घोघाबापा का प्रेत – 7

गतांक से आगे…

सामन्त, राजगुरु नंदीदत्त को साथ लेकर यवन सेना की खोज में रेगिस्तान में घुस गया. उसको यकीन था कि उसके पिता इसी रास्ते से आये होंगे, और अबतक रास्ते में यवन सेना से मुलाकात हो ही चुकी होगी.

उसको भलीभांति यह भी यकीन था कि उसके पिता सज्जन चौहान किसी भी हालत में डर से झुक या टूट नहीं सकते थे. फिर क्या हुआ होगा उसके पिताजी के साथ, क्या कभी जीवन में वो अपने पिताजी को फिर से तलवारबाजी के खेल में हरा पायेगा?

इससे आगे वो सोच ही नहीं सका. उसकी आँखों में दो बूँद झिलमिला गई.

[घोघाबापा का प्रेत – 1]

उधर सज्जन चौहान का पराक्रम, उसका प्रचंड हाहाकारी रूप देखकर यवन सेना का मनोबल टूट चुका था. एक दिन में कुछ ही दूर चलना, और रुक रुक कर रास्ते में ‘या अल्लाह या अल्लाह’ कर के अपने जीवित बच जाने की दुआ करना ही सेना की दिनचर्या में शामिल हो गया था.

जब भी हलकी सी भी आंधी चलती, सेना डर के काँप उठती थी. उनको लगता कि सज्जन अभी इसी आंधी के बीच में से काल भैरव का भयानक रूप लेकर झपट्टा मार देगा. काँप तो सुल्तान महमूद भी उठा था उसको तांडव करते देखकर, लेकिन उसने जल्दी ही खुद को संभाल लिया था.

यकीनन महमूद भी तुक्के से विश्वविजेता नहीं कहलाता था. इतनी बड़ी सेना को अस्तव्यस्त होने से रोकना, कुरान में से जन्नत जाने की आयतें ढूंढ ढूंढ कर सेना को सुनाकर उसका मनोबल बढ़ाना उसको अच्छे से आता था.

[घोघाबापा का प्रेत – 2]

सेना को जरुरत पड़ने पर पुचकारना, ज्यादा डर गए लोगों को सबके सामने वीभत्स तरीके से मार देना इत्यादि उसके लिए बाएं हाथ का खेल था. ऐसी हताशा के वक़्त में दो दिन से, सारा दिन ऊंट, घोड़े, पैदल कैसे भी वो सेना में घूम घूम कर चक्कर लगाता रहता था. मजाक से, उग्रता से, या धार्मिक प्रेरणा से हर किसी को उत्तेजित करता रहता था.

मुस्लिम सेना तो सँभलने लगी थी, लेकिन हिन्दू सैनिकों के उत्साह की क्षतिपूर्ति नहीं हो पा रही थी. इनमें से कुछ तो लूट के लालच से, और कुछ अपने कायर और नामर्द राजाओं के आदेश से महमूद की सेना में सम्मिलित हुए थे. लेकिन सज्जन चौहान के दैवीय आक्रमण के बाद से, उनको अपना धर्म याद आने लगा था.

उनको लगने लगा था कि अपने महादेव का धाम तोड़ने के लिए वे मलेच्छ के साथ जा रहे हैं, तो महादेव के तीसरे नेत्र के खुलने में अब तनिक भी संदेह नहीं रह गया है. उनका असंतोष बढ़ता ही चला गया और संभली हुई मुस्लिम सेना भी यदा कदा इस असंतोष से बच नहीं पा रही थी. ऐसे वक़्त में उनकी नमाज बढ़ जाती थी.

[घोघाबापा का प्रेत – 3]

ये हालात देखकर सुल्तान के डेरे में प्रमुख सेनापतियों की बैठक हुई. हर किसी के पास सेना सम्बन्धी समस्या ही समस्या थी. ऊंट थोड़े चल सकते थे, लेकिन हाथी घोड़े बदहवास से हो चुके थे. रसद सामग्री घटने लगी थी. हिन्दुओं ने हिम्मत छोड़ दी, मुस्लिम भी निरुत्साह हो चुके हैं.

“सज्जन चौहान ने जानबूझकर हमें गलत रास्ते में भटका दिया है, हममें से एक भी जिन्दा बचकर वापस नहीं लौट पायेगा” ऐसा सेना के पथप्रदर्शक भी मानने लगे थे. सुल्तान इन सबकी बातें सुन रहा था और अपना दिमाग तेजी से दौड़ा रहा था कि कैसे सेना का मनोबल वापस लाया जाये.

[घोघाबापा का प्रेत – 4]

इतने में सूचना आई कि मुल्तान के मुखिया का संदेशा लेकर दो आदमी आये हैं. सुल्तान हर्षित होकर कह उठा, “उनको अन्दर लाओ.”

मसूद उठकर बाहर जाकर सामन्त और नंदीदत्त को लिवा लाया. कई दिन तक रेगिस्तान में भटकने के बाद यवन सेना का पड़ाव देख ही लिया था सामन्त ने. वृद्ध नंदीदत्त ने बहुमूल्य सलाह दी कि इतनी बड़ी सेना से टकराना मूर्खता और आत्मघात ही होगा.

इससे अच्छा, सज्जन चौहान का पता लगाकर प्रभास निकला जाए और वहां राजा भीमदेव की सेना के साथ, सुल्तान महमूद की सेना से भिड़ा जाय. लेकिन सामन्त ने कुछ और ही ठान रखा था.

उसने सेना के नजदीक जाकर स्वयं सुलतान से मिलने की इच्छा जाहिर की. पहरेदारों के मना करने पर भी वो अड़ा रहा तो उच्च अधिकारियों द्वारा बात घूमते घूमते सुल्तान के डेरे तक आ ही पहुंची थी.

[घोघाबापा का प्रेत – 5]

इतने दिनों से रेगिस्तान में भटकते रहने से, क्रोध-क्षोभ और अपने समस्त परिवार के साथ पूरे घोघागढ़ के काल के गाल में समा जाने की पीड़ा झेलने से, बीस वर्ष का वो सामन्त इस समय बहुत भयंकर लग रहा था.

उसकी आँखों में पत्थर जैसी कठोरता और श्मशान जैसा सन्नाटा पसरा हुआ था. मुख की सुकुमारता गायब होकर चेहरा एकदम सपाट हो गया था. जबान की मृदुलता की जगह अब विषबुझे व्यंग्य बाणों ने ले ली थी. जीवन और मृत्यु के लालच और डर उसके दिमाग में अब आते ही नहीं थे.

दुभाषिये ने आगे बढ़ कर पूछा, “तू कहाँ से आया है, और तुझे किसने भेजा है?”

“झालौर और मारवाड़ के बीच के रास्ते से सीधा इधर आ रहा हूँ. मेरे पास मुखिया का सन्देशा है जो सिर्फ सुल्तान के लिए है.”

“क्या संदेशा लाया है?”

[घोघाबापा का प्रेत – 6]

सामन्त ने अपनी तीर जैसी नजरें सबकी आँखों में चुभा कर उस दुभाषिये से कड़वे स्वर में बोला, “तू मुझे सिर्फ विदूषक लग रहा है, कोई सुल्तान नहीं. सुना नहीं तूने कि मैं ये संदेशा सिर्फ सुल्तान को दूंगा.”

योद्धाओं से भरी वो सारी सभा उसके दुस्साहस पर दंग रह गई. मसूद आगे बढ़कर कड़कते स्वर में कहा, “तू मुखिया का संदेशा बोल, सुल्तान यहीं है.”

सामन्त प्रेत जैसी डरावनी हँसी हँस कर बोला, “ह्ह्हह्ह्ह्ह, मुखिया का संदेशा? उसका संदेशा नहीं है, बल्कि उसके बारे में संदेशा है. मुखिया तो ऊपर गया, ऊपर. चील कौवे नोच रहे होंगे उसके गद्दार और कायर शरीर को अब तो.”

सामन्त का एक एक शब्द सारे दरबार के लोगों के कलेजे में बरछी की तरह घुसता चला गया. लोगों ने अपना हृदय थाम लिया. चारों तरफ से आवाजें आने लगीं, “क्या, कैसे, कब, किसके हाथ से?”

सामन्त ने कहा, “हिन्दू योद्धाओं के हाथों झालौर और मारवाड़ के बीच के रास्ते पर वह मारा गया. बीस दिन हो चुके हैं. वास्तविक संदेशा तो हिन्दू योद्धाओं का है सुल्तान के लिए.”

मसूद ने खुद के डर को थोड़ा कम करने के लिए और कड़क कर पूछा, “इसका क्या प्रमाण है कि तेरी बात सच है?”

कमर में खोंस रखी मुखिया की हीरेजड़ित कटार, सामन्त ने मसूद के हाथ में धर दिया. वो राजकुमार था, मुखिया को मारते वक़्त उसकी कटार देख कर वह समझ गया था, यह सुल्तान की ही दी हुई कटार होगी, जिसको दिखाकर मुखिया सुल्तान की बात को प्रमाणित करता था हिन्दू राजाओं के समक्ष. उसने फिर भी सावधानी वश संक्षिप्त सा उत्तर दिया, “मुखिया की यह कटार ही मेरी बात का प्रमाण है.”

मसूद ने उलट पलट कर कटार की जांच किया, और फिर सुल्तान के पास जाकर चिंतित स्वर में बोला, “जहाँपनाह, यह तो आपकी ही दी हुई कटार है.” सुल्तान भी कटार को ध्यान से जांचने लगा.

इधर अब सामन्त को विश्वास हुआ कि कौन है वो मलेच्छ सुल्तान. उसकी आँखों में चिरपरिचित खूनी प्रेत की चमक उभरी, लेकिन फिर उसने तुरंत खुद को संभाल लिया.

अब सुल्तान ने भी खुद को संयत करके व्यंग्य मिश्रित आवाज में पूछा, “और क्या है वह सन्देश जो मुट्ठी भर हिन्दू वीरों ने मेरे लिए भिजवाया है?”

“यहीं सबके सामने कह दूँ?”

सुल्तान ने अकड़ कर बोला, “हाँ हाँ, तू सबके सामने बोल.”

सामन्त ने अपनी पत्थर जैसी आँखों को सुल्तान की आँखों में चुभाते हुए प्रहारक स्वर में कहा, “तूने ही मुखिया को झालौर और मारवाड़ को रिश्वत देने के लिये भेजा था?”

सारी सभा के आश्चर्य का पारावार न रहा इस धृष्टता को देखकर. विश्वविजयी सुल्तान से ऐसी धृष्टता? वो भी अकेले? वो भी इतने योद्धाओं के बीच खड़े होकर? सबके मन में सवाल उठने लगे कि कौन है यह बालक. किस वजह से इतनी हिम्मत है इसके पास.

लेकिन सामन्त तो क्षोभ और डर की सीमा से ही परे जा चुका था. जिन्दा ही प्रेत बन जाने से वो मृत्यु के भी पार जा चुका था.

“फिर?” सुल्तान ने खुद के आश्चर्य को परे करता हुआ पूछा.

सामन्त ने फिर से डरावनी हँसी हँस कर बोला, “हहह्हहह,.. फिर क्या! राजपूतों ने हमारे महादेव का धाम तोड़ने की खबर सुनकर, दूत को न मारने की परम्परा भी गुस्से में तोड़ दी. उस कायर मुखिया को दौड़ा कर, पीछा करके जंगली जानवर की तरह काट काट कर मार डाला. अब मारवाड़ और झालौर की सेनाएं गुजरात की सेना के साथ सम्मिलित होकर तेरे इन पिद्दियों का स्वागत करेंगीं.”

सामन्त के एक एक शब्द वहां उपस्थित हर योद्धा के मन मष्तिष्क में कड़कती बिजली की तरह प्रविष्ट हो गए. सारा दरबार ही स्तब्ध रह गया. सब लोग मानो मूर्ति की तरह जड़ हो गए. सुल्तान बेचैनी में आगे बढ़कर सामन्त के थोड़ा और पास आ गया.

सामन्त ने अगला जहर बुझा वाक्य गरजते हुए बोला, “मुखिया ने मरते समय यह कटार देते हुए कहा था कि सुल्तान को बोलना, जिस जिस को अपनी जान प्यारी हो वो वापस भाग जाए जहाँ से आया हो. नहीं तो अगर हिन्दू योद्धाओं की सेना ने देखभर लिया, तो भी दौड़ा दौड़ा कर काट दिए जाओगे.”

यह सुनकर तो चारों ओर हाहाकार मच गया. लोगों के हृदय डर के मारे धाड़ धाड़ बजने लगे. कुछ लोग जो बेचैनी में खड़े हो गए थे, अपना सीना भींचे धम्म से बैठ गए. डर गहराने लगा, सबको अपने परिजनों के मुखड़े याद आने लगे.

सबसे पहले सुल्तान इस परिस्थिति से चैतन्य हुआ, लेकिन उसके मुंह से भी भयवश इतना ही निकल पाया, “या अल्लाह”.

इधर हरेक इंसान को इतनी बुरी तरह स्तंभित करके, सामन्त अपनी कटार म्यान में से निकाला और तीव्र गति से सुल्तान पर झपटा. लेकिन सुल्तान भी दुर्जेय योद्धा था, और उसका भाग्य भी मेहरबान था कि सामन्त की कटार वाली बांह उसके हाथ में आ गई. फिर भी सामन्त की कटार उसके गले को छू ही गई थी.

इसके बाद लोगों में चैतन्यता आई और इस दृश्य को देख कर तो ‘या अल्लाह या अल्लाह’ की चीख पुकार मच गई. मसूद और दूसरे निकटतम सिपहसालार सामन्त पर झपटे और सामन्त को उठा कर, जोर से नीचे जमीन पर पटक दिया.

सारे नीचे ही जकड़ कर सामन्त का गला दबाने लगे. कुछ अपनी कटार, तलवार म्यान से निकालने लगे. लेकिन सुल्तान तो सुल्तान था, विश्वविजयी सुल्तान महमूद. अपनी सर्वश्रेष्ठता, बहादुरी, निडरता अपनी सेना को साबित करने के लिए, किस्मत से मिले ऐसे मौके को वह कैसे हाथ से जाने दे सकता था.

वह बुलंद आवाज में कह उठा, “अपनी तलवारें अपनी म्यान में वापस रखकर उसको छोड़ कर खड़े हो जाओ. सुल्तान के हुक्म की फ़ौरन तामील हो.”

तुरंत असर हुआ सब पर, और सामन्त भी खड़ा हुआ पलक झपकते ही, अपनी स्वस्थता, निडरता से सबको स्तब्ध, मुग्ध करता हुआ. उसको देखकर ऐसा लग रहा था, जैसे कुछ हुआ ही न हो!

दुभाषिया तिलक बोल उठा, “जहाँपनाह, अब मैंने इस ब्राह्मण को पहचाना. यह तो घोघाराणा का राजगुरु नंदीदत्त है.” घोघाराणा का नाम फिर से सुनकर सारा दरबार हाय हाय कर उठा.

मसूद ने विचलित होकर कहा, “घोघाराणा? उसके एक लड़के ने तो परसों हमारी एक तिहाई सेना को नेस्तनाबूद कर दिया. अब फिर से उसका नाम? या अल्लाह मदद कर, रहम कर. ये घोघाराणा का जिन्न तो हमारा पीछा ही नहीं छोड़ रहा है.”

अनजान भाषा में सारी बात तो सामन्त नहीं समझ पाया, बस ‘घोघाराणा’ शब्द ही समझ सका. उसने गर्व से कहा, “घोघाराणा!! हाँ मैं उनका प्रपौत्र हूँ. सुल्तान, तू अपने इन कायरों को आदेश दे कि मुझे घेर कर मारें, और मुझे भी अपने पितरों के पास भेज दें. चल बोल दे तू. या मुझे मेरी तलवार दिला दे, तुझे भी तेरे इन कायरों के साथ, अपने साथ लेता चलूँ.”

दुभाषिये द्वारा सामन्त की वो गर्वपूर्ण भाषा सुनकर, उसकी निडरता को देख सारा दरबार मुग्ध हो उठा.

लेकिन अब फिर से अपनी सेना को प्रभावित करने के लिए, महानता और वीरता की गेंद अपने पाले में लाने के लिए, सुल्तान महमूद हँस कर मुग्ध होते हुए, मसूद और बाकी सिपहसालारों को पीछे करता हुआ आगे बढ़ कर सामन्त के कंधे पर मित्रतापूर्वक हाथ रख कर बोला, “तिलक तू इस घोघाराणा के वंशज से कह कि इसके कुल ने अपने पराक्रम, शौर्य और निडरता से, विश्वविजयी सुल्तान अबुल कासिम महमूद के यश को भी फीका कर दिया है. बता इसको, कि परसों घोघाराणा के एक अकेले पुत्र ने, तनिक भी भयभीत हुए बगैर, तूफ़ान की तरह इस विशाल सेना पर हमला करके मेरी एक तिहाई सेना को जलते रेगिस्तान में दफ़न कर दिया है. और आज तूने विश्व के सबसे बड़े योद्धाओं से भरे इस दरबार में अदम्य साहस से मेरे प्राण लेने की कोशिश की.”

तिलक के बताते ही, प्रेत बन कर हर मानव भावना, हर सुख दुःख क्षोभ डर जैसे भावों से दूर पहुँच जाने वाला सामन्त फिर से बच्चा बन गया. वो करूण क्रंदन करते हुए अधीर होकर बोल उठा, “घोघाराणा का लड़का? “कहाँ हैं? कहाँ हैं? वे मेरे पिताजी हैं. कोई तो बता दो कि वो कहाँ हैं?”

“तिलक इससे कह” सुल्तान वास्तविकता में मुग्ध होकर बोला, “कि ऐसा महावीर, ऐसा योद्धा हममें से किसी ने नहीं देखा इस धरती पर. वो मेरी इतनी बड़ी सेना को अकेले तहस नहस करके मेरे मृत योद्धाओं के बीच प्रतिकार का ऐसा देवता बन बैठा है, जिसे लोग सदियों तक याद रखेंगे.”

बूढ़े नंदीदत्त गर्व से कह उठे, “धन्य है, धन्य है! सुल्तान, यह भारत की धरती है, तुझे वीरों से खाली कभी नहीं मिलेगी.” और राजगुरु की आँखों से गर्व मिश्रित आंसू टपक पड़े.

सामन्त को यह भान तो पहले से था ही कि उसके पिता अब जीवित नहीं मिलेंगे. लेकिन प्रत्यक्ष सुनकर उसकी आँखों से आंसुओं की धारा निकल पड़ी. फूट फूट कर मासूम बच्चे की तरह रो पड़ा प्रेत.

इधर सुलतान ने फिर से अपना महानता वाला दांव चला, “महमूद वीर है, इसलिए वो वीरों की कद्र भी करता है. जा, मैं तुम दोनों को जीवित छोड़ता हूँ.”

सामन्त दोनों हाथों को उल्टा करके अपने आंसू पोंछता हुआ बोला, “मेरे दादा को मारा, मेरे पिता को मारा, मेरे समस्त कुल को मारा” अब फिर प्रेत जाग गया और आगे जहरीले स्वर में बोला, “तुझे क्या लगता है सुल्तान? मैं तुझे दुबारा छोडूंगा? अभी मौका है तेरे पास, मार दे मुझे. अन्यथा तू और तेरी सेना का एक एक सैनिक जीवित वापस नहीं जायेगा.”

सुल्तान पुनः अपने सिपहसालारों में अपनी श्रेष्ठता और निडरता साबित करने के लिए, जानबूझकर गर्वीली हँसी हँस कर बोला, “मसूद, इस छोकरे और इस बूढ़े को बढ़िया ऊँटनी दे, और दस दिन का चारा-पानी, रसद इत्यादि देकर इन्हें छोड़ दे.”

फिर एक भव्य अभिनय की पराकाष्ठा प्रदर्शित करते हुए जोर से बोला, “मसूद, इन दोनों का बाल भी बांका करने वाले का सर धड़ से अलग कर देना.” सुल्तान इतना कच्चा खिलाड़ी नहीं था कि अपनी सेना में उत्साह जगाने का ऐसा स्वर्णिम अवसर हाथ से जाने देता.

नंदीदत्त और सामन्त, प्रभास की दिशा में तीव्र गति से बढ़ चले.

क्रमशः…

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