रोहित सरदाना ने सिर्फ यह बताया कि हमें छोड़ना होगा ऑपरेशन से डरना

#I_Stand_With_Rohit_Sardana पर लोगो के अपने अपने ख्याल हैं और मैं सभी ख्यालों से बेख्याल हूँ क्योंकि मैं उस सोच के साथ बहुत पहले से ही हूँ जिसका मीडिया में रोहित सरदाना प्रधिनिधित्व करते हैं.

आज मुझे इससे कोई मतलब नहीं है कि रोहित ने फातिमा या मैरी को लेकर सेक्युलर लोगों से क्या प्रश्न किया और इससे किस की भावनाएं आहत हुई हैं. मुझे तो सिर्फ यह मालूम है कि इन दोगले सेक्युलरों और सेक्युलर के बुर्के में फंसी दाढ़ियों ने हिन्दू और हिंदुत्व की भावनाओं का, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर सिर्फ तिरस्कार और उपहास किया है.

आज रोहित सरदाना अपने आप मे कुछ न होकर सिर्फ लाल बत्ती से लपलपाता हुआ एक सन्देश पटल है, जो भारत को यह सावधान कर रहा है कि आज से 70 वर्ष पूर्व जो घाव खुला छोड़ा गया था वो आज फोड़ा बन कर बह रहा है.

आपने यह तो अक्सर ही देखा होगा कि जब फोड़ा हो जाता है, तो डॉक्टर सबसे पहले उसको ठीक करने के लिए दवा देता है. अब कुछ लोग ऐलोपैथी के आलावा अपने अपने विश्वासनुसार, होमियोपैथी, यूनानी या फिर आर्युवेद की दवा से फोड़े का इलाज़ करवाते है.

मेरे ख्याल से यह ठीक भी है, इलाज़ किसी भी तरीके से किया जाये, परिणाम तो हम यही चाहते है कि फोड़ा जल्दी से जल्दी सूख जाये और मरीज को आराम मिल जाए.

अब इन तमाम इलाज़ के बाद भी फोड़ा यदि ठीक नहीं होता है फिर मरीज का क्या हाल होता है?

मरीज दर्द से कराहता है और फोड़ा भी शरीर के अंदर और कॉंप्लिकेशन पैदा कर देता है. यदि मरीज अपने हालात से लापरवाही करता है तो इस फोड़े से, उसके शरीर के अंदर विष फैलने का वास्तविक खतरा खड़ा हो जाता है. मैंने तो, इसके परिणामस्वरूप, कई बदनसीबों की अकाल मृत्यु को प्राप्त होते हुए भी देखा है.

तो फिर होना क्या चाहिए था?

वहीँ, जो हर समझदार मरीज और उसका समझदार डॉक्टर करता है. वो मरीज को टेबल पर लिटाता है और उसका ऑपरेशन कर देता है. यदि कोई अंग या उसका कोई हिस्सा सड़ गया है, तो उसे काट कर के फेंक देता है.

इसमें तकलीफ जरूर होती है लेकिन मरीज ठीक हो जाता है. इसलिए हमें ऑपरेशन से डरना नहीं चाहिए. यदि आप ठीक रहना चाहते है तो यह जरूर पहचान लीजिये कि कब आपके फोड़े पर दवाएं बेअसर हो गई हैं.

अब यह हमारा भारतीय समाज, यह राष्ट्र भारत भी हम और आप ही है. इसमें पनपी दुर्भावना और वहशीपन का सामना करने में जब अहिंसा, मानवता और सदभावना का दर्शन जब बेअसर हो जाते है तो समाज और राष्ट्र को जीवित रखने के लिए ऑपरेशन आवश्यक होता है.

आज रोहित सरदाना का नाम यह बता रहा है कि भारत और उसका समाज मरीज बन चुका है. आज अहिंसा, मानवता और सदभावना ने असर करना बंद कर दिया है और बौद्धिक दुर्भावना व वहशीपन ने उसको अंदर से सड़ाना शुरू कर दिया है. भारत और उसके समाज को यदि आज ठीक रहना है तो आज ऑपरेशन कोई उपाय नहीं है बल्कि उसकी नियति है.

यहां पर यह जरूर ध्यान रखिये कि आप ऑपरेशन से आज सिर्फ इसलिए मुँह नहीं मोड़ सकते है क्योंकि आपको ऑपरेशन से डर लगता है और आपके डर से डॉक्टर को कोई मतलब नहीं होता है. उसकी चिंता तो सिर्फ उस फोड़े को जड़ से खत्म करने की होती है, जिससे मरीज शीघ्र स्वस्थ हो जाये.

हमारे लिये इतिहास इस बात का गवाह है कि अमेरिका में 150 वर्ष पहले दासता का अंत वहां हुए गृहयुद्ध से हुआ था. यहूदियों का 2000 वर्ष का इज़राइल से निर्वासन का अंत द्वितीय विश्व युद्ध के संहार से ही हुआ था.

मेरा मानना है कि युद्ध या गृह युद्ध इतने बुरे भी नहीं हैं, क्योंकि विश्व में कई बार मानवता के फोड़ो का इलाज इन्हीं से हुआ है.

रोहित सरदाना हमको सिर्फ यही बता रहा है कि आपरेशन से डरना हमें छोड़ना होगा. मुझे भी पहले ऑपरेशन से डर लगता था लेकिन अब मैंने डरना छोड़ दिया है.

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