आकाश से धरा तक, विस्तार चाहती हूँ, हे मीत! बस तुम्हारा, मैं प्यार चाहती हूँ!

है रात आज काली, घनघोर है अँधेरा|
बेचैनियां हृदय में, करने लगी बसेरा||
भीगी हुई हवायें, बंसी बजा रही हैं|
आँसू भरे नयन में, सपने सजा रही हैं||

तुम दूर जा रहे हो, या पास आ रहे हो|
इतना मुझे बता दो, तुम क्यों सता रहे हो||
प्रिय! प्रेम का सदा मैं, श्रृंगार चाहती हूँ|
हे मीत! बस तुम्हारा, मैं प्यार चाहती हूँ||

मन में जगी उमंगें, प्रिय साथ हो हमारा|
मझधार में फंसे हो, या दूर हो किनारा||
उर भाव की नदी में, संचार भाव भर दो|
हिमशीत से पलों में, अभिसार भाव भर दो||
अपने अधर कमल से, संजीवनी पिला दो|
मृतप्राय हो रही मैं, नव प्राण पुंज ला दो||
सौभाग्य पर तुम्हारे, अधिकार चाहती हूँ|
हे मीत! बस तुम्हारा, मैं प्यार चाहती हूँ||

ठहरी लगे धरा ये, आकाश घूमता क्यों|
दृग झील के कँवल को, ये चाँद चूमता क्यों||
हर राह खिल रही है, गलियाँ महक रही क्यों|
बिन वात के बसंती, पीहू चहक रही क्यों||
प्रिय! साथ से तुम्हारे, हर रात जगमगाती|
परिजात से महक ले, हर बात महमहाती||
आकाश से धरा तक, विस्तार चाहती हूँ|
हे मीत! बस तुम्हारा, मैं प्यार चाहती हूँ!!

– श्वेता राय

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