अप्प दीपो भव : दो वक्त की रोटी और आराम कमाने के बीच भी सध जाता है ध्यान

अहोभाव स्वामी जी ध्यान में सातत्य कैसे बनाए रखें? दो वक्त की रोटी व थोड़ा आराम कमाने में ही 24 घंटे गुजर रहे हैं क्या करुँ? – Navneet Goyal

प्रिय नवनीत गोयल

प्रेम प्रणाम

ध्यान में सातत्य बनाये रखने के लिए आप जो भी कर रहे हैं चाहे वह कोई भी कार्य हो उसे ही बोध पूर्वक होश पूर्वक समग्रता से करें यही उपाय है. अगर चौबीस घंटे में ध्यान के लिए एक घंटा अलग से नहीं निकाल सकते हैं तो उससे बहुत परेशान होने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि ध्यान कोई क्रिया नहीं है लेकिन किसी भी क्रिया के साथ इसे जोड़ा जा सकता है.

शुरू शुरू में शारीरिक शुद्धीकरण मानसिक और भावात्मक शुद्धीकरण के लिए ओशो का सक्रिय ध्यान बहुत सहायक हो सकता है अगर उसके लिए भी सवेरे आप एक घंटे का समय नहीं निकाल सकते हैं. तो फिर ध्यान पूर्वक होश पूर्वक ही सभी काम करने कि कोशिश कीजिये शरीर तो एक स्वचालित यन्त्र है, उसे होश की ज़रूरत नहीं है. उसके लिए भूख प्यास और नींद यह सब सहज और स्वाभाविक क्रियाएँ हैं जो निरंतर घटती रहती हैं.

तो आप दिन भर शारीरिक क्रियाओं को होश पूर्वक देखते रहिये इससे भी बोध सधने लगता है. दिन में हज़ार बार चूकेंगे लेकिन अपनी तरफ़ से फिर फिर कोशिश करते रहने पर धीरे धीरे बात बनने लगती है.

कहीं और जाने की और अलग से कुछ करने की आवश्यकता ही नहीं है. फिर जब शारीरिक क्रियाओं पर होश सध जाये तो विचारों पर भी ध्यान दें और मन में उठती भावनाओं का भी निरीक्षण करते रहें इस तरह पीछे लगे रहने से सातत्य फलित होने की बहुत संभावना है.

ये दुनियादारी है ही ऐसी कि घर परिवार रिश्ते नाते और कारोबार ही इतने महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि अलग से ध्यान करने के लिए लोगों के पास समय ही नहीं होता इसलिए लोग ध्यान की जगह प्रार्थना करना ज़्यादा पसंद करते हैं.

मंदिर मस्जिद के सामने से गुज़रते हुए सर झुका कर नमस्कार करते हुए आगे बढ़ जाते हैं या ईश्वर अल्लाह का नाम ले लेते हैं. यह सभी ध्यान से बचने की तरकीबें हैं. साधारणतया अधिकतर लोग इसी ढंग से जीवन गुज़ार देते हैं. किसी दीवाली दशहरे पर मंदिर चले जाते हैं या ईद के दिन सड़कों पर भीड़ के साथ इकट्ठा होकर नमाज़ पढ़ने का दिखावा कर लिया ताकि सब आस पास वालों को पता चल जाये कि भई मैं भी धार्मिक हूँ.

कभी जीवन में एक दो बार तीर्थयात्रा पर या क़ाबा काशी हो आते हैं तिलक टीका लगा लिया या ख़ास ढंग की टोपी पहन ली यह सब धार्मिक होने के सस्ते उपाय हैं तरीक़े हैं और हज़ारों साल से यही सब प्रचलित हैं.

लोग प्रार्थना के नाम पर मन्नत माँगते हैं कि मेरी नौकरी लग जायेगी या यह काम हो जायेगा तो मैं सोने का मुकुट साईं बाबा को चढ़ाऊँगा या इतने ग़रीबों को भोजन करवाऊँगा इस तरह का लालच देकर अपनी मनोकामना पूरी करवाने का निवेदन कर देते हैं. अधिकतर लोग इसी अंधविश्वास के भरोसे रहते हैं कि हम तो इससे ज़्यादा और कुछ नहीं कर सकते सब परमात्मा पर ईश्वर अल्लाह के भरोसे वही सब करता धरता है. आप सौभाग्यवान हैं कि सतत ध्यान में रहने की प्यास जगी है.

तो इससे पहले की यह प्यास धूमिल होकर बुझ जाये अपनी तरफ़ से प्रयास करते रहिये यह ध्यान का जगत ऐसा है कि सब कुछ स्वयं पर ही निर्भर करता है. न कोई गुरु, न कोई बुद्ध पुरुष ही कुछ कर सकता है. हाँ उनके सानिध्य में उन्हें देखकर ध्यान की प्यास जग सकने की संभावना ज़रूर होती है उनके वचनों को पढ़ना या सुनना भी बहुत उपयोगी हो सकता है.

तो ओशो के प्रवचन सुनते रहिये रात सोते समय सुनते सुनते ही नींद में प्रवेश करें. यह सरल सा उपाय है आपके भीतर प्यास है तो इसी प्यास से आगे की यात्रा संभव होगी. वैसे तो हम जो भी कृत्य करते हैं या सोचते हैं हम जाने अनजाने अपना ही निर्माण कर रहे होते हैं.

हमारा प्रत्येक कृत्य अगर वह ध्यान से जागरुकता से निकलता है तो हम पल पल ध्यान की भूमि को सींचेंगे और अगर हम यन्त्रवत जीने के आदि हैं तो हम धीरे धीरे एक चलती फिरती मशीन हो जायेंगे.

– स्वामी कृष्ण वेदान्त

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY