जोगी और चक्की

‘बाई जी, रोटी ल्या दियो..’ बाहर जोगी ने आवाज लगाई.

शाम जब हल्के धुंधलके से लिपट रही होती थी वह आता. पिछले कई दिनों से उसका इस तरह आना और खाना मांगना रोजमर्रा के कामों का जैसे हिस्सा हो गया था.

बिखरे खिचड़ी बाल, लंबी बढ़ी हुई दाढ़ी.. मैले कुचैले कपड़े और जैसे महिनों से नहाया न हो ऐसी शक़्ल. हाथों पैरों पर मैल की चादर सी जमी हुई होती थी उसके.

वह एक पैर से विकलांग था और ट्राइसाइकिल लेकर आता था, जिसकी चैन टूटी हुई होने के कारण सात साल का एक बच्चा साइकिल को ठैलता हुआ साथ चला आता..

एक लाठी भी हुआ करती थी साथ में! जब वह गली से गुजरता था उसे गली से बाहर छोड़ने कुत्ते भौंकते हुए साथ-साथ चलते.

ज्यादा कुछ कहता नहीं था, बस मैं उसे खाना दे देती और वह दुआएं देता हुआ चला जाता लौटकर.

एक दिन मैंने उससे पूछा..

‘बच्चे को क्यूं साथ लेकर घूमते रहते हो? इसे तो यह आदत से बचाओ!’

‘बाई जी, साइकिल री चैन टुटोड़ी है, धक्को दियां बिना चाले कोनी..’

‘मरम्मत कराओ..’

वह चुप हो गया. यह बात सच है कि मुझसे उसने कभी रुपए नहीं मांगे थे. मैं समझ गई कि पैसों के अभाव में वह मरम्मत नहीं करवा पाया होगा. उसे चुप देख कर मैंने कहा..

‘अच्छा, एक काम करना, कल जब आओ पूछकर आना कितने पैसों में ठीक हो जाएगी साइकिल..’

‘अच्छा बाई जी!’

दूसरे दिन जब वह आया उसने बताया डेढ़ सौ रुपए में बन जाएगी. मैंने उसे इस शर्त में बांध कर रुपए दिए की साइकिल की मरम्मत के बाद बच्चे को साथ लेकर नहीं घूमेगा वह.
‘नहीं घूमुंगा ‘ कहकर वह चला गया.

दो दिन बाद..

प्रतिदिन के नियमानुसार शाम से कुछ पहले चिड़ियों के लिए बाजरी के दाने बिखेरे… कुंडी (पक्षियों के पानी पीने के लिए बना हुआ मिट्टी का पात्र) में पानी भर लिया.. उस दिन ठंड कुछ ज्यादा ही थी.

कुछ देर घर के बाहर बनी चार दिवारी पर कोहनी टिकाए चिड़ियों का आना जाना देखती रही…. सब साथ आकर बैठती थी और कोई हल्की सी आहट पर एक साथ उड़ जाती.

उधर जोगी का दो-तीन दिन से कहीं अता-पता नहीं था.

कुछ देर विचार करने के बाद मैं भीतर आ गई. सोचा चाय बना लूं.

चाय को कप में छान ही रही थी कि…

‘बाई जी! रोटी ल्या दियो’ की आवाज सुनाई दी. जोगी आया था बाहर.

मुझे यह देखने की उत्सुकता थी कि क्या वह साइकिल रिपेयर करवा कर आया है या नहीं.

खाना लेकर बाहर आई तो देखा आज वह अकेला आया है और उसकी साइकिल रिपेयर हो गई है. बहुत खुश था और दुआएं दिए जा रहा था. मैं खुश थी कि उसने मेरी मदद का सही इस्तेमाल किया था.

खाना लेने के बाद भी वह कुछ देर रुका रहा..

‘क्या हुआ?’ मैंने पूछा.

‘पगां हुं लाचार हो ग्यो बाईं सा… नी तो म्हे भाटा घड़ाई रे काम रो जाणकार हूं!’

कुछ देर तक वह बताता रहा कि कैसे अज्ञात बीमारी ने उसकी पत्नी को लील लिया और उसे अपंग बना दिया. डेरे वालों ने कुछ समय तक तो साथ दिया मगर फिर जब वह अपना डेरा उठा ले गए, उसे और उसके बेटे को पीछे ही छोड़ गए. आखिर मांग कर खाने को मजबूर होना पड़ा उसे.

वह बताने लगा किसी कंस्ट्रक्शन साइट पर कुछ मजदूर रहते हैं, उन्हीं के आस-पास रैन बसेरा कर लेते हैं बाप-बेटे.

कुछ देर सुनते रहने के बाद मैं बस इतना ही कह पायी कि दो पैसे कमाने की जुगत लगाएं वह.

भीख मांग कर गुजारा करना उसकी मजबूरी हो गई थी. ज्यादा कुछ समझ नहीं आया तो यही कहा कि अगर थोड़ा बहुत भी काम कर सकता है वह तो जरूर करें…

वह अपनी साइकिल मोड़कर चला गया और मैं भी अपने कामों में व्यस्त हो गई.

दो दिन फिर वह नहीं दिखाई दिया.. तीसरे दिन आया..

‘बाई सा..!’

जोगी ने आवाज दी…

खाना देने के लिए गई तो देखा जोगी अपने पैरों में पत्थर की बनी छोटी ‘घट्टी’ (चक्की) रखकर लाया है.

कहने लगा..

बाई इसे मैंने घड़ा है.. आप के लिए लाया हूं, आप रख लिजिए इसे..!!

मुझे बहुत अच्छा लगा कि वह खुद इसे बनाकर लाया है.

मैंने कहा..

‘जोगी, बहुत बढ़िया बनाई है तुमने इसे.. मगर मुझे इस की पहचान नहीं है. पत्थर कच्चा निकल गया तो…!’

‘घाटू रो पत्थर है बाई सा.. आपने खोटी चीज नी देवूंला..!

मैंने उसकी बात पर विश्वास कर के कहा..

‘चलो दे दो.. कितने रुपए देने होंगे..?’

मेरी इस बात पर जैसे वह रुआंसा हो गया और बार-बार आपसे पैसे नहीं लूंगा की बात पर अड़ा रहा.

मुझे इस बात की खुशी थी कि उसने अपने दम पर कुछ करने की कोशिश की थी फिर से… मेरे बहुत ज़ोर देने पर उसने रुपए ले लिए…!!…..और फिर उसके बाद वह कभी वापस नहीं लौटा…

इधर उसके वापस नहीं आने पर मैंने यह सोचा कि हो न हो वह मुझे कच्चे पत्थर की चक्की दे गया है और भेद खुल जाने के डर से अब वह आ नहीं रहा… बहुत निराश हुईं मैं… जाने-अनजाने दिमाग में आता रहा कि अब किसी की मदद बिना सोचे समझे नहीं करूंगी…. मन ही मन खुद को कोसती रही, और उस जोगी को भी जो धोखे से मुझे चक्की दे गया था. चक्की को स्टोर रूम में रखकर भूल जाना ही बेहतर था… और वही किया भी…

उस बात को लगभग दो वर्ष बीत गए..

मैंने उस चालाक जोगी के बारे में दिमाग लगाना बंद कर दिया था मगर … एक दिन स्टोर रूम में रखी हुई चक्की पर नजर पड़ी.

यूं ही मन ने कहा आज इसे चलाकर देखती हूं, अगर पत्थर बिखरने लगेगा तो बाहर फेंक दूंगी, आखिर इसे संभाल कर रखने का कोई मतलब भी तो नहीं….

… और जब मैंने उसे चलाई… उसका पत्थर मजबूत था…! बिल्कुल लोहे सा…!!

सवालों का एक तूफान सा उठा भीतर….

तो फिर वह वापस क्यों नहीं आया….??

क्या वह कमाकर खाने लगा होगा….?

उसने और भी चक्कियां बनाकर बेची होगी….??

या कि कहीं उसे कुछ..??

ओह… उसका वह बच्चा…??

पंद्रह वर्षों से उसके हाथ की घट्टी मेरे पास है. आज भी जब भी मैं उसे काम में लेती हूं, जोगी को याद करती हूं और ईश्वर से प्रार्थना करतीं हूं कि वह जहां भी हो ज़िन्दा हो उसका पत्थर गढ़ने का हुनर ज़िन्दा हो.

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