डर न हो तो बढ़ती जाती है उद्दंडता

डर, खौफ, भय… क्या क्या कराता है और क्या क्या करने नहीं देता, इसकी सूची बड़ी लंबी है. और अगर डर न हो तो आदमी क्या क्या करता है इसकी भी.

हर किसी का चढ़ता समय होता है, फिर उसका चरम समय होता है और अंत मे अस्त की ओर जाता ढलता समय. परंतु पेशवा बाजीराव के पराक्रम के केवल पहले दो प्रकार के समय थे, चढता और चरम.

उन्होंने अपने जीवनकाल में कभी पराजय का मुंह तक नहीं देखा. श्रीमंत पेशवा बाजीराव का डर पुरे हिंदूस्थान में फैला हुआ था और उन्हें डर नाम की चीज पता नहीं थी. इसका केवल एक ही उदाहरण प्रस्तुत करता हूं.

यह कथा उस समय की है जब श्रीमंत बाजीराव की माताजी श्रीमंत राधाबाई साहब साठ वर्ष की उम्र को पार कर चुकी थीं. यह ऐसा समय होता है जब मनुष्य को अपने जीवन का दूसरा किनारा नजर आने लगता है और तीर्थयात्रा की इच्छा होने लगती है.

श्रीमंत राधाबाई साहब को भी औरों की तरह यही अनुभूति होने लगी थी. इस यात्रा में चार महत्त्वपूर्ण तीर्थस्थल समझे जाते थे और वह थे मथुरा, गया, प्रयाग, एवं काशी. इस यात्रा को काशीयात्रा कहा जाता था और उसका कारण था काशी का अंतिम पड़ाव होना. काशी में अगर यात्री की मृत्यु हो तो उसकी आत्मा का मोक्ष सुनिश्चित माना जाता था.

यह बात ध्यान में रखिये कि उस समय यातायात के साधन बहुत कम थे और कोई भी लंबी यात्रा खतरों से भरी रहती थी. यह तीर्थस्थान मुग़ल प्रदेश और उनके नियंत्रण में होने के कारण यात्रा से बिना कोई नुकसान पहुंचे लौटना बहुत ही कठिन था.

अपने राज्य से बादशाही प्रदेश में जाना बहुत ही खतरनाक इस लिये भी था क्योंकि मुग़ल सरदार या किसी और राजा के सैनिकों से जान और माल दोनों को खतरा बना रहने के साथ साथ घने जंगल और असुरक्षित रास्तों पर न जाने कब जानवर, ठग, डकैत, चोर उचक्के मिल जायें.

इस लिये लोग बहुत बड़े झुंड में अथवा किसी मुहिम पर निकले हुये सैन्य के साथ ही जाया करते थे, लेकिन सब को यह अवसर कैसे प्राप्त हो?

इन्हीं कारणवश घर का कोई वृद्ध तीर्थयात्रा पे जाने की बात भी करता तो उसके घरवाले उदास हो जाते थे क्योंकि जानोमाल का खतरा तो था ही, परंतु यात्रा में बहुत समय – यहां तक की कुछ वर्ष – लगने के कारण यात्रा का जो अंतिम पड़ाव वाराणसी अर्थात काशी हुआ करता था वहां तक पहुंचते पहुंचते मनुष्य का अंतिम समय आ ही जाता था.

ऐसे समय में श्रीमंत राधाबाई माताजीने अपने पेशवा पुत्र के सामने उन्हें तीर्थयात्रा पर भेजने का प्रस्ताव रखा. चूंकि बाजीराव को डर नाम की चीज पता नहीं थी, उन्होंने तुरंत हामी भर दी.

सन 1735 के फरवरी महीने में श्रीमंत राधाबाई माताजी इस तीर्थयात्रा पर निकल पड़ीं. उनक साथ उनकी कन्या और बाजीराव की छोटी बहन भिऊबाई, भिऊबाई के पति आबाजी नाईक जोशी, और आबाजी के भाई बाबूजी नाईक थे.

नर्मदा पार करने के पश्चात श्रीमंत राधाबाई माताजी और उनके सहयात्री मालवा से होते हुए 18 मई को उदयपुर पहुंचे. वहां के राणाजी ने माताजी को पूरे सम्मान के साथ राजप्रासाद मे ले जाकर गहने, वस्त्र, एवं नगद पैसे और अनेक भेंट वस्तुएं देकर अतिउत्तम आदर सत्कार किया.

उदयपुर में माताजी ने वर्षा ऋतु के पूरे चार माह बिताए. उदयपुर के पश्चात जयपुर के सवाई जयसिंह ने भी माताजी का बहुत बढिया आदर सम्मान करते हुए एक हाथी और ढेरों रुपए दिये.

अब इस बात पर ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा कि राधाबाई केवल पेशवा खानदान की एक बेचारी विधवा नहीं थीं अपितु राजनीति एवं कूटनीति की उच्च कोटि की जानकारी रखने वाली चतुर महिला थीं. शनिवारवाड़ा में उनके राय को विशेष महत्त्व हुआ करता था.

उदयपुर और जयपुर में उन्होंने स्वयं एवं अपने साथ आये पेशवा के राजनीतिज्ञों द्वारा पर्याप्त राजनीति की बातचीत अवश्य की होगी.

इसके पश्चात उदयपुर से निकलते समय जयसिंग ने अपने वकीलों के माध्यम से मुग़ल प्रदेश में यात्रा आसान करने हेतु राधाबाई माताजी के लिये पारपत्रों का प्रबंध किया तथा उनकी सुरक्षा के लिए कुल मिलाकर चार हजार सैनिकों को भेजा.

इसके बाद तीर्थयात्रा में राधाबाई माताजी का पहला पड़ाव था मथुरा. अब यहां जो हुआ वह पढ़ कर आपको बहुत अचरज होगा परंतु वह बताने से पहले मैं आपसे अनुरोध करुंगा कि आप इस लेख का पहला वाक्य फिर से पढें – डर, खौफ, भय… क्या क्या कराता है और क्या क्या करने नहीं देता, इसकी सूची बड़ी लंबी है.

मथुरा में उन्हे मिला वह मुग़ल सरदार जिसे श्रीमंत बाजीराव ने रण में एक से अधिक बार पराजित किया था – मुहम्मद खान बंगश.

बंगश बाजीराव का शत्रु था. अगर रण में वह सामने मिलते तो बाजीराव का सर काटने को वह उत्सुक होता. यहां तक कि किसी और समय में बाजीराव पेशवा की माताजी को वह आगे भी जाने न देकर वापस लौटा सकता था, या अपहरण कर बाजीराव से कुछ राजनयिक लाभ उठा सकता था.

लेकिन बाजीराव के पराक्रम का डर पूरे हिंदूस्थान में ऐसा फैला हुआ था कि श्रीमंत राधाबाई माताजी के मथुरा पहुंचते ही मुहम्मद खान बंगश ने उनका केवल आदरपूर्वक स्वागत ही नहीं किया अपितु माताजी की आगरा की तरफ की यात्रा सुरक्षित हो इसका पक्का प्रबंध भी किया.

इतना ही नहीं, पेशवा बाजीराव के दूत सदाशिव बल्लाल ने पेशवा को लिखे खत में कहा है कि मुहम्मद खान बंगश ने कहा कि “मैं पेशवा की मां को मेरी मां से बिलकुल अलग नहीं समझता.”

बंगश ने माताजी एवं उनके सहयात्रियों को पैसे की किसी प्रकार की कमी ना हो इसलिये उन्हें कुछ रुपये और भेंट वस्तुयें भी दी. महाराष्ट्र में खासकर ब्राह्मणों की विधवा औरतें एक विशिष्ट प्रकार की लाल साड़ी पहनती थीं जिसे ‘लाल आलवण’ कहा जाता था. सर मुंडा हुआ होने के कारण उसी साड़ी के पल्लू से हमेशा ढंका हुआ रहता था.

मुहम्मद खान बंगश ने जो वस्तुएं माताजी को भेंट की उनमें ऐसी ही एक लाल साड़ी भी थी. अब उस समय में न तो इंटरनेट था और न टीव्ही. लेकिन किसी न किसी तरह बंगश को यह जानकारी थी कि एक विधवा महिला को किस तरह की साड़ी देनी चाहिये और उसने वैसी ही साड़ी भेंट दी भी. कहा था न – डर, खौफ, भय… क्या क्या कराता है और क्या क्या करने नहीं देता, इसकी सूची बड़ी लंबी है!

इस पश्चात माताजी एवं उनके सहयात्री काशी पहुंचे, उन्होंने वहा बड़ा दानधर्म किया और अनेक घाट बनवाए तथा कई घाटों की मरम्मत करवायी. फिर दख्खन लौटने के पहले गया होकर वे 1736 के मई महिने में पुणे लौटीं. लौटने पर उनका पुणे के लोगों ने और शनिवारवाड़ा पर बड़ा आदरसत्कार किया गया.

यह केवल एक तीर्थयात्रा थी? बिलकुल नहीं. यह एक तीर्थयात्रा होने के साथ साथ श्रीमंत पेशवा बाजीराव के लिये एक राजनयिक विजय भी थी. इस यात्रा में माताजी ने और उनके साथ गये दूतों ने राजनयिक बातचीत की उसका परिणाम ये हुआ कि दिल्ली के बादशाह मुहम्मद शाह के दरबार में बाजीराव के पक्ष में सोचने वाले सरदारों का एक गुट तैयार हुआ. आजकल लॉबींग का जो प्रभाव दिखता है यह कुछ उसी प्रकार की चीज थी.

डर, खौफ, भय… क्या क्या कराता है और क्या क्या करने नहीं देता, इसका उदाहरण तो हमने देख लिया. अब अगर डर न हो तो आदमी क्या क्या करता है इसकी भी आज के समय का एक उदाहरण देखकर हम चर्चा करते हैं.

संजय लीला भंसाली के पास उसी के कथन के अनुसार बारह साल थे बाजीराव-मस्तानी फिल्म के विषय मे अनुसंधान करने हेतु. इंटरनेट के होते हुए, आधुनिक पुस्तकालय के होते हुए बारह साल के अनुसंधान के बाद उसने अपनी फिल्म में क्या दिखाया?

श्रीमंत महापराक्रमी बाजीराव पेशवा की आदरणीय माताजी को सफेद साड़ी पहने हुए और मुंडन किये हुए सर को खुला छोड़ घूमने वाली, एक पागलपन का दौरा पड़े महिला के रूप में पेश किया. फिल्म में पागलों की तरह कई दृश्यों में हंसते हुए दिखाया.

अब जिसने माताजी को नहीं छोड़ा, वह पेशवा के बाकी रिश्तेदारों को कैसे छोड़ता. बाजीराव की प्रथम पत्नी श्रीमंत काशीबाई साहेब के पैरों मे हमेशा दर्द रहा करता था जिस कारण वह ठीक से चल भी नहीं सकतीं थी. उन्हें मस्तानी के साथ अंग प्रत्यंग का घिनौना प्रदर्शन करते हुए नाचते हुए दिखाया गया.

खुद बाजीराव को मानसिक रूप से असंतुलित और उनके पुत्र नानासाहब को दुष्ट और दुर्व्यवहारी दिखाया गया. और भी बहुत सी चीजें है लेकिन आप को और ज्यादा बोर नहीं करना चाहता.

जो जानकारी आज से लगभग ढाई सौ साल पहले मुहम्मद खान बंगश को थी वह आज अनुसंधान के सारे आधुनिक संसाधन उपस्थित होते हुए भी भंसाली को नहीं होगी? सारे विश्व की खबर रखने वाले बॉलिवुडिया भंसाली को क्या, यहां की औरते कैसे कपड़े पहनती थीं इसकी जानकारी नहीं थी? क्या उसे बाजीराव के पुत्र नानासाहेब तथा प्रथम पत्नी काशीबाई के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं थी?

थी. अवश्य जानकारी थी. नहीं था तो केवल डर, खौफ, भय. गोलियों की रासलीला रामलीला (रामलीला), बाजीराव-मस्तानी, और अब पद्मिनी जो महारानी पद्मिनी बन रही है, वो भी पद्मावती ऐसे नाम बदलकर, इन फिल्मों के जरीये भंसाली ने पूरे हिंदू समाज को खुलकर चुनौती दी है कि “देखो भई, मैं तो नही डरता आप से. और जब डर न हो, तो आदमी क्या क्या करता है ये तो आपने देख ही लिया है. अरे भई, आप जैसे ही तो मेरी फिल्में हिट कराते हैं!”

दाऊद इब्राहीम और बाकी के अंडरवर्ल्ड का खौफ उनको विलन की तरह दिखाने की इजाज़त नहीं देता, और हिंदुओं का डर रहा नहीं इसी लिये हिंदू महापुरुष और महिलाओं पर विकृत फिल्में बनाने की उद्दंडता बढ़ती जाती है.

डर, खौफ, भय… क्या क्या कराता है और क्या क्या करने नहीं देता इसकी सूची बड़ी लंबी है. और अगर डर न हो तो आदमी क्या क्या करता है इसकी भी. अब दूसरे प्रकार का उदाहरण भी आपने देख लिया.

सोचिये, अगर हमारे राष्ट्रपुरुषों एवं महिलाओं का अपमान रोकना है, तो डर कैसे पैदा करना है. या फिर क्रियेटिविटी देखने फिल्म देखनी है, तो देखिये. कुछ ही सालों बाद डर आपके दरवाज़े तक होगा. सोचिये. बाकी जो है, सो हैई है.

श्री मंदार दिलीप जोशी की ब्लॉग पोस्ट से साभार – http://mandarvichar.blogspot.com/2017/02/blog-post_9.html

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