जाति को फौरन सूंघ लेने की कॉमरेड की ये अदा तो सच में कातिल है

एक काफी पुराना इंटरव्यू था जिसमें चेतन भगत अपने कालरा साहब, जिन्हें “गुलज़ार” नाम से जाना जाता है, उनका इंटरव्यू ले रहे थे. मूर्खतापूर्ण सवालों पर टका सा जवाब देने के लिए जाने जाने वाले गुलजार साहब के सामने चेतन भगत, कविता के बारे में कुछ बोल बैठे. बदले में गुलजार साहब ने पूछा चलो ये बताओ “उनका आना भी गर्मियों की लू है…” वाली लाइन का मतलब क्या है?

काव्य के अ, आ, सबसे अनभिज्ञ बेचारे चेतन भगत की शक्ल ही उतर गई. वीडियो अब भी यू ट्यूब पर मिल जाता है. बगलें झाँक रहे चेतन भगत को गुलजार ने समझाया था कि जिन चीज़ों के बारे में कुछ पता ना हो, उनके बारे में कुछ बोलना बेवकूफी साबित कर देता है. ऐसे मामलों में चुप रहना बेहतर. अक्सर वामपंथी साहित्यकार जब इतिहास के मसलों में अपनी टांग घुसेड़ते हैं तो भी ऐसा होता है.

लेकिन जावेद अख्तर जब कहते हैं कि “राजपूत अंग्रेजों से नहीं लड़े” तो बात सिर्फ अज्ञान की ही नहीं है.ये वामपंथी गिरोह दरअसल ये कहना चाह रहे हैं कि रानी पद्मिनी का मसला सिर्फ राजपूतों का मसला है. जबकि सच्चाई ये है कि ये सभी भारतीय लोगों के लिए अस्मिता का प्रश्न है. जातिवादी कॉमरेडों को लगता है कि पहले भंसाली और अब जावेद अख्तर के “राजपूत” शब्द के इस्तमाल से वो मामले को घुमा ले जायेंगे.

इसमें समस्या ये है कि उत्तर प्रदेश की सीमाओं के पास वाले जो आज के बिहार के हिस्से हैं उस भोजपुर के इलाके के बाबू कुंवर सिंह की प्रतिमाएं नेपाल के बॉर्डर वाले बिहार के जिलों तक पाई जाती हैं. तो राजपूत अंग्रेजों से नहीं लड़े का सफ़ेद झूठ सिर्फ जावेद अख्तर का मक्कार होना साबित करता है. बाकी जाति को फौरन सूंघ लेने की कॉमरेड की ये कुत्तों वाली अदा तो सच में कातिल है ही.

ऐसे मक्कारों को जौहर पर फिल्म बनाने ही नहीं देनी थी.

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