फुटबॉल के जरिए ‘बाल-विवाह’ से लड़ाई

सदियों पहले जब पश्चिमी देशों को भारत पर कब्ज़ा जमाने की जरूरत पड़ी तो वो समुद्री रास्ते से भारत आये. पुर्तगाली उस दौर में मुंबई और गोवा जैसे इलाकों की तरफ काबिज़ हुए और अंग्रेज कोलकाता, मद्रास प्रेसिडेंसी जैसे इलाकों की ओर ज्यादा शक्तिशाली थे.

सन 1652 आते आते ब्रिटिश सरकार को मुम्बई के बंदरगाहों का महत्व नजर आ गया था और उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी पर इसे खरीदने का दबाव भी बनाना शुरू कर दिया.

सन 1654 होते होते, सूरत की ब्रिटिश काउंसिल के थोड़े बाद, पुर्तगाल के राजा जॉन चतुर्थ से बम्बई ले लेने के लिए दबाव बनाने की प्रक्रिया तेज हो चुकी थी. लेकिन ये किसी लड़ाई या खरीद फरोख्त में ब्रिटिश हुक्मरानों के हाथ नहीं आया.

इसके कई साल बाद 11 मई, 1661 को पुर्तगाल के राजा जॉन चतुर्थ की बेटी कैथरीन ऑफ़ ब्रगान्ज़ा की शादी जब इंग्लैंड के चार्ल्स द्वित्तीय से हुई तो बॉम्बे, चार्ल्स को दहेज़ में मिला.

तिलचट्टे, आलू, या फिर कुर्सी-टेबल जैसे शब्द ही नहीं और भी काफी कुछ हमारे देश में विदेशों से आया है. दहेज़ शब्द भी विदेशी है और हिंदी में जैसे कुर्सी-टेबल, या रेल-टिकट, फुटबॉल-क्रिकेट, जैसी चीज़ों के लिए प्रचलित शब्द नहीं होते वैसे ही इसके लिए भी स्थानीय शब्द नहीं मिलते.

हाँ, जैसे विदेशी चीज़ों और भाषा के मोह से भारतीय लोगों को छुड़ाने के लिए कभी गाँधी को आन्दोलन करना पड़ा था, आज शायद दहेज़ के असामाजिक और गैरकानूनी कृत्य से मुक्ति के लिए भी आन्दोलन की जरूरत पड़ेगी.

जिस चंपारण (बिहार) को किसी दौर में गाँधी के अंग्रेजों के खिलाफ आन्दोलन शुरू करने के लिए जाना जाता है, वहां की ही लड़कियों ने अब चुपचाप, बिना पोस्टर-बैनर, बिना मीडिया कवरेज के, दहेज़ और बाल-विवाह के खिलाफ आन्दोलन छेड़ रखा है.

जैसे एक बुराई दूसरी को जन्म देती है वैसा ही दहेज़ के साथ भी है. कम उम्र में कम पढ़े लिखे लड़के से शादी होगी तो कम दहेज़ देना होगा, इसी लालच में बाल विवाह भी होते हैं. कानून तोड़कर कम उम्र में करवाई जा रही शादियों के पीछे भी ये दहेज़ होता है.

कभी खुद भी बाल विवाह की शिकार रही प्रतिमा कुमारी आज फुटबॉल के माध्यम से ‘बाल-विवाह’ के खिलाफ लड़ती हैं. पटना के फुलवारीशरीफ ब्लॉक के सकरैचा, ढिबर, गौनपुरा, पर्सा और सोरुमपुर पंचायतों के पच्चीस से ज्यादा गावों में अब तक पांच सौ से ज्यादा लड़कियों को फुटबॉल खेलना सिखा कर टीम बना दी गई है.

गौरव ग्रामीण महिला विकास मंच के जरिये वो 2013 से इस काम में जुटी हैं. उनके काम को सी.ई.आर.ए. (CERA) जैसे नारीवादी, मानवाधिकार संगठनों ने भी सराहा और पुरस्कृत किया है.

वो बताती हैं कि दलित और मुस्लिम समाज में उनके काम से काफी बदलाव आ रहे हैं (स्रोत : विलेज स्क्वायर). उनका मानना है कि अशिक्षा जैसे कारणों से पिछड़े समुदायों में बाल-विवाह एक बड़ी समस्या है. ज्यादातर ये दहेज़ बचाने और सामाजिक स्वीकृति के नाम पर किया जा रहा है.

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-4) के हाल के आंकड़ों के मुताबिक, बिहार में बाल विवाह की दर में कमी आई है. काफी सुधार के बाद भी 2005-06 में जहाँ राज्य 69% बाल विवाह के लिए जिम्मेदार था, वहीँ 2015-16 में तीस फीसदी गिरकर ये दर अब 39.1% पर आ गई है.

फ़िलहाल बिहार के अड़तीस में से उन्नीस जिलों में बाल विवाह की दर चालीस फीसदी से ऊपर ही है. हाल ही में मुख्यमंत्री नितीश कुमार के नेतृत्व में सरकार ने दहेज़ और बाल विवाह जैसी कुरीतियों के खिलाफ़ मुहिम छेड़ दी है.

जिन बीमारियों के साथ जीने की लोगों ने आदत डाल ली हो ऐसे मुद्दों पर लोगों को झकझोर कर जगाने, जागरूक करने, और समाज सुधार की लड़ाई के इस नए मोर्चे पर नितीश बाबू को हमारी भी शुभकामनाएं!

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