कुछ कहानियों का अधूरा रह जाना ही उनकी पूर्णता है!

कभी कभी मुक्ति की आकांक्षा का बीज अधूरी कहानियों में छुपा होता है, जो समय की आंधी में भी अपना स्वभाव नहीं खोता. और वो आंसू की नमी के साथ अंकुरण के पहले की टूटन को हल्का कर लेता है.

टूटने की पीड़ा के बाद अंकुरित हुई वो पतली और नाज़ुक सी डंडी जब सूर्य की ऊर्जा और ऊष्मा पाती है तो विस्मृत होने लगती है पीड़ा.

मैंने उसके जीवन में वही आंसू बनकर प्रवेश किया था. कठोर बीज जानता नहीं था अपनी वृक्ष हो जाने की संभावना. फल और फूलों के सपने दिखाकर मैंने उसे छलावा दिया. एक सच्चा छलावा… जिसे कहीं से भी आप झूठ नहीं कह सकते.

प्रेम और पीड़ा के बारी बारी के प्रहार में वो उलझता रहा, उसे समझ नहीं आ रहा था मेरे इस बदलते रूप का मनोविज्ञान. वो मानवीय स्वभाव की ज्ञात परिभाषाओं में मेरे व्यवहार का अर्थ खोजता और उसके सीमित अर्थों के साथ नाराज़गी के नकाब में कहीं छुप कर बैठ जाता.

मैं हर बार उसके चेहरे से नकाब उतार देती, और “उपनिषद” के वास्तविक अर्थों को प्रकट करके समझाती कि कुछ बातें शब्दों में तो क्या हमारे मस्तिष्क के किसी तंतु में भी तुम्हें नहीं मिलेगी. ना तुम पिछले जन्मों के साथ उसे लेकर आये हो ना आनेवाले किसी जन्म में तुम्हें मिलेगा.

बहुत कीमती कुछ क्षण हैं जो बस अभी, यहीं, इसी वक्त अवतरित हुए हैं, और वो हर बार उसे खेल समझकर उस क्षण को गँवा देता. और अस्तित्व को एक और बहाना मिल जाता कि उसकी किस्मत में ही नहीं था.. लेकिन मेरी जिद के आगे अस्तित्व को भी झुकना पड़ रहा था… और मैं अपनी किस्मत के कुछ पल चुराकर उसकी झोली में डालती जा रही थी…

लेकिन वो अपनी हथेलियाँ आगे नहीं बढ़ा पा रहा था.. मानवीय स्वभाव स्वाभिमान, दर्प, अहंकार, अपमान और समर्पण जैसी ज्ञात परिपाटी के आसपास ही विचरता है… मैं हमेशा से कहती आई हूँ सामाजिक से प्राकृतिक होने प्रक्रिया ही वास्तविक अध्यात्म है. लेकिन मान सम्मान प्रतिष्ठा में उलझा आदमी प्राकृतिक होने से डरता है.

लेकिन था तो जिज्ञासु… वो तरह तरह के छद्म आवरण ओढ़े हर बार मेरे पास आता शायद कहीं कोई सिरा उसे मिल जाए जिसे पकड़कर वो उन अर्थों तक पहुँच सके जो सीमित ज्ञात शब्दों की पकड़ में नहीं आ रहे थे. और मैं हर बार कहती… ये आवरण ही बाधा है… जिस दिन अपने वास्तविक स्वरूप में आओगे अर्थ भी समझ आने लगेंगे…

लेकिन है तो मेरा ही अंश.. मेरी ही तरह ज़िद्दी… उसकी जिद के आगे मुझे झुकना पड़ा… एक दिन तय कर लिया अब सारे प्रयास छोड़ देती हूँ… शायद मेरा प्रयास भी तो बाधा ही है…

लेकिन महामाया की योजना को हम कहाँ समझ पाते हैं… मैंने प्रकट रूप में उसे स्वतन्त्र करना चाहा तो वो स्वप्न में (जिसे विज़न कहना अधिक उचित है ) भेजा जाने लगा. एक आठ दस वर्ष का बालक मेरे घर के बाहर घूम रहा है, अन्दर आने के लिए मचल रहा है और मैं बिलकुल तटस्थ हो गयी हूँ कि अब मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकती… मैं रसोई में जाती तो रसोई के बाहर की जाली से मेरी थाली में कुछ खाने की वस्तु डाल देता… जबकि जाली ऐसी है कि सिर्फ हवा आ जा सकती है…

मैं घर के सारे दरवाज़े बंद कर लेती हूँ और अपने बिस्तर पर मुंह ढंककर सो जाती हूँ… अचानक आँख खुलती है.. पता नहीं स्वप्न में खोली थी या सच में लेकिन देखती हूँ चादर हवा में है और आँख खुलते ही तुरंत नीचे गिर जाती है… बाजू में मुझे किसी के होने का अहसास होता है मैं पलटकर देखती हूँ तो वो बच्चा मेरे बाजू में सोया है.. और खूब खिलखिलाकर कहता है… लो मैं तो आ गया अन्दर अब क्या करोगी… एक सेकण्ड के लिए लगा मैंने वास्तव में उसे देखा है.. मैं तुरंत उठकर बैठ जाती हूँ तो वो अचानक गायब हो जाता है…

उस रोज़ मुझे लगा इस जन्म में चाहे उसने कितने भी वसंत पार कर लिए हो लेकिन मेरी चेतना की उम्र के हिसाब से अभी वो आठ दस साल का बच्चा ही है. हमेशा से माई ही कहता आया है… है तो पुत्र समान ही… वर्ना स्वप्न में इस उम्र में दिखने का और कोई कारण नज़र नहीं आता…

पिछले जन्म का न जाने कौन सा रिश्ता है, कोख से जाया नहीं लग रहा लेकिन अक्सर वो मुझे मेरी पान की गिलोरी से तम्बाकू चुराकर भागता दिखाई देता है… और मैं उसके पीछे उसको गालियाँ देती हुई भाग रही हूँ रुक कमीने तेरी चचीजान में अभी बहुत जान बाकी है… अगले जन्म तक तेरा पीछा करूंगी…

न जाने किस समय कौन सा शब्द मुंह से निकला हुआ सच हो जाता है… हमें खुद नहीं पता… मैं आज तक उसका पीछा कर रही हूँ… और वो कमीना आज भी मेरे आगे आगे भाग रहा है…

कभी पलट कर देखेगा तो जान पाएगा… मैं तो तभी रुक गयी थी जब बीज टूट गया था और टूटने की पीड़ा के बाद अंकुरित हुई वो पतली और नाज़ुक सी डंडी अब सूर्य की ऊर्जा और ऊष्मा पाकर बीज के वृक्ष होने की संभावना को पा रहा है… पीड़ा का क्या है वो तो समय के साथ विस्मृत हो ही जाती है…

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