बात कड़वी है किन्तु चीन के दिखावे से अधिक कपोल-कल्पित हमारा ‘विश्वगुरु’ का दावा

चीन ने टियांजिन (Tianjin) नगर के न्यू बिन्हाई (Binhai) एरिया में एक पाँच मंजिला पब्लिक लाइब्रेरी बनवाई है. इस जन-पुस्तकालय की सुंदर वास्तुकला चर्चा का केंद्र बनी हुई है. अनेक वेबसाइट और Instagram पर इसके चित्र शेयर किये गए.

पहले तो लाइब्रेरी की विशालता और सुंदरता की खूब प्रशंसा की गयी फिर किसी ने ध्यान दिया तो पता चला कि जो बड़े-बड़े शेल्फ दिख रहे हैं वे वास्तव में नकली हैं और उन्हें इस प्रकार पेंट किया गया है ताकि दूर से लगे कि सैकड़ों पुस्तकें सजी हुई हैं.

इसको लेकर चीन की खूब खिल्ली उड़ाई जा रही है. कहने वाले तो कहेंगे कि देखो चीन के दांत दिखाने के और खाने के और हैं. ट्विटर और पश्चिमी मीडिया वेबसाइट इस विषय पर लहालोट हुए जा रहे हैं.

उनका हंसना एक तरह से सही भी है क्योंकि पब्लिक पुस्तकालय यूरोप अमेरिका में आज भी जीवित हैं. चिंता तब हुई जब भारतीय भी चीन को नीचा दिखाने के लिए लम्बी-लम्बी बौद्धिक कुलांचें भरते दिख रहे हैं.

टियांजिन बिन्हाई लाइब्रेरी के अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि इस पुस्तकालय में करीब 12 लाख पुस्तकों की क्षमता है. परन्तु अभी प्रारंभिक चरण में दो लाख पुस्तकें ही रखी गयी हैं. बाहर से जो दीवारें और शेल्फ दिख रहे हैं वह वास्तव में बैठ कर पढ़ने का स्थान हैं.

नीचे के शेल्फ पर वास्तविक पुस्तकें हैं किन्तु ऊपर पेंट किया गया है. अधिकतर पुस्तकें भीतर सुरक्षित रखी गयी हैं. अभी दो लाख पुस्तकें हैं जिनकी संख्या धीरे-धीरे बढ़ाई जाएगी. एशियाई देशों के प्रति पश्चिमी मीडिया की मानसिकता क्या है इसका एक उदाहरण देखिये.

कहा जा रहा है कि टियांजिन बिन्हाई पुस्तकालय की सीढियां ‘खूनी’ हैं क्योंकि वे चिकनी हैं और इन पर चढ़ कर सेल्फी लेने से व्यक्ति गिरकर मर सकता है. यह तर्क इतना हास्यास्पद है जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती क्योंकि लाइब्रेरी पढ़ने अथवा विमर्श करने स्थान होता है न कि सेल्फी लेने का.

एक सामान्य भारतीय के मन में चीन के प्रति ऐसी विचित्र अवधारणा बना दी गयी है कि वह चीन की आलोचना करना ही जानता है उस देश से कुछ सीखना नहीं चाहता. भारत में पब्लिक लाइब्रेरी का चलन लगभग समाप्त हो चुका है.

चीन की लाइब्रेरी का उपहास करने वाले जरा अपनी स्मृति पर जोर डालें और बताएं कि भारत की किस लाइब्रेरी की प्रशंसा उन्होंने अपने जीवन में पूर्व में कब सुनी थी. काशी को ज्ञान की पीठ माना जाता है. यहाँ एक कारमाईकल लाइब्रेरी हुआ करती थी. मैं डेढ़ दशक पहले बचपन में वहाँ गया था किन्तु आज वह पुस्तकालय विलुप्त हो चुका है.

हमारे समाज ने विगत दो दशकों में एक बड़ी गलती यह की है कि शिक्षा को पूर्ण रूप से शासन का दायित्व मानकर पब्लिक लाइब्रेरी बंद कर दी गयीं और उनके स्थान पर कोचिंग संस्थान खुल गए. किसी विषय को समझने के लिए एक पुस्तक से दूसरी, दूसरी से तीसरी खंगालने का चलन ही समाप्त हो गया और इस प्रक्रिया का स्थान कोचिंग में दिए जाने वाले ‘नोट्स’ ने ले लिया है. हम स्वयं कुछ नहीं पढ़ना चाहते, इस इंतजार में रहते हैं कि ज्ञान की कोई दुकान मिल जाये जहाँ से ‘उत्तर’ खरीद लिए जाएँ.

निस्संदेह बहुत सी चीजों में चीन दिखावा करता है. परन्तु हमें यह स्मरण रहना चाहिए कि बिना आग के धुआँ नहीं होता. चीन यदि ‘दस’ दिखाता है तो उसके पास ‘छः’ की क्षमता होती है. बाकी ‘चार’ को हासिल करने का लक्ष्य लेकर चीन दिखावा करता है.

बात कड़वी है किन्तु चीन के दिखावे से अधिक कपोल-कल्पित हमारा ‘विश्वगुरु’ का दावा प्रतीत होता है. हमारी बहुचर्चित डिजिटल लाइब्रेरियाँ वस्तुतः बेकार हैं और आर्काईव डॉट ओआरजी की नकल मात्र हैं. ज्ञान के संग्रह के साथ ही प्रस्तुतिकरण भी मायने रखता हैं. यहाँ भी बनारस का ही उदाहरण देता हूँ.

बनारस के इतिहास पर दो पुस्तकें सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं: डायना एल एक की ‘बनारस: सिटी ऑफ़ लाइट’ तथा मोतीचन्द्र की ‘काशी का इतिहास’. इनमें से डायना एल एक की पुस्तक अधिक बिकती है. क्या डायना ने मोतीचन्द्र की पुस्तक से अधिक प्रामाणिक सांस्कृतिक इतिहास लिखा होगा? काशी के धन्ना सेठों ने मोतीचन्द्र की पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद करवाने की जहमत क्यों नहीं उठाई? ध्यान देने वाली बात है कि अकादमिक लेखन भिन्न है और प्रसिद्ध पुस्तकें अधिक बिकती हैं. इसलिए उन पुस्तकों का कलेवर नवीन करने की आवश्यकता है जिनमें भारत की सांस्कृतिक धरोहर का मौलिक चित्रण है.

चीन में एक समय ऐसा आया था जब उन्होंने कम्युनिस्ट माओ के दबाव में कन्फ्यूशियस की धरोहर का नामोनिशान मिटा दिया था. परन्तु 2011 में उन्होंने उसी कन्फ्यूशियस की प्रतिमा को थिअनन्मेन चौक पर पुनर्स्थापित किया.

सूचना आई थी कि उस प्रतिमा का कहीं और स्थानान्तरण कर दिया गया है. जब चीन में बेरोजगारी बढ़ रही थी तब उन्होंने शरीर और मन को स्वस्थ रखने की प्राचीन कला ताई-ची को पुनर्जीवित किया. ढेरों सेंटर खोले गए ताकि युवा ‘माइंड-बॉडी-सोल’ में समन्वय को समझ सके और जीवन जीने का सही तरीका सीखे.

चीनियों का मानना है कि स्वस्थ मन और शरीर ही देश का विकास कर सकता है. इसका परिणाम यह हुआ कि आज ताई-ची अमेरिका में अत्यधिक लोकप्रिय है. इसका अभ्यास करने वाले और प्रशिक्षण देने वाले अच्छा-ख़ासा कमाते हैं. भारत को अपने ‘योग’ की कीमत समझने में देर हुई. आज भी बहुत से लोग योग को अवैज्ञानिक मानते हैं, उपहास करते हैं. मजेदार यह है कि ऐसे लोग ही चीन की उपलब्धियों के गुण भी गाते हैं.

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