घोघाबापा का प्रेत – 5

गतांक से आगे…

मंत्री विमल को भौंचक्का छोड़, ‘सामन्त’ अपने घोघागढ़ के रास्ते पर तेजी से बढ़ गया. चलते-चलते उसने जीत की निशानी के तौर पर, मुल्तान के मरे हुए मुखिया की रत्नजड़ित कटार उठाकर अपने पास रख ली.

उसको ज्ञात था कि उसके पिता सज्जन चौहान रेगिस्तान के छोटे रास्ते से आगे बढ़ रहे हैं. शायद वो पहले पहुँच कर सामन्त का इन्तजार कर रहे हों, नहीं तो जल्दी से खुद पहले पहुँच कर अपने पिता को हराने के ख्याल उसके बालसुलभ मन में आने लगे.

[घोघाबापा का प्रेत – 1]

लेकिन जैसे जैसे वो नजदीक पहुँचता गया, उसको वीरानी बढती दिखाई देने लगी. कोई सामन्त की दिशा में जाता नहीं दिखा. जो लोग दिखाई भी दिए वो हड़बड़ाये से इधर ही आते दिख रहे थे. कुछ को रोक कर सामन्त ने कारण भी पूछना चाहा, लेकिन लोग इतने घबराए थे कि कुछ ढंग से बोल नहीं पा रहे थे.

कुछ यही बोल पाए कि “गजनी का महमूद आ गया. वो गाँव के गाँव जला रहा है. लोगों को आग में जिन्दा फिंकवा दे रहा है. तुम भी भाग चलो, उस दिशा में क्यों जा रहे हो?”

[घोघाबापा का प्रेत – 2]

दो दिन में सामने से आता हुआ समूह बढ़ता ही गया. सामन्त ने कईयों से पूछा कि, “कहाँ तक आ पहुंचा है महमूद? रास्ते में तो घोघागढ़ पड़ता है, सपालदक्ष आता है, उनका क्या हुआ?” लेकिन कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे पा रहा था.

लोग चीखने लगे थे “आया, आया, वो मलेच्छ आ गया, भागो भागो.” कुछ ने तो घबराहट में ऐसा वर्णन किया कि मानो क्या आ गया है. किसी ने उड़ते हाथी देखे थे. किसी ने पंख वाले घोड़े देखे थे. किसी ने आदमियों को कच्चा खा जाने वाले राक्षस देखे थे.

[घोघाबापा का प्रेत – 3]

लेकिन अब और आगे बढ़ने पर रास्ते सुनसान दिखने लगे. जहाँ लोग चौराहों पर बैठ कर हँसी ठहाके लगाते थे, वहां चारपाईयां तो दिख रही थीं, हुक्के दिख रहे थे, लेकिन उनको प्रयोग करने वाला कोई मनुष्य नहीं दिख रहा था. गाँव के गाँव उजड़े हुए लग रहे थे.

एक विश्राम स्थल पर रुका थोड़ी देर सुस्ताने के लिए. देखा एक चूल्हे पर पकाई कोई वस्तु पड़ी थी, लेकिन चूल्हे की आग कई दिन से बुझी लग रही थी. सूखी हुई खिचड़ी को चींटियों की पंक्ति ले जा थी. सब कुछ था वहां, बस मानुष नहीं.

[घोघाबापा का प्रेत – 4]

सामन्त को मारे भय के झुरझुरी सी आ गई. अपने घोघागढ़ की चिंता होने लगी. अचानक उस पर घबराहट हावी होने लगी.

थोड़ी देर में उसका भय दूर हुआ, उसको अपनी कायरता पर क्रोध हो आया. चौहान, घोघाबापा का प्रपौत्र, बाबा सोमनाथ का आज्ञावाहक होकर ऐसी कायरता की सोच?

उसने अपने होंठ चबा कर अपने क्रोध को जागृत किया, और अपनी ऊँटनी पर बैठ कर तीव्र गति से चल पड़ा. उसे तो घोघागढ़ पहुंचना ही था, चाहे मार्ग में गजनी के हजारों मलेच्छ खड़े मिलें.

लेकिन फिर से कुछ लोगों की बातों से अनुमान लग गया सामन्त को, कि महमूद सपालदक्ष को मटियामेट कर आगे बढ़ गया था कई दिन पहले ही. अब उसको फिर से चिंता, निराशा ने घेर लिया कि घोघागढ़ के सात आठ सौ सैनिक उस महमूद के सैनिकों के समुद्र के सामने क्या कर पाए होंगे.

वो ऊँटनी को सोंटा मारते, दौड़ाते हुए भम्भरिया पहुंचा, जहाँ उसे अपने पिताजी से मिलना था. भम्भरिया घोघागढ़ का थाना था. यहाँ दुर्गपाल अपने कुछ सैनिकों के साथ तैनात रहता था.

यहाँ विश्राम स्थल से लग कर एक शिवमंदिर भी था. पूरे भम्भरिया में श्मशान जैसा सन्नाटा देख कर वो मंदिर में घुस गया. मंदिर के कंगूरे टूटे हुए थे, भगवा ध्वजा नीचे गिरी हुई थी. अन्दर नंदी और शिवलिंग के विग्रह टूटे हुये थे.

सामन्त दुःख, क्रोध, चिंता इत्यादि से पागल सा होने लगा. वो जोर जोर से चीखने लगा, “भोले शम्भू, ये क्या हो गया? मेरे घोघाबाप्पा कहाँ हैं? मेरे पिताजी कहाँ हैं? मेरी छः साल की छोटी बहन कहाँ है? मेरी माँ कैसी है?”

कितना भी महावीर था सामन्त, लेकिन था तो बीस वर्ष का एक बालक ही. खुद को संभाल नहीं पाया. वो खड़े खड़े मुर्छित होकर गिरने लगा, बेहोशी में उसको लगा कि कोई जीर्ण शीर्ण से दो बूढ़े हाथों ने उसको संभाल लिया. और इसके बाद वो अपनी चेतना खो बैठा.

बड़ी देर में होश आया, तो पता लगा कि वही दोनों बूढ़े हाथ उसके मुंह में कोई दवाई का काढ़ा डाल रहे हैं. उसको हाथ जाने पहचाने लगे. उसने बहुत जोर डाला दिमाग पर, और फिर बड़बड़ा उठा, “राजगुरु नंदिदत्त?”

नंदिदत्त करूण स्वर में चीत्कार कर कह उठे, “हाँ बेटा, मैं ही अभागा ब्राह्मण हूँ जो घोघाबाप्पा के वचन में बंध कर जिन्दा हूँ. अब इस सृष्टि में हम और तू, सिर्फ यही दो जीवित इंसान हैं, जो भटकेंगे आजीवन प्रेतों की तरह, अश्वत्थामा की तरह, शापित होकर.”

सामन्त अधीर हो उठा, उसके आँखों से अश्रुधारा निकल पड़ी. उसने कांपती आवाज को यत्न से सम्भालते हुए कहा, “गुरुदेव, क्या हुआ? कैसे हुआ? मुझे विस्तार से बताइए.”

नंदीदत्त लगभग रोते हुए बोले, “बेटा सामन्त, तेरी अवस्था ऐसी नहीं है कि तू सुन पाए. पहले ठीक हो जा.”

सामन्त ने अपने होंठों को चबाते हुए कहा, “अब मैं असली का प्रेत हूँ. घोघाबाप्पा का प्रेत… सामन्त मर चुका है… प्रेतों को सुख दुःख शोक विचार कुछ नहीं होते. बाबा, आप विस्तार से सुनाइए.”

क्रमशः…

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY