किस मुँह से रोहित के सिर की बोली लगा रहे, महिलाओं को दोयम दर्जे का इंसान समझने वाले!

कहा जाता है कि औरंगजेब की बेटी ज़ेबुन्निसा पर माँ सरस्वती की कृपा थी. एक बार उसने अपने बाप को कविता सुनाई जिसमें शराब का ज़िक्र था. इतनी सी बात पर औरंगजेब आग बबूला हो उठा.

तभी वाणी की देवी माँ सरस्वती एक बालिका के रूप में आईं और ज़ेबुन्निसा से अपने शब्दों को बदलने को कहा. शहजादी ने वैसी ही पंक्तियाँ दूसरे अर्थ में सुना दीं तब जाकर उसकी जान बची.

लेकिन औरंगजेब को ज़ेबुन्निसा का साहित्य, संगीत और धर्म से लगाव अधिक दिनों तक रास नहीं आया. उसने अपनी बेटी ज़ेबुन्निसा को सलीमगढ़ किले में क़ैद कर दिया जहाँ उसने बीस साल यातनाएं झेलने के उपरांत अंतिम साँसे लीं.

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की धुन पर नागिन का नाच दिखाने वाले ऐसे क्रूर बाप को अपना हीरो मानते हैं. यही नहीं, कुछ दिन पहले दीपावली पर बनारस की एक मुस्लिम महिला ने भगवान राम की पूजा कर दी तो उसे भी डराने धमकाने से मुल्ले बाज नहीं आये.

क्यों भई? रामनाम ले लिया तो कौन सा पहाड़ गिर पड़ा? हमारे यूपी में तो बच्चों को कोई समस्या आ जाने पर ‘आल्ला’ (या अल्लाह का बिगड़ा हुआ रूप) कहने की आदत है. उनके माँ बाप तो फतवा जारी कर सिर कलम नहीं कर देते!

विश्व भर के इस्लामी मुल्कों में महिलाओं की स्थिति पर दृष्टिपात किया जाये तो मुसलमानों का सिर शर्म से झुक जाना चाहिए. अरब सदियों से एक बर्बर और जाहिल मुल्क माना जाता रहा है. औरतों को ‘कमोडिटी’ की तरह खरीदना-बेचना इनका धंधा रहा है. आज भी ये कोई सुधरी हुई स्थिति में नहीं हैं.

तसलीमा नसरीन एक लेख में लिखती हैं कि “सऊदी की महिलाएं अपने पति की अनुमति के बिना देश से बाहर घूमने के लिए नहीं जा सकतीं। इलाज कराने के लिए भी यदि वे बाहर जाती हैं तो घर के पुरुष अभिभावक से अनुमति लेनी होती है। पुरुष अभिभावक की अनुमति के बिना लड़कियों को शादी करना, तलाक, स्कूल व कॉलेजों में दाखिला, नौकरी, व्यवसाय करना यहां तक कि बैंक में खाता खुलवाना भी संभव नहीं है। दुख यह है कि वहां नारी विरोधी महिलाएं भी कम नहीं हैं। ब्रेनबॉश के कारण यह कारनामा हुआ है। 2006 में हुए एक सर्वे में सामने आया था कि 100 में से 89 महिलाएं नहीं चाहतीं कि महिलाएं गाड़ी चलाएं। वहीं 86 फीसद महिलाएं नहीं चाहती हैं कि पुरुषों के साथ बैठकर समान रूप से कार्य करें। 90 फीसद महिलाएं नहीं चाहतीं कि अभिभावक कानून खत्म हो। महिलाएं जब खुद ही स्वाभिमान से समझौते को तैयार हैं तो यह हैरान ही करता है।“

तीन तलाक और औरतों को समान अधिकार देने के मुद्दे पर कठमुल्लाओं का समर्थन करने वाली कुछ महिलाओं का भी इसी प्रकार ब्रेन वाश किया गया है. गौरतलब है कि तसलीमा नसरीन के सिर की बोली लगाने से पहले भी नब्बे के दशक में बांग्लादेश में कई लेखिकाओं के फ्रीडम ऑफ़ स्पीच का हनन किया गया था और उन्हें इतना प्रताड़ित किया गया कि तंग आकर कई युवा लेखिकाओं ने आत्महत्या कर ली.

अफ़्रीकी देशों समेत इराक़, यमन और इंडोनेशिया में एक बेहद घृणास्पद परम्परा आज भी जीवित है जिसे ‘फीमेल जेनिटल म्युटिलेशन’ कहा जाता है. इसमें लड़कियों के जननांगो को ब्लेड से काट दिया जाता है. आयान हिरसी अली ने जब इस बर्बर प्रथा के विरुद्ध आवाज उठाई तो उनके खिलाफ भी फतवा जारी कर दिया गया.

तसलीमा नसरीन ने एक स्थान पर लिखा है कि “बहुत से लोग मानते हैं कि फतवा जारी करने का अधिकार केवल मिस्र के अल अज़हर विश्वविद्यालय को है. इस प्रसिद्ध विश्वविद्यालय से एक बार फतवा जारी हुआ था कि यदि मुस्लिम महिलाएं ऑफिस में काम करना चाहती हैं तो उन्हें अपने सहकर्मियों को स्तनपान कराना होगा जिससे वे उनके बच्चे जैसे हो जायेंगे.”

स्मरण रहे कि आधुनिक काल में जिहादी विषबेल अल अज़हर विश्वविद्यालय की नर्सरी में ही उगी थी. ऐसे में यहाँ से महिलाओं के लिए इस प्रकार के फतवे कोई आश्चर्य की बात नहीं.

जो समाज एक औरत को सिर से पाँव तक काले लिबास में ढंक कर इस मुगालते में जीता है कि वह बहुत सभ्य है उसे ‘हिजाब’ के मनोविज्ञान पर किये जाने वाले शोध पर भी नजर डालनी चाहिए. वस्त्र केवल सौन्दर्य अथवा प्रगतिशीलता के ही पर्याय नहीं हैं. जरुरी नहीं कि कोई लड़की आधे-अधूरे कपड़े ही पहने. पूरा शरीर यदि रंग-बिरंगे कपड़ों से ढंका हो और चेहरा, हाथ-पैर दिख रहा हो तो इसमें बुराई ही क्या है?

जब आप अच्छा वस्त्र धारण कर निकलते हैं तो चार लोगों की निगाहें आपकी तरफ अनायास ही घूमती हैं. जब आपको इसका भान होता है कि लोग मेरी तरफ देख रहे हैं तो आपका आचरण स्वतः शिष्ट हो जाता है.

इसके विपरीत जब कोई औरत बुर्का पहन कर सड़क पर निकलती है तो वो जानती है कि उसकी तरफ देखने वाला कोई नहीं. ऐसे में तमाम मुस्लिम महिलाएं हर रोज बेतरतीब ढंग से चलने की आदी हो जाती हैं. इससे उनका ‘नागरिक बोध’ (सिविक सेन्स) क्षीण होता है.

दूसरे शब्दों में कहें तो रास्ते पर चलने का शऊर नहीं आता. मूर्ख मुल्लाओं को ये सब तो नजर नहीं आता उलटे देवबंद के दारुम उलूम का यही काम रह गया है कि आइब्रो बनवाने और बाल छोटे रखने पर लड़कियों के खिलाफ फतवे जारी करें.

ईरान खुद को बहुत बड़ा प्रगतिशील देश साबित करने पर तुला है. वहाँ एक शतरंज की खिलाड़ी ने हिजाब पहनने से इनकार कर दिया तो आफत आ गयी. उसने अमेरिका में जाना स्वीकार किया.

जब मरयम मिर्ज़ाखानी को गणित का नोबेल कहे जाने वाले फील्ड्स मेडल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था तो ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी ने ट्विटर पर मिर्ज़ाखानी के दो चित्र साझा किये थे. एक हिजाब वाला और दूसरा हिजाब के बिना.

हिजाब के बिना चित्र शेयर करने पर ईरानी मीडिया के कुछ लोगों ने बवाल काटा. उन्हें इससे मतलब नहीं था कि मरयम मिर्ज़ाखानी फील्ड्स मेडल के इतिहास में यह प्रतिष्ठित पुरस्कार पाने वाली प्रथम महिला थी. भगवान जाने हिजाब का शतरंज और गणित से क्या सम्बंध है!

मुझे नहीं लगता कि विश्व के नब्बे प्रतिशत मुसलमानों ने मिर्ज़ाखानी का नाम भी सुना होगा. सन 2011 में अरब क्रांति बुर्का-हिजाब की बंदिशों से तंग आकर इनसे निजात पाने के लिए ही हुई थी.

आज जो मुसलमान रोहित सरदाना का सिर काटना चाहते हैं वे बताएं कि उन्होंने मोहम्मद की बेटी और माँ से क्या उपरोक्त बातें ही सीखी हैं? हम हिन्दू तो छोटी बच्चियों को दुर्गा देवी के रूप में पूजते हैं, नवरात्र में माँ की प्रतिमाएं सजाते हैं व्रत रखते हैं. हम अपने समाज की बुरी प्रथाओं को पीछे छोड़ आये हैं.

सही होने का तरीका यह नहीं कि आप दूसरे को गलत ठहरा दें. सही होने के लिए पहले अपनी गलती स्वीकार करनी पड़ती है. मुलसमान समाज यह तय करे कि उसे अपनी विसंगतियों से पार पाना है या फतवे की दूकान सजा कर खुश रहना है.

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