देश-धर्म की ओर से भावनाशून्य व्यक्ति और कुछ भी हो, लेकिन जीवित कहलाने के योग्य नहीं

सुनिये ज़रा –

आचार्य चाणक्य-सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य, महाराज पुष्यमित्र शुंग, सम्राट खारवेल, महाराज समुद्रगुप्त-महाराज स्कंदगुप्त, हूणजेता यशोधर्मा और गौतमीपुत्र शातकर्णी जैसे अजेय योद्धाओं की वीर गाथाएं आपको गर्वोन्नत नहीं करतीं.

महाराज दाहिर की ललनाओं सूर्या और परमिला द्वारा मोहम्मद बिन कासिम की खाल में भुस भरवाने के बाद जहर खाकर मृत्यु का वरण करने की गाथा आपके ह्रदय को झकझोरती नहीं.

सोलह हज़ार सखियों संग महारानी पद्मिनी की जौहर गाथा आपकी आँखों में आँसू नहीं लाती.

भयंकर विपरीत परिस्थितियों में भी देवल देवी का संघर्ष आपकी गले को रुँधाता नहीं.

हरिहर और बुक्का द्वारा विद्यारण्य स्वामी की सहायता से पुनः हिन्दू बन विजयनगर साम्राज्य स्थापित करने की गौरव गाथा आपको आह्लादित नहीं करती.

महाराणा कुम्भा की गौरव गाथाएं और उनका कुम्भलगढ़ आपके हृदय को उल्लासित नहीं करता.

अकबर की विशाल सेना और अहंकार के सामने भी महाराणा प्रताप का पर्वतोन्मुखी स्वाभिमान आपकी रग रग में रक्त के हिलोरे उत्पन्न नहीं करता.

औरंगजेब के घर में घुसकर छत्रपति शिवाजी महाराज के उसकी नाक काट लेने की गाथा आपको रोमांचित नहीं करती.

संभाजी महाराज का मृत्यु के मुख में जाकर भी मदांध औरगंजेब को ललकारने और अंग अंग कट जाने पर भी अपने धर्म पर अड़े रहने का प्रसंग आपको अंदर तक हिलाता नहीं.

नवम गुरु महाराज गुरु तेगबहादुर और उनके पांच साथियों पर किये गए भीषण अत्याचार आपको रोने के लिए विवश नहीं करते.

दशम गुरु महाराज गुरु गोविन्द सिंह के चारों पुत्रों की बलिदान गाथा आपके हृदय को छू कर तक नहीं जाती.

चमकौर के युद्ध की अमर गाथा आपकी नस नस को फड़काती नहीं.

बन्दा वैरागी और उनके साथियों पर किये गए अमानवीय अत्याचार और बन्दा का अमर बलिदान आपके हृदय को छलनी नहीं करते.

मुस्लिम आक्रमणकारियों के साथ 800 वर्षों तक किये गए अनगिनत युद्धों और संघर्षों में न जाने कितने ही जाने अनजाने सेनानियों, योद्धाओं, बलिदानियों, वीरों और नायक-नायिकाओं द्वारा बलिदान देकर भी हिन्दुत्व की मशाल अक्षुण्ण रखने की अमर गाथाएं आपको मिथकीय कथाएं, फंतासी कहानियाँ या कपोल कल्पनाएं लगती हैं.

तो एक बार चेक कीजिये सही से. आप कभी के मर चुके हैं, कभी के ख़त्म हो चुके हैं क्योंकि देश-धर्म की ओर से भावनाशून्य व्यक्ति और कुछ भी हो, कम से कम जीवित कहलाने के योग्य तो नहीं ही है.

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