साँसों में फंसी एक सिसकी और सूने कांधे का विरह गीत

मिलन के पहले की उत्कंठा
और व्याकुलता के चरम पर ही
अक्सर टूट जाता है धैर्य
छूट जाती है
समय की मुट्ठी में भींच कर रखा
उम्मीद की रेत का आख़िरी कण

पहले मिलन का स्वप्न
पूरा होने से पहले ही,
नींद उचटकर गिर जाती है
रात के मुहाने पर
और सूरज थका मांदा सा
दस्तक देता है सुबह के दरवाज़े पर

सूनी सड़क पर
चिलचिलाती धूप में निकली
दोपहर के माथे पर
शिकायतों का पसीना
सांझ होते होते
सूख जाता है

सूरज को क्षितिज पर धकेलती सांझ
प्रतीक्षा की पीड़ा को कविता में पिरोकर
बेचने निकलती है
प्रेम के बाज़ार में

खोटे सिक्कों की खनखनाहट से भरा बाज़ार
नहीं जानता कविता का मोल
तो दो पंक्तियों को कम कर
वो बेच आती है बची हुई कविता…

रात की गुल्लक में जमा हो जाती है
दो और पंक्तियाँ…

विरह के दिनों में बचाकर रखी
ये पंक्तियाँ ही पूंजी है
मिलन की उस घड़ी के लिए
जब सर पर आकाश न होगा
और पैरों के नीचे धरती भी नहीं

हवा में लहराते दो सायों को
कोई देख नहीं सकेगा..

हाँ, अनुभव कर सकेगा सूने कांधे पर
और सुन सकेगा किसी के साँसों में फंसी सिसकी में

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