युद्ध में हर हाल में जीतना, और जीतने के लिए ज़िंदा रहना ही होता है

एक होती है फुटबॉल. पैर से खेलते हैं. इसमें बॉल को छूना – हाथ लगाना पाप है. महापाप… इसमें पैरों से ही बॉल को tackle करके गोल करना होता है. डिएगो मैराडोना जैसा फुटबॉल का महानतम खिलाड़ी भी Hand of God का कलंक लिए जी रहा है.

एक दूसरी गेम होती है हैंडबॉल… इसमें बॉल को हाथों से खेलते हैं. बीच बीच में dribble करना होता है. और हाथों से गोल करना होता है. पैर से मारना छूना फाउल होता है. ले के भागना भी फाउल होता है. बीच बीच में dribble करके भागना होता है.

एक तीसरी गेम होती है रग्बी… ये दुनिया की सबसे tough game मानी जाती है. इसमें बॉल को गोल में पहुंचाना है. चाहे जैसे पहुंचाओ. हाथ से चाहे पैर से, दौड़ के, भाग के, लेट के, घिसट के… चाहे जैसे पहुंचाओ पर गोल करो… पर लात, जूता, मुक्का, घुसण्ड… लत्तम जुत्तम ई सब फाउल होता है…

इसे दुनिया के सबसे तगड़े मर्द ही खेल पाते हैं. मने जो 100 किलो वाले पहलवान, जुडो और वेट लिफ्टर, एथलिट ऐसे खिलाड़ी होते हैं न, वही सब रग्बी में कामयाब होते हैं. हल्का फुल्का आदमी तो रग्बी में बह जाएगा. एक एक आदमी पर 20 – 20 आदमी पिल पड़ते हैं.

पर एक और भी गेम होती है. उसे हम पहलवान लोग खेलते हैं. वो इस रग्बी का भी बाप होती है. रग्बी में लत्तम – जुत्तम allowed नहीं होता. पर पहलवान लोग जो रग्बी खेलते हैं उसमें मुक्का, घुसन्ड, लात, जूता सब चलता है.

खिलाड़ी सामने वाले को उठा के पटक भी देता है. इसमें जब एक बॉल ले के चलता है तो बाकी सारे उसे defend करते हैं. सामने वाले को उस तक पहुंचने ही मत दो… जो आये उसे पकड़ के घसीट लो, उठा के पटक दो…

अब बहुत जिगरे वाला आदमी ही इसमें बॉल वाले खिलाड़ी तक जाने की हिम्मत करता है… और कई बार ऐसा होता है कि बॉल वाला खिलाड़ी पकड़ा जाता है… तब सब उसी पर पिल पड़ते हैं.

अब होता ये है कि बॉल नीचे दबी हुई है, एक खिलाड़ी उसे दोनों हाथों से जकड़े हुए छाती से लगाये नीचे पड़ा है. बाकी सब पिले पड़े हैं.

अब किसी भी तरह बॉल निकालो, बॉल पर कब्जा करो… पर बॉल तक पहुंचोगे कैसे… सो उस pile में से एक एक खिलाड़ी को खींच खींच के, हटा के, जगह बना के, बॉल तक पहुंचना होता है…

ठीक वैसे जैसे केला छीलते हैं न, वैसे ही उस झुण्ड में से बॉल निकालनी होती है… कोई किसी की टांग पकड़ के खींच रहा है, किसी के हाथ मे किसी की नेकर ही आ गयी और खींच दी गयी… पता लगा कि नंगे हो गए…

ऐसे में रेफ़री की सिर्फ एक भूमिका होती है… खिलाड़ियों के pile में नीचे दबा कोई दम घुट के मर न जाये… और किसी एक खिलाड़ी की टांगें दो लोग पकड़ के ऐसा न खींच दें कि वो दो हिस्सों में चिर जाए…

हम लोग जब Sports Hostel में रहते थे तो अन्य games के खिलाड़ी हम पहलवानों के साथ कभी game नहीं लगाते… सब कहते कि तुम्हारे साथ कौन खेलेगा… तुम्हारा क्या पता, कब उठा के पटक दोगे?

राजनीति की फुटबॉल में Hand खेलना सबसे पहले कांग्रेस ने ही शुरू किया था. सुनते हैं कि नेहरू ने ही शुरू कर दिया था. किसी चुनाव में जबरदस्ती, हारे हुए अबुल कलाम आजाद को जितवा दिए थे…

तब बाकी पार्टियां पूरी ईमानदारी से फुटबॉल खेलती थीं तो कांग्रेस Hand कर लेती थी. फिर इंदिरा के जमाने मे कांग्रेस ने फुटबॉल के game में हैण्डबॉल शुरू कर दी… खुद हैंडबॉल खेलती पर अगर बेचारे विपक्षी बॉल को छू भी देते तो फाउल-फाउल चिल्लाती… 80 के दशक तक यही चला… फिर बाकी खिलाड़ी भी फुटबॉल में हैंडबॉल खेलना सीख गए.

पर भाजपा चूंकि Party with a Difference थी, भाजपाई सब शुचिता, नैतिकता और आदर्शवाद की पैदाइश थे, सो वे सब बहुत आदर्शवाद बघारते थे… वही शुचिता और आदर्शवाद चाटते हुए 2 सीट पर पहुंच गए और कांग्रेस 410 पर…

फिर 90 के दशक में देश में क्षेत्रीय पार्टियां तैयार हुई और उन्होंने फुटबॉल के गेम में हैंडबॉल से भी एक कदम आगे जाते हुए रग्बी शुरू की… लालू मुल्लायम रग्बी के ही खिलाड़ी थे… जब ये सब खेलने उतरे तो कांग्रेस की समझ में आया कि फुटबॉल कैसे खेलते हैं.

भाजपा अभी तक आदर्शवाद ही चाट रही थी. वो अब भी फुटबॉल ही खेल रही थी जबकि विरोधी रग्बी पे उतारू थे… बहुत दिन हुआ ये खेल…

पर अब जो टीम है न… ये वो पुराने वाली भाजपा नहीं है… इसमें दो तगड़े पहलवान हैं… और खेलते भी एकदम मुक्का, घूंसा, घुसन्ड वाली रग्बी… बॉल की तरफ कोई आ भी गया तो उठा के पटक देने वाले…

आज की भाजपा ने इस चुनावी फुटबॉल में हर वो दांव सीख लिया है और खेल रहे हैं जिनकी शुरुआत नेहरू, इंदिरा, संजय गांधी और फिर लालू मुलायम ने की थी… आज की भाजपा चुनावी राजनीति के खेल में हर उस दंद-फंद में माहिर है जिसमें कभी फिसड्डी हुआ करती थी.

भाजपा आज इस चुनावी फुटबॉल में जन बल, धन बल, बाहु बल, जातिवाद, धार्मिक भावना, और इसके अलावा जितनी भी Dirty Tricks होती हैं सबमें महारथ हासिल कर चुकी है…

जो लोग अब भी शुचिता, नैतिकता और आदर्शवाद को लिये चाट रहे हैं उनको ये याद रखना चाहिए कि चुनावी राजनीति एक युद्ध है… युद्ध में हर हाल में जीतना ही होता है और जीतने के लिए जिंदा रहना ही होता है… धर्म युद्ध जैसा कोई युद्ध नहीं होता. युद्ध में जांघ पे गदा मारनी ही पड़ती है.

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