एकांत : अनन्तकाल से बांची गयी प्रेम-कथा

न जाने कैसा आकंठ कोलाहल और दिग्भ्रम था
एक अनचाही डगर, सांकलों की खड़खड़ाहट..
पत्थर और पत्थर पर खड़े-बैठे चेहरों में साम्य इतना कि,
जैसे, विराट संगीत-समागम के बाद छाई निर्मम निस्तब्धता.. !
जीवन व साँसें गतिमान तो थी,
लेक़िन, अस्तित्त्व पलायन कर अवसान हेतु अग्रसर था.

मुझ पर तलवे और तालु को एक साथ भिगोये रखने की भीषण चुनौती थी,
तभी, एक साँकल खुली,
सामने बगैर नैन-नक़्श का सपाट, शान्त चेहरा उदीयमान था….
कुछ उसमें अपनत्व व सखाभाव ही था जिसने मुझे “उपनिषद”सा भाव दिया,
उपनिषद …मतलब गुरु के समीप बैठना.

“यहाँ क्यों हो?, कस्तूरी मृग न बनो” साधिकार कहा उसने
“कौन हो तुम?”,, उसकी सर्द हथेली छूते हुए मैंने पूछा….
“मैँ तुम्हारे अकेलेपन का अंत हूँ……
“एकांत “हूँ !!!”

कालांश में वह प्रत्यागमन कर गया…
हिमशिलायें पिघलने लगी, हथेली पर जमीन, आँखों में आकाश और साँसों में सुगन्ध थी.
उस क्षण, मुझे लौटने की कोई जल्दी नहीं थी.

अब, मैंने समाधिस्थ होकर अन्तस् में समेट लिये हैं, वे सारे पल..
जिन्हें मैंने एकांत के अलभ्य क्षणों में कमाया था
और उन्हें भी,
जिन्हें अकेलेपन की चीख में जब-जब पल्लू से बांधा,
तो, उन्होंने मुझे चौराहे में”बिजूका” सरीखा बना दिया था.

सच है,
एकांत, अनन्तकाल से बांची गयी प्रेम -कथा है,
जो मौन समर्पण से मन-वेदी पर चढ़ायी हुई अकेलेपन की पूर्णाहुति है.

  • मंजुला बिष्ट

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