स्वयं ही मैडम ने अनेक बार कहा था. मगर फिर मुझे क्यूं नहीं दिखे? वैसे तो मैं तकरीबन हफ्ते में दो बार यहां आ ही जाता हूं. तो फिर क्या वो कुछ घंटों के लिए ही आते हैं? कहीं अपने पिता को सिर्फ देखने तो नहीं आते?

मेरी नजरें उस फोटोफ्रेम की कहानी से निकलकर बगल के फोटोफ्रेम में पहुंची थी. कुछ लंबा-चैड़ा सा प्रशस्तिपत्र था. अकादमी अवार्ड का प्रशंसा-पत्र था. ओह! यह वही तो है ‘शब्दों का इतिहास’ उपन्यास पर. कितना जबरदस्त उपन्यास था. बांध लेता है. मैं उसे कई बार पढ़ गया था. मगर वही शब्द अब इस वक्त मुझसे दूर हो रहे थे.

मैं उस प्रशस्तिपत्र के शब्दों को धूल से नहाते हुए देखकर भ्रमित हो रहा था. अचानक इनमें मुझे अपना भविष्य दिखा था. जहां मैं एकदम अकेला था. गर्व की चोटी पर. अपाहिज सहगल साहब इस बार मुझे देखकर हंस रहे थे और दोनों बच्चे ताली मारकर मानो मेरा मजाक उड़ा रहे थे. घबराकर वापस लौटा तो इस बार अपना लिखा सारा मुझे धूल में सना हुआ महसूस हुआ था.

मनोज सिंह

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