जन्मोत्सव : अमोल तुम अनमोल हो

दूरदर्शन की महेरबानी से मैंने अमोल पालेकर की लगभग सारी फ़िल्में देखी होंगी. और जो सबसे पहला ख्याल अमोल की अदाकारी को देखकर आया वो यही था कि कैसे एक साधारण से चेहरे वाला आदमी, साधारण सी कहानी को असाधारण बनाकर आपके के दिल के कोने में जगह बना लेता है.

और सबसे बड़ी बात दिल का यह कोना भी बहुत साधारण सा होता है. यहाँ कोई मेचो मैन, एंग्री यंग मैन या रोमांटिक चॉकलेटी हीरो कभी नहीं पहुँच पाता. ये सब तो बस सतही तौर पर रोमांच पैदा करके बिसरा देने के लिए होते हैं.

जब कोई इस साधारण से कोने में जगह बना लेता है तो वो ताउम्र आपकी साधारण सी ज़िंदगी में होनेवाली घटनाओं के साथ जब तब उभर आता है. उस व्यक्ति के साथ खासकर महिलों की बात की जाए तो कोई कामुक भावनाओं का सम्बन्ध नहीं बनता.

लेकिन जब भी आप किसी कामुक संबंध में पड़ते हैं तो ये आपको थोड़ा सा रूमानी हो जाने में पूरी मदद करते हैं. भेष बदलकर बातों को गोलमोल घुमाने और बातों ही बातों में रजनीगंधा के फूल महकाने में एक दोस्त की तरह मदद करने पहुँच जाते हैं.

मेरे लिए अमोल उतने ही अनमोल है जितना मेरे दिल का वो साधारण सा कोना. लेकिन फिर भी कभी कभी कोई साधारण सा व्यक्ति आपकी अपेक्षा के विपरीत कोई ऐसा काम काम कर जाता है कि आपकी साधारण की परिभाषा विस्तृत होती चली जाती है.

थोड़ा सा रूमानी हो जाए के निर्देशक अमोल पालेकर को तो बहुत बाद में जाना, उसके पहले ऋषिकेश दा के अमोल के अनमोल अभिनय को जाना… लेकिन वास्तविक अमोल का परिचय तो मैंने बस एक ही फिल्म से पाया… केवल चेहरे के भाव से आदमी से मनुष्य बन जाना और मानवीय संवेदना को ज़ाहिर कर पाना अमोल जैसे सीधे सच्चे अभिनय के ही बस का था… फिल्म का नाम भी यही था, “आदमी और औरत”.

एक आदमी… शुद्ध आदमी रास्ते में जब एक औरत को देखता है तो सबसे पहले उसके अन्दर का आदमी ही जागता हैं, भावनाएं, संवेदना, ये सब मनुष्य होने की निशानी है… ये सब बाद में आती है…

तो ऐसे ही एक कठिन रास्ते पर एक औरत चली जा रही है… और उसके पीछे एक आदमी… आदमी पीछे हैं तब तक औरत को आदमी की ही नज़र से देखता है… जिसको अमोल ने बहुत सुंदर तरीके से अभिनय में उतारा है… लेकिन फिर आदमी आगे हो जाता है और औरत पीछे रह जाती है. शुद्ध आदमी ही होता है जो कम से कम एक बार तो औरत को पलटकर ज़रूर देखता है… वो उसके आदमी होने के लक्षण है… जिसको कोई शास्त्र झुठला नहीं सकता.

बस पीछे मुड़कर देखते से ही कहानी में ट्विस्ट आता है… अरे ये सिर्फ औरत नहीं, ये तो गर्भवती औरत है… फिर वो आदमी सिर्फ आदमी नहीं रह जाता… एक कठिन सफ़र… पथरीला रास्ता, पहाड़ नदी पार करवाकर वो उस औरत को उस अस्पताल तक पहुंचाकर ही दम लेता है जहां उसे बच्चे को जन्म देना है…

लेकिन उस पूरे सफ़र में एक आदमी को मनुष्य होते दिखाया गया है.. सारी भावनाएं प्रेम, दया, सहानुभूति, करूणा… जिसको अपने अभिनय में उतारने के लिए ही अमोल को जाना जाता है…

अमूमन जीवन का सफ़र ऐसा ही तो होता है… जब तक आप औरत के पीछे चल रहे हैं, तब तक ही वो आपके लिए शुद्ध औरत है… लेकिन जैसे ही आप औरत से आगे बढ़ जाते हैं… आपके अन्दर की भावनाएं आपका रूपांतरण करने लगती है… फिर आप सिर्फ एक आदमी नहीं रह जाते… ना वो सिर्फ एक औरत…

पता नहीं फिल्म बनाते समय निर्देशक तपन सिन्हा के मन में ये विचार था कि नहीं लेकिन एक दर्शक के रूप में मैंने यह कहानी जब देखी तो मेरे दिल की साधारण से कोने में तब भी इसी विचार ने जन्म लिया था.. तब उम्र भी बहुत कच्ची और साधारण सी थी… शायद 15 -16 साल… लेकिन उस विचार को पक्का करने के लिए तब मेरे पास शब्द नहीं थी.. आज इतने वर्षों में जितने भी शब्द कमाए हैं… उसमें उस विचार को प्रकट करने जितना सामर्थ्य तो पैदा कर लिया…

जी… शब्द सीखे नहीं जाते कमाए जाते हैं.. जैसे एक साधारण अभिनेता अमोल पालेकर ने एक विशेष वर्ग के दर्शकों के दिल में जगह कमाई…

हाँ फिल्म के अंत में एक ट्विस्ट और आता है जब औरत के घरवाले बच्चे के जन्म के बाद उस तक पहुँचते तब एक हिन्दू आदमी को पता चलता है कि वो औरत तो मुस्लिम थी…

कहानी सफ़र के दौरान कुछ और सन्देश दे रही थी जो अंत पर आते आते एक अलग ही सन्देश छोड़ जाती है…

पता नहीं ऐसी कहानियां लोगों के दिलों में कहाँ जगह बनाती है.. मेरा तो वो साधारण सा कोना ऐसे कई किस्सों से आज भी गुलज़ार है… बिलकुल अमोल की तरह अनमोल है…

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