वामपंथ की क्रिटिकल थ्योरी : कुछ भी सम्माननीय और पवित्र नहीं, सबको कीचड़ में लपेटो

एक जनरलाइज़ेशन किसी भी समाज की विकृत तस्वीर ही देता है. जैसे गरीबी का जनरलाइज़ेशन भारत की गलत तस्वीर देता है, वैसे ही अनेक भारतीय भी पश्चिमी समाज की स्टीरियोटाइपिंग से उत्पन्न भ्रांतियों से ग्रस्त हैं. जैसे कि उन्हें लगता है कि गोरी लड़कियाँ सब फटाफट पट जाती हैं और सीधा बिस्तर पर चली जाती हैं.

हमारा समाज एक कॉम्प्लेक्स सिस्टम है जो विदेशियों की समझ से बिल्कुल बाहर है. वैसे ही पश्चिमी समाज भी जटिल है और अनेक अंतर्द्वंदों से गुजर रहा है. परंपरागत पश्चिमी समाज भी परिवार, मर्यादा, संस्कार और धर्म के बंधनों से बंधा है.

और हम जिन परिवर्तनों और विकृतियों को पश्चिम का असर समझते हैं, पश्चिमी समाज में भी बहुत से लोग उन परिवर्तनों से वैसे ही व्यथित हैं. अमर्यादा, अविवेक, उच्छृंखलता के ये सूत्र इस समाज को भी बर्बाद कर रहे हैं और अनेक विचारशील अमेरिकन भी इससे उतने ही दुखी हैं.

अमेरिका पश्चिम का सांस्कृतिक स्रोत है. अमेरिका की देखादेखी इंग्लैंड और यूरोप भी हैलोवीन और थैंक्सगिविंग मना रहा है. अब भारत भी. पर अमेरिका में आई सांस्कृतिक विकृतियों का स्रोत क्या है?

20 के दशक में जर्मनी में फ्रैंकफ़र्ट यूनिवर्सिटी में एक इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल रिसर्च नाम की संस्था बनी. बाद में हिटलर के समय ये सभी जर्मनी से भागे और इन्होंने अमेरिका में शरण ली.

इन सभी को झुंड में एक साथ कोलंबिया यूनिवर्सिटी में जगह दी गई और इन लोगों ने इस तरह अमेरिकी शिक्षा तंत्र को संक्रमित किया. इन्हीं जर्मन बुद्धिजीवियों की विचारधारा फ्रैंकफर्ट स्कूल के नाम से जानी जाती है.

ये सभी मूलतः वामपंथी मार्क्सवादी थे. समझना कठिन नहीं है कि हिटलर इन्हें क्यों मारना चाहता था. किसी भी सभ्य समाज को इनके साथ यही करना चाहिए था.

खैर, अमेरिका में ये सभी सिर्फ अपने घृणित व्यक्तित्व और मानसिकता के साथ सिर्फ जीवित ही नहीं रहे, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अमेरिकी स्लोगन के तले खूब फले फूले.

अमेरिकी विश्वविद्यालयों में ऊँचे ऊँचे स्थानों तक पहुँचे, और आने वाली पीढ़ियों के मस्तिष्क में उन्हीं अमेरिकी मूल्यों के विरुद्ध खूब ज़हर बोया जिसने इन्हें शरण दी थी. यह कृतघ्नता वामियों के मूल गुण के रूप में पहचाना जाए.

इन वामियों की चिंता थी, मार्क्स असफल हो गया. मजदूरों ने इनकी क्रांति में भाग नहीं लिया. क्योंकि उन्होंने समाज के स्थापित मूल्यों के विरुद्ध मार्क्स के वर्ग संघर्ष के सिद्धांत को नकार दिया.

उन्हें कोई वर्ग दिखाई नहीं दिया, कोई संघर्ष नहीं हुआ. लोग सामान्यतः अपनी जिंदगी से खुश थे और व्यवस्था को उलटने पलटने के बजाय उसमें अपनी स्थिति सुधारने में ज्यादा इंटरेस्टेड थे.

तो इन बुद्धिजीवियों ने निष्कर्ष निकाला, और संभवतः सही निष्कर्ष निकाला कि लोगों की निष्ठा स्थापित मूल्यों में है और वे उनके साथ खुश हैं, यही उनकी समस्या है.

अगर उन्हें अपनी ओर मोड़ना है तो पहले उनमें व्यवस्था के प्रति क्षोभ और आक्रोश पैदा करना होगा, स्थापित मूल्यों को तोड़ना होगा… राष्ट्र, धर्म, परिवार, नैतिकता, समर्पण, प्रेम… इन सभी मूल्यों को नष्ट करना होगा.

एक असंतुष्ट, दुखी, संघर्षरत समाज बनाना होगा… अराजकता और अव्यवस्था फैलानी होगी. सांस्कृतिक अधिपत्य से ही राजनीतिक शक्ति आएगी. राजनीतिक शक्ति के औजार, पुलिस, सेना, कानून… ये सभी सांस्कृतिक आधिपत्य के इंस्टीट्यूशन्स शिक्षा, मीडिया, कला, साहित्य के सामने कमजोर हैं… पहले इनपर कब्जा करना होगा.

पहले ये वामपंथी इन सभी स्थानों पर घुसे. फिर उनका उद्देश्य था संवाद की, सोच की भाषा बदलना… तो इन्होंने एक यंत्र निकाला – क्रिटिकल थ्योरी.

ध्यान से सुनें और याद रखें, आपको यह क्रिटिकल थ्योरी हर जगह दिखाई देगी. क्रिटिकल थ्योरी बहुत सरल है. इसका मूल है, हर बात को क्रिटिसाइज़ करना, हर चीज की आलोचना करना.

इनका सिद्धांत था, कोई भी चीज आलोचना से परे नहीं है. किसी भी सामाजिक सांस्कृतिक प्रतिमान की घोर आलोचना करो… करते रहो. कुछ भी सम्माननीय और पवित्र नहीं है. सबको कीचड़ में लपेटो…

आप देखते हैं उन्हें राम को गालियाँ देते, दुर्गा को वेश्या बोलते, कृष्ण को लम्पट बुलाते, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगीत का अपमान करते, हमारे धर्म और धार्मिक आस्थाओं पर प्रहार करते, त्योहारों का मजाक उड़ाते… परिवार की शुचिता पर प्रश्न करते, ‘पितृसत्तात्मक समाज’ के विरोध के नाम पर पारिवारिक अनुशासन की मर्यादाएँ तोड़ते… यह सब बस इसी ‘क्रिटिकल थ्योरी’ की क्रियाशीलता है…

अक्सर इन्हें पता भी नहीं होता कि इनके इस व्यवहार का स्रोत क्या है, कहाँ से प्रेरित हो रहा है. बस, कर रहे हैं, किसी ने इतना समझा दिया है कि करो… यह बहुत ही किरान्तिकारी बात है… समाज के स्थापित मानकों को तोड़ दो, फोड़ दो, ध्वस्त कर दो…

यह नहीं बताया है कि उसकी जगह जो निकल कर आएगा और उन्हें जिन नए मानकों से विस्थापित किया जाएगा वे क्या होंगे. अभी यह नहीं बताया गया है.

जो नादान लोग उनकी क्रिटिकल थ्योरी को सब्सक्राइब करके हर बात पर कीचड़ उछाल रहे हैं, राम और सीता तक की मर्यादा को अपने नारीवाद से दूषित कर रहे हैं, उन्हें नहीं पता कि यह कहीं नहीं रुकेगा. कुछ भी पवित्र और आउट ऑफ बाउंड नहीं होगा. सिर्फ धर्म और देश ही नहीं, परिवार भी… माँ-बाप भी नहीं.

तो आज अगर कोई राम और सीता को, पद्मिनी और दुर्गा को अपशब्द बोल रहे हैं, उनकी संतानें इस परंपरा को और आगे ले जाएगी… तब उनके बच्चे पूछेंगे कि वे अपनी माँ या बहन से संभोग क्यों ना करें… पूछेंगे ही पूछेंगे, यही इस सिद्धांत की प्राकृतिक परिणति है.

बुद्धिजीवियों, प्रगतिशीलों… अपनी तर्क-शक्ति उस दिन के लिए बचाकर रखियेगा… पछतावे के काम आएगी…

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