अधूरा उपन्यास – 6 : दो अलग-अलग किताबों के दो किरदार…

दो दुनिया को जीने की तरह वो अक्सर दो किताबें एक साथ पढ़ता है…

रात को अक्सर पढ़ते हुए दोनों किताबों को एक दूसरे का बुकमार्क बनाकर एक दूसरे के पन्नों में फंसाकर तकिये के नीचे रख सो जाता है….

फिर शुरू होती है एक नई कहानी… एक किताब की नायिका की दूसरी किताब के नायक से मुलाक़ात…

दोनों एक दूसरे से अनजान.. लेकिन कुछ ऐसा है जो दोनों के बीच साझा है… शायद अर्जुन का दोनों को एक साथ पढ़कर दोनों के लिए प्रेम जागना… पाठक का किताब से और क्या नाता होता है… एक काल्पनिक कहानी में वो अपने जीवन की हक़ीक़त खोज लेता है और बस एक पराई कहानी उसकी अपनी हो जाती है… फिर वो भूल जाता है लेखक का नाम, कभी कभी किताब का भी… याद रह जाते हैं तो बस किरदार…

और पाठक जब अर्जुन जैसा हो तो दो अलग किताबों के किरदार को मिलवा भी देता है…

एक रोज़ उसने देखा एक किताब के बुक मार्क लगे पन्ने से नायिका निकल कर आती है और दूसरी किताब के पन्नों पर टहलने निकल जाती है…

एक ऐसे ही भीड़ भरी सड़क पर दीखता है एक चेहरा… और बस… कहीं पढ़ा था उसने Love at first sight… पता नहीं ऐसा कैसे हो जाता है… लेकिन आज उसे समझ आता है हाँ पहली नज़र का ही प्यार है ये बस उस पहली नज़र में ही वो पहचान लेती है पिछली कई कहानियों और उपन्यासों में उभरकर आये नायकों के चेहरे को … बिलकुल पिछले कई जन्मों के चेहरों की तरह…

झाड़ियों और सड़क पर चलते अन्य लोगों के पीछे छुपते छुपाते वो उसका पीछा करने लगती है… उसका चेहरा तो वो नहीं देह पाती लेकिन उसके गले में पड़ा काला धागा उसे दिख जाता है….

जब दो निगाहें पीछा करती है तो आपको प्रत्यक्ष रूप से भले पता न चले लेकिन आपकी चेतना का कोई हिस्सा इस संकेत को जान लेता है… बिना पीछे मुड़े वो जान गया था कि कोई उसका पीछा कर रहा है…

उपन्यास के किरदार के हिसाब से नायक को कभी पीछे मुड़कर देखने की आदत नहीं… तो वो अगले पन्ने के मोड़ पर मुड़ जाता है… और उपन्यास की नायिका अचंभित सी उसे इधर उधर खोजने लग जाती है….

बस आज की कहानी यहीं ख़त्म… क्योंकि बुकमार्क लगे पन्ने को पलटना तो अर्जुन के हाथ में है… और वो अभी गहरी नींद में सो रहा है…

तभी ‘वो’ आता है… बीच सड़क पर किंकर्तव्यविमूढ़ खड़ी नायिका के सामने घुटनों के बल बैठ जाता है… और उसका हाथ थाम कर बड़े प्यार से कहता है….

प्रिया,

ये अदा, अचम्भित होने की छोड़ना भी मत….. मैं जो कुछ भी हूँ तुम्हारे ही बूते हूँ…. तुममें ज़रा सा भी बदलाव निश्चित ही मुझमें भी परिवर्तन लायेगा….. तुम अचम्भित होती रहना, मैं अचम्भित करता रहूंगा.

ये तो मैं भी कहता हूँ कि तुमने बहुत पुण्य किए होगे और कर रही हो… एक मामूली व्यक्ति को महत्वपूर्ण बना देना कम पुण्य का काम है? एक मुरदे को ज़िंदा कर देना क्या पुण्य नहीं?

सृष्टि के नियमानुसार निश्चित ही इन पुण्यों का परिणाम भी प्राप्त होगा…. पर हम कब परिणामों को लक्ष्य बना कर कर्म करते थे या हैं? बल्कि हम कर्म करते ही कब हैं, नियति हमे स्वयं ही लिए जा रही है परिणाम तक……. यही नहीं है क्या निष्काम कर्म…… जो हम कर सकते हैं, किया…. कर रहे हैं…. करते रहेंगे…. परिणाम जो हों सो हों, उस पर हमारा क्या ज़ोर?

किसने किसे ढूंढा…. किसे कौन मिला….. ये महत्वपूर्ण नहीं….. बस ढूंढ लिया, मिल गये, पा लिया………… हममें से ही कोई ढूंढने वाला होता तो क्या इतने बरस लगते? पहले क्यों नहीं खोज निकाला? न, कोई और है जिसने ये काम किया, वरना क्या औरो को कभी प्यार नहीं हुआ? फिर हमारा प्यार दुनिया से इतना भिन्न क्यों….. कैसे…. कि इस दुनिया का ही न लगे?

ये दो भौतिक शरीरों का प्यार नहीं, हो भी कैसे सकता है, जब आज तक हमने एक दूसरे को देखा ही नहीं, छुआ ही नहीं, मिले ही नहीं……. ये प्यार है शुद्ध ऊर्जा का मिलन…. सोचो न, आज तक हमारा संपर्क हुआ भी तो कैसे….. मात्र विचारो द्वारा…… लिख कर या कह कर….. सुने होंगे ये शब्द – विचार ‘शक्ति’, लेखन ‘शक्ति’, वाक ‘शक्ति’…….. क्या है ये शक्ति……. पता नहीं लोग कहाँ कहाँ भगवान को ढूंढते हैं…… इसी शक्ति की तो सब माया है….. यही शक्ति तो विभिन्न रूपो में लीला कर रही है….

अरे ये तो कहीं पढ़ा है… – नायिका

हाँ हमारे लेखक महोदय यानी आपके उपन्यास के पाठक अर्जुन साहब जो अभी गहरी निद्रा में सो रहे हैं… उनके ही उपन्यास का अंश है… उसी उपन्यास के लिए वो नायिका ढूँढने निकले हैं…

और नायक?… नायिका ने तनिक लजाते हुए पूछा? और किताब के उस पन्ने ओर इशारा किया जिसके अगले पन्ने के मोड़ पर वह मुड़ गया था…

‘वो’ कहने लगा… यूं तो नायक मैं हूँ उनके उपन्यास का लेकिन वो दूसरे लेखकों के उपन्यासों को पढ़कर उनके नायकों के किरदार को मेरे अन्दर उड़ेलते रहते हैं… इसलिए फिलहाल आपका नायक तो वही है… लेकिन उसे आप भूल जाइए क्योंकि कल रात वो आपका फिर मिलेगा लेकिन इस चेहरे और नाम के साथ नहीं… किसी और चेहरे और नाम के साथ…

जी??? … नायिका आगे कुछ पूछ पाए उसके पहले ही वो सीटी बजता हुआ किताब के बाहर छलांग लगा देता है…

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