कानून सबके लिए बराबर है?

सच पूछिए तो ऐसा होता नहीं है, हाँ फ़िल्मी डायलॉग, संवादों के जरिये ये झूठ हमारे दिमाग में बिठाया जरूर गया है. कानून एक अलग शब्द है, न्याय या इन्साफ से उसका कोई ख़ास लेना देना नहीं होता, तो ये सबके लिए अलग-अलग ही होता है.

भारतीय समाज के कानूनों में गैरबराबरी देखने के लिए बाल विवाह सम्बन्धी कानून एक अच्छा विकल्प होते हैं, तो उदाहरण के तौर पर हम उसे ही चुन लेते हैं.

आम बोलचाल में, टीवी पर आते प्रचार में और सामान्य से कानून को एक विषय की तरह ना पढ़ने वाले वाले लोगों के हिसाब से बाल विवाह एक ऐसी शादी है जहाँ लड़की की उम्र अट्ठारह साल से कम, या लड़के की इक्कीस साल से कम, या फिर दोनों ही हो.

अदालती कार्रवाई के लिए कानूनों को देखेंगे तो ऐसा नहीं होता. ग्रामीण क्षेत्रों में जहाँ बाल विवाह, गरीबी, अशिक्षा और ऐसी दूसरी वजहों से ज्यादा होता है वहां इसके नतीजे भी स्वास्थ्य, महिला कल्याण जैसे विषयों पर ज्यादा पड़ते हैं.

ऐसी चीजों को रोकने की बातें करते हुए ही करीब नब्बे साल पहले बाल विवाह रोकने का कानून ब्रिटिश हुकूमत 1929 में लायी, जिसे कभी कभी शारदा एक्ट भी कहते हैं. ब्रिटिश सरकार का कानून जाहिर सी बात है कि हिन्दुओं के प्रति विशेष दुराग्रह रखता था.

समय के साथ इस एक्ट में बदलाव हुए हैं, लेकिन जहाँ नींव ही खराब हो, वहां मीनार तो झुकी हुई ही बनती. ये कानून ना तो कभी अपने पैर पर सीधा खड़ा हो पाया, ना ही इसकी आज के समाज में ज्यादा उपयोगिता नजर आती है.

सन 2006 में बाल विवाह प्रतिरोधक कानून (Prohibition of Child Marriage Act, 2006) जब बना तो इसमें बाल विवाह के लिए दो साल तक की बामशक्कत कैद और साथ ही एक लाख रुपये तक का जुर्माना भी किये जा सकने का प्रावधान था.

यही कानून 21 से कम के लड़के और 18 से कम की लड़की की शादी को बाल विवाह घोषित करता है. इस एक्ट के मुताबिक नाबालिग लड़की से शादी में, पति अगर बालिग है, तो उसे पत्नी को गुजारा भत्ता देना होगा, अगर वो नाबालिग है तो उसके परिवार को लड़की का गुजारा भत्ता देना होगा.

अगर शादी थी तो दोनों पक्षों ने करवाई होगी. लड़की के परिवार पर क्या कार्रवाई होगी? मालूम नहीं.

इस किस्म की शादियों को अवैध घोषित किया जा सकता है, लेकिन वो दोनों पक्षों पर निर्भर है. जब शादी कानूनी तौर पर एक समझौता (बालिगों का कॉन्ट्रैक्ट), मानी जाती है तो नाबालिगों का कॉन्ट्रैक्ट, अवैध कॉन्ट्रैक्ट, अपने आप ही खारिज़ क्यों नहीं होता ये भी मालूम नहीं.

हाँ, आम शादियों जैसा झूठ बोलकर, धोखे से की गई शादियाँ, अपहरण करके करवाए विवाह, या बच्चों की तस्करी जैसे अपराधिक, या अनैतिक इरादों से करवाई गई शादियाँ अवैध हो जाती हैं.

ये एक्ट बाल विवाह रोकने वाले अधिकारी की नियुक्ति की बात भी करता है. मेरे आपके इलाके में इस काम के लिए कौन से अधिकारी हैं, वो एक अलग शोध का विषय हो सकता है.

इस एक्ट (Prohibition of Child Marriage Act, 2006) में जो प्रावधान दिए गए हैं वो शादी से सम्बंधित दूसरे भारतीय कानूनों से कैसे अलग हैं वो देखना और भी रोचक होता है.

जैसे ये एक्ट तो बाल विवाह को अवैध करार देता हैं, लेकिन अगर हिन्दू मैरिज एक्ट 1956 के प्रावधान देखें तो सिर्फ शादी करने वाले पति-पत्नी (यानि दो बच्चों) को सजा दी जा सकती है. उनके माँ-बाप, या पंडित जिन्होंने असल में शादी करवाई उन्हें कोई सजा का प्रावधान नहीं है.

लड़की विवाह को अवैध करवा सकती है लेकिन ऐसा तभी होगा जब उसकी शादी पंद्रह साल की उम्र से पहले हुई हो, और वो 18 की होने से पहले मुकदमा कर दे, अपने आप विवाह को खारिज नहीं माना जायेगा.

दूसरी तरफ अगर मुस्लिम पर्सनल लॉ देखें तो ये पता चलता है कि भारत में मुस्लिम कानून तयशुदा हैं ही नहीं. ये पूरी तरह मौलानाओं के सही मतलब निकालने पर निर्भर है.

मुस्लिम कानूनों के तहत बाल विवाह पर कोई रोक नहीं है. परवरिश करने वाले गार्डियन को बच्चे की शादी करवाने का पूरा हक़ है. हाँ शादी कर रहे जोड़े को को यौवन तक रुकने के खयर उल बालिग़ जैसा एक हक़ है.

मुस्लिम कानूनों में यौवन या बालिग होने का मतलब लड़की की उम्र 15 साल है, हाँ अगर सात साल से कम की उम्र में शादी करवाई हो तब जरूर ये अपने-आप ख़त्म माना जाएगा.

क्रिश्चियन मैरिज एक्ट कुछ और ही कहता है, उसके मुताबकि अगर नाबालिगों में शादी होनी है तो उन्हें 14 दिन पहले नोटिस देना होगा. चौदह दिन तक अगर किसी ने विरोध नहीं जताया, तो शादी बालिग़ की थी, नाबालिग की थी, परिवार की मर्जी से थी या नहीं, किसी बात से कोई मतलब नहीं. शादी हो सकती है.

पारसी मैरिज एंड डाइवोर्स एक्ट में बाल विवाह सीधा गैरकानूनी है, लेकिन वो बाल विवाह को परिभाषित नहीं करता. किस उम्र के लोगों को बच्चा / नाबालिग माना जाएगा ये नहीं बताया गया है.

यहूदियों के ज्यूइश लॉ फिर से लिखित नहीं हैं, उसमें शादी के योग्य, यौवन (प्युबर्टी Puberty) की उम्र बारह साल तय है.

ऐसे उलट-फेर से भरे कानूनों के बीच जब हम बाल विवाह को रोकने की बात करते हैं तो ये भी याद रखना होगा कि जिन कानूनों की बात की है वो केन्द्रीय कानून हैं.

भारत एक गणराज्य है और यहाँ हर राज्य में कानून अलग अलग होना बिलकुल संभव है. उत्तर पूर्व के राज्यों में जो चलता है, वो कश्मीर में लागू नहीं, मध्य भारत के नियम दक्षिण भारत से अलग हैं.

इन सब के बीच जब बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार बाल विवाह को रोकने के लिए सामाजिक पहल की बात करते हैं, तो वो इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि कानूनों से या एक कानून से इस समस्या से निपटना संभव नहीं. एक जैसे कानून की बात, यूनिफॉर्म सिविल कोड की एक दूसरी बहस की तरफ चली जाती है.

ये समस्या बच्चों के भविष्य की समस्या है, जब तक सामाजिक बदलाव के जरिये इसे स्वीकार नहीं कर लिया जाता, इसका पूरी तरह खात्मा असंभव है. बजाये इसके कि कानून बना कर मुक़दमे बढ़ाए जाएँ सबसे बेहतर है कि समाज खुद को बदले और कानून बनाने की जरूरत ही ना पड़े.

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