आपबीती : गैस का चूल्हा, मिट्टी का चूल्हा

बचपन से गैस चूल्हा रहा घर में. 2005- 2006 में मेरे पति की पोस्टिंग अलीगढ़ में हुई थी. महीना बीतने से पहले वहां दंगा भड़क गया था. एक शार्प शूटर ने रेलवे रोड स्थित किसी प्रतिष्ठान के मालिक को शाम के नीम अँधेरे में शूट कर दिया. ये हत्या सांप्रदायिक रंग में कैसे रंग गई ये मैं अब नहीं बता सकूँगी.

फना मूवी रिलीज़ हुई थी और ग्रैंड सुरजीत थिएटर में लगी हुई थी. हमने मूवी देखने का सोचा और चले गए. मूवी खत्म होने में 15 – 20 मिनट ही रहे होंगे कि लोकल लोगों के मोबाइल बजने लगे और लोग धड़ाधड़ थिएटर से निकलने लगे.

हम तो अलीगढ़ में नए ही थे और जाहिर है हमारे कोई रिश्तेदार भी वहां नहीं रहते थे तो हमें किसी का कोई फ़ोन नहीं आया. हमें मामला समझ तो नहीं आया पर लोगों की देखादेखी हम भी निकल लिए.

शाम 4-5 का वक़्त होगा. जैसे हमलोग निकल भागे थे ठीक उसी तरह एक नवविवाहित जोड़ा बाइक से उसी थिएटर से निकल कर रेलवे रोड होते हुए अपने घर की तरफ बढ़ा. पर न जाने कैसे हिंसक भीड़ ने लड़के को मार दिया. गोली मारी या कैसे मारा ये अब याद नहीं आ रहा मुझे.

हम क्वार्सी, रामघाट रोड पर रहते थे जो अपेक्षाकृत सुरक्षित इलाका था. घर पहुँच कर मकान मालिकों से कुछ जानकारी मिलने लगी कुछ ऑफिस के लोगों के फ़ोन से.

दिनचर्या पर कुछ ख़ास फर्क नहीं पड़ा. पर समस्या ये हो गई कि इंडियन ओवरसीज बैंक में सैलरी अकाउंट था. पर इस बैंक और इसका एकमात्र एटीएम दोनों रेलवे रोड में स्थित थे जहाँ कर्फ्यू लगा दिया गया था.

पैसे अकाउंट में आये हुए थे पर निकल नहीं सकते थे. तब दूसरे किसी एटीएम से निकलने की सुविधा भी नहीं थी. रेलवे रोड पर कर्फ्यू था पूरे शहर में बिजली की अबाध आपूर्ति थी. ताकि एक सेकंड भी अँधेरा ना हो.

मेरी मकान मालकिन आंटी जाट थीं. एक रईस लेकिन मेहनती दबंग टाइप की महिला. तीन भैसें पाले हुई थीं और सानी पानी अकेले दम पर करती थीं.

मैं उनसे कहने गई कि ऐसी ऐसी बात है मैं किराया समय पर नहीं दे सकूँगी. पैसे जैसे ही निकलेंगे सबसे पहले उन्हें ही दूँगी. जवाब में उन्होंने जो कहा मैं कभी नहीं भूल सकूँगी.

उन्होंने कहा- मुझे पैसे की कोई जरूरत ना है, इन पैसों से मेरा घर ना चले है. तू बिलकुल चिंता ना कर. और घर चलाने के लिए तो तू मुझसे पैसे लेती जा. मेरे पास रहकर तू किसी तरह की तकलीफ ना करना.

मैं कहती तो क्या पर मेरे सीने का बोझ थोड़ा हल्का जरूर हुआ. पैसे लेने नहीं थे. जो अपने पास था उसी को चलाना था. और अपना आत्मसम्मान भी मेन्टेन रखना था.

खाने पीने तो किसी तरह चला ही लेना था. पर अहसास था कि गैस सिलिंडर खाली हो जाना वाला है. अगले कुछ दिनों में मैंने बहाने बहाने से आंटी को कहा कि आप इन उपलों का अच्छा उपयोग करती हैं पानी वानी गर्म करने में. कुछ और इधर उधर की बातें भी कही होगी जो अब मुझे याद नहीं.

जाने कैसे उन्होंने कहा दिया कि बुध के फेट से तू भी एक लोहे का चूल्हा मँगवा ले मैं मिटटी चढ़ा दूँगी. तू ऊपर ऊपर के काम कर लिया करना.

अँधा क्या चाहे दो आँखें! मैंने झट चूल्हा मँगवा लिया. चुपके से कोयला भी मंगवा के रख लिया. चूल्हा पे मिटटी चढ़ते सूखते गैस सिलिंडर भी टें बोल गया.

मैं ऊपर ऊपर का काम बोल कर उपले ले आती और ऊपर छत पर ले जा चूल्हे में ताव दे के कोयले सुलगा लेती और उसके ऊपर ही खाना बनाती.

बस सावधान रहती कि मेरी बेटी जिसने चलना बस शुरू ही किया था वो चूल्हे तक ना पहुँच पाये.

चूल्हा जब तक जला रहता दिन भर की सारी चीजें तैयार करनी होती थीं. बेटी को भी दिन भर जो भी खिलाना होता तैयार कर लेना होता था. खिचड़ी, दलिया या कुछ घरेलू स्नैक्स.

लिमिटेड सामान, पैसों में चलना था. और दिन अनलिमिटेड थे.

आगे का कुछ समझ नहीं आ रहा था.

मायके ससुराल जहां भी बात होती हम अपनी खैर खबर सुनाते थे पर चूल्हे की बात कहीं नहीं बताई हमने.

महीना बीतते बीतते कर्फ्यू हट गया. माहौल सामान्य होने लगा और पैसे निकले तो गैस भी आ गया. समय बीता और संयम से बीता.

अगले महीने जब ससुराल लौटी तो दंगों की बात करते बताते ये बात भी निकल गई. मेरे पति ने कहा कि इसने तो एक महीना कोयले के चूल्हे पर खाना बनाया.

मेरी सासु माँ ने तो झट से कह दिया कि अब जैसी परिस्थिति बन गई थी उसमें और क्या करती.

पर भईया (मेरे जेठ) के मुँह से थोड़ी देर आवाज नहीं निकली. भावविह्वल होकर कुछ मिनट के बाद बोले हम जानते हैं ई बहुत अच्छी लड़की है हर परिस्थिति को सम्हाल लेगी.

जब अपनी माँ को बताए तो भौचक हो के पूछने लगी कि तुम चूल्हा में ताव देना कब सीखी?

आवश्यकता आविष्कार की जननी होती है. जानवर भी अपनी जरूरत पूरी करना और अपनी सुरक्षा करना जन्मते सीख लेता है. हम तो इंसान हैं. बस आदत खराब किये बैठे हैं.

और आदतों का क्या है अपने दृढनिश्चय की बात है!
और शायद जरूरत की भी .
तो लो भैये अभी जरूरत भी सरकार ने मुहैया करा दी है. कुछ तो फायदा उठा लो.

– कल्याणी मंगला गौरी

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