प्रेमिकाएँ मिलती रहती हैं, प्रेम नहीं

वो अपनी हर पिछली प्रेमिका की कहानी
अपनी हर अगली प्रेमिका को सुनाता है

बताता है कैसे उसमें और उसकी पहली प्रेमिका में
कितनी समानताएँ हैं

कैसे वो भी कविता लिखती थी
उस सी सुंदर दिखती थी

देर रात तक मूवीज़ देखती थी
कितनी अच्छी हिंदी बोलती थी

हर नई प्रेमिका बहुत ख़ुश होती है
चाव से सुनती रहती है सब

एक ख़ुशफ़हमी या फिर कोई ग़लतफ़हमी पलती रहती है –
वो सच में कितना प्यार करता है न उस से
उस में ढूँढता है अपनी खोई हुई प्रेमिका

वो प्रेमिका जिस को शायद उसने उस से पहली वाली की कई ज़हीन बातें बताई होंगी
उसके नैन नक़्श उस में ढूँढे होंगे

न जाने उसको हमेशा कोई प्रेमिका कैसे मिल जाती है
एक जाती है तो दूसरी चली आती है
सब के साथ वही पैंतरे फैंकता है वो

जो वो नहीं जानता वो यह
कि औरत तो जब ही प्यार में पड़ती है
उसका प्यार परवान चढ़ने लगता है

चाहे फिर वो पहले नम्बर की हो या दूसरे या फिर तीसरे की
और मर्द का प्यार कभी परवान नहीं चढ़ सकता
जब तक उसके अंदर की औरत जवान नहीं हो जाती

वो मर्द है वही दाँव आज़माता रहता है
प्रेमिकाएँ मिलती रहती हैं
प्रेम नहीं
प्रेम तो करने से मिलता है न

और उसे समझ ही नहीं आता प्रेमिकाओं को ख़ुदा कैसे नज़र आ जाता है
जब कि उसे तो आज तक कुछ नहीं दिखा.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY