पप्पू निकला बोफोर्स ले के

शहज़ादा इस समय बहुत गुस्से में हैं. लोगों ने उन्हें पप्पू-पप्पू कह के चिढ़ा दिया है. अब खुद को साबित करने के लिए गुजरात फतह को वो इतने उतावले हैं कि पापा की बोफोर्स तोप लेकर रफाल को मार गिराने निकल पड़े हैं.

यहां बोफोर्स कांड की याद नहीं दिला रहा पर शहज़ादे लगातार नरेंद्र मोदी से पप्पू टाइप के कुछ सवाल पूछ रहे हैं रफाल के बारे में. उनके तीन सवाल हैं :

रफाल विमानों के लिए सरकार ने इतनी बड़ी कीमत क्यों दी, रफाल ने रिलायंस डिफेंस के साथ गठजोड़ क्यों किया जिसके पास वैमानिकी क्षेत्र का कोई अनुभव नहीं है और तीसरा यह कि क्या इसमें कमीशन लिया गया या यह अंबानी को फायदा पहुंचाने के लिए किया गया?

सारे सवालों के जवाब विस्तार से बहुत से रक्षा विशेषज्ञ तमाम वेबसाइटों और अखबारों में दे चुके हैं. पर शहज़ादे को इससे क्या मतलब. पढ़ना लिखना तुच्छ काम है उनके लिए, वे अपना समय पीडी के साथ बिताते हैं.

राहुल का कहना है कि उनकी सरकार ने 126 रफाल विमानों के लिए कोई 10.2 बिलियन डालर की कीमत तय की थी. मोदी ने 36 विमानों के लिए 8.7 बिलियन दे डाले. झूठ.

टेंडर के समय भी सौदे की अनुमानित कीमत 12 अरब डालर आंकी गई थी. इतने पैसे में 126 विमान, तकनीक का हस्तांतरण भी हो जाता, विमान भी भारत में बन जाते.

ये तो लूट का सौदा था. फिर किया क्यों नहीं जबकि अप्रैल 2012 में ही फील्ड ट्रायल के बाद रफाल को विजेता घोषित किया जा चुका था. अंदरखाते साल भर पहले से तय था.

नहीं किया. अब कह रहे कीमत ज्यादा दी. पर ये नहीं बताते कि फ्रांस से खाली डिब्बा खरीद रहे थे. अब पूरे के पूरे वेपन सिस्टम के साथ खरीद रहे हैं. इसमें आसमान से मार करने वाली दुनिया की सर्वश्रेष्ठ बियांड विजुअल रेंज (बीवीआर) मिसाइलें मेटियोर और स्काल्प भी होंगी.

शहज़ादे को रणदीप सुरजेवाला ने बता दिया है कि मोदी से पहले विमान के साथ मिसाइलें, सेंसर हमें मुफ्त में मिल जाती थीं.

फिर ऑफ़सेट पॉलिसी के तहत DSSO (Defense System Support Organization) ने रिलायंस को क्यों साझेदार बनाया, हिंदुस्तान एअरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) को क्यों नहीं?

तो साहब कांग्रेस की तरह DSSO कोई आपके घर की कंपनी तो है नहीं कि आप जो कहें वही हो.

एचएएल की प्रतिष्ठा से कोई अंजान नहीं है. सुखोई विमानों को लेकर रूस से सवाल करो तो एकमात्र जवाब होगा – एचएएल से नहीं संभलता. हमने जो तकनीक का हस्तांतरण किया, उसे भी वे आत्मसात नहीं कर पाते.

विकिलीक्स में अमेरिकी राजदूत रोएमर का बयान भी खासा चर्चित हुआ जिसमें उन्होंने एचएएल की क्षमताओं को निहायत संदिग्ध बताया था. यह तब की बात है जब विमानों के फील्ड ट्रायल चल रहे थे.

DSSO ने इसके बाद एचएएल के प्रतिष्ठानों का दौरा करने की मांग की. नाशिक प्रतिष्ठान की हालत देखने के बाद साफ कर दिया कि इनके साथ साझेदारी कर हम अपनी वैश्विक प्रतिष्ठा के मटियामेट हो जाने का जोखिम नहीं ले सकते. लेकिन सुपर स्वदेशी प्राइम मिनिस्टर की सरकार चाहती थी कि विमान एचएएल ही बनाए.

फ्रांस ने स्पष्ट कर दिया कि वह एचएएल में बने विमानों की कोई जिम्मेदारी नहीं लेगा पर कांग्रेस चाहती थी कि विमान एचएएल में बनें और गुणवत्ता की जिम्मेदारी DSSO उठाए.

ऐसे में सौदा नहीं होना था और नहीं हुआ. पर शहज़ादे को यह भी पता नहीं कि सौदे पर दस्तखत दो प्रधानमंत्रियों के बीच हुए थे. रफाल की निर्माता DSSO इसमें कहीं नहीं थी. और सौदा हो जाने के बाद वे क्वात्रोकी टाइप के किसी दलाल को तो पैसे नहीं खिलाने वाले.

हो सकता है कि रफाल के लिए कुछ पैसे ज्यादा दे दिए गए हों पर अंत में यह भारत के लिए अब तक का सर्वश्रेष्ठ सौदा क्यों है? क्योंकि इसके तहत एक अन्य सौदे पर हस्ताक्षर किए गए हैं जो नजर से ओझल है. वह है स्नेक्मा के साथ जिसके बनाए जेट इंजन रफाल में लगे हैं.

स्नेक्मा अब तीन दशक से लटकी पड़ी कावेरी परियोजना में मदद करेगी लेकिन बस इतना ही कि कावेरी इंजन बस ऑपरेशनल हो जाए. अगर इतना भी हो जाए तो बहुत बड़ी उपलब्धि होगी. कम से कम तेजस में तो कावेरी लग ही सकता है. उसके बाद हम उन्नयन का काम कर लेंगे.

दुनिया में कोई किसी को जेट इंजन की तकनीक नहीं देता. रूस से हमने 1200 युद्धक विमान खरीदे हैं पर उसने भी नहीं दी. क्योंकि इंजन बहुत बड़ा बाज़ार है और युद्धक विमानों के इंजन बहुत जल्दी-जल्दी बदलने पड़ते हैं.

बिना इंजन के गाड़ी नहीं चलती और रक्षा क्षेत्र के स्वदेशीकरण के लिए अपना स्वदेशी इंजन चाहिए. वो इंजन मोदी हों या कावेरी… पर प्लीज़, ये बुद्धिहीन, नैतिकता विहीन पप्पू नहीं हो.

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