अपना अपना शून्य

प्रकृति अपूर्ण है और पूर्णता की तलाश में भटक रही है. पेड़-पौधे हों, जीव-अजीव हों, इनसान-जानवर हों, कीड़े-मकोड़े हों, अपूर्णता सब में है.

हर एक के अंदर एक शून्य है. कुछ खाली है. कमी है. और इसीलिए हर एक को पूर्णता की तलाश है क्योंकि आनंद केवल पूर्णता में है. कष्टों का, दुखों का निवारण केवल पूर्णता में है.

हर एक के अंदर की यह अपूर्णता उसके अपने प्रकार की अपनी है और वैसी ही अनोखी है जैसे के उसका आकार या उसका मन और हर एक की यह अपूर्णता, शून्य व्यक्त भी उसकी अपनी तरह अलग-अलग और अपनी अनोखी तरह ही होता है.

हर एक का व्यवहार और आचरण उसके इन्हीं शून्यों को भरने की कोशिश है. उसकी अपनी अपूर्णता से पूर्णता की ओर का सफर. आनंद की तलाश, सुख की प्राप्ति, मनुष्य की दैवत्य से तादात्म्य की कोशिश! इत्यादि-इत्यादि…!

जैसे अंकगणित का शून्य एक को लाख और करोड़ बना देता है, अंदर का शून्य लोगों को पता नहीं क्या-क्या करने की ओर प्रेरित करता है और क्या-क्या करने पे मजबूर करता है.

सही भी, गलत भी. वैसे भी सही क्या है और गलत क्या है! अंदर का शून्य केवल शून्य होता है. एक वैक्यूम, एक खालीपन. उसका अमीरी गरीबी, इकलौतेपन या रिश्तों के अंबार या सामाजिक यश होने न होने से कोई संबंध नहीं है.

क्योंकि ये सब बातें तो बाह्य हैं, शून्य तो अंदर है. मन के सारे क्रियाकलाप तो इस शून्य को भरने के हैं. और मन की भटकन और आकांक्षाओं को अमीरी, गरीबी, यश इत्यादि से क्या लेना देना?

और क्या लेना-देना उसका उम्र से! क्या कभी बड़े-बड़ों को समझ में आता है कि वे जैसे हैं वैसे क्यों हैं? जैसा बर्ताव करते हैं वैसा ही क्यों करते हैं? …उम्रें गुजर जाती हैं लोग अपने आपको ही नहीं पहचान पाते. अक्सर लोग खुद अपने व्यवहार, अपने रिएक्शनों से खुद ही चकित रह जाते हैं. कभी कभी आप शून्य हो जाते है.

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