एक थॉट-वायरस है वामपंथ

उस समय की बात है जब अरविंद केजरीवाल नया नया आया था और दुनिया उसकी नीयत को लेकर भ्रमित थी.

तब मैंने एक सज्जन को कहा – मुझे अरविंद केजरीवाल को पहचानने में कोई दुविधा नहीं है… यह वामपंथी है और इसलिए इसकी चिंताएँ भी वामपंथी हैं.

उसकी सबसे बड़ी चिंता है कि मोदी को कैसे रोकें. उसका कांग्रेस से विरोध बस इतना ही है कि कांग्रेस अगर इतना भ्रष्टाचार करेगी तो भाजपा आ जायेगी.

उन्होंने पूछा – कल तुम कह रहे थे कि अरविंद केजरीवाल अमेरिकन एजेंट है, आज कह रहे हो कि वह वामपंथी है… ऐसा कैसे है?

हम भारतीय बॉलीवुड देखते हैं. हमारी सोच में सब कुछ बॉलीवुड की कहानियों जैसा ब्लैक एंड व्हाइट होता है. अमेरिका माने पूंजीवाद, रूस माने साम्यवाद, कम्युनिस्ट माने सी.पी.एम… हम इन्हें ग्लोबल शक्तियों की तरह देखने में असमर्थ हैं.

हम हमेशा जानते हैं कि अमेरिका वामपंथ से लड़ा. पर अगर वामपंथ रूस की समस्या होती तो अमेरिका को इससे लड़ने में सर खपाने की क्या आवश्यकता थी?

विएतनाम में जाकर बम गिराने और अपने सैनिकों को मरवाने में अमेरिका का क्या इंटरेस्ट होता? और अगर आप अमेरिका को समझेंगे तो यह भी समझेंगे कि अमेरिका बिना अपने इंटरेस्ट के कोई भी काम क्यों करेगा?

वामपंथ सिर्फ रूस, चीन और पूर्वी यूरोप की समस्या नहीं थी. यह पश्चिमी यूरोप और अमेरिका की भी समस्या थी.

अमेरिकी तंत्र में वामपंथी प्रभाव भी बहुत गहरा था. बल्कि दुनिया में ज्यादा प्रमुख वामपंथी चिंतक अमेरिका और यूरोप से ही हुए.

रूस से कोई नहीं हुआ… वहाँ तो जिसने सोचने की कोशिश की उसे मार दिया. सत्ता मिल गयी, अब यह चिंतन विन्तन छोड़ो…

और वामपंथी सिर्फ सी.पी.एम. में नहीं हैं. बड़ी संख्या में कांग्रेसी वामपंथी हैं. संघ और भाजपा तक में लोगों की सोच को वामपंथी विचारों से इन्फेक्ट किया गया है.

इंस्टीट्यूशनलाइज्ड वामपंथियों को पहचानना आसान है, उससे ज्यादा खतरनाक और विषैले हैं फ्री-लांस वामपंथी. शिक्षा, पत्रकारिता, कला और सिनेमा में घुसे वामपंथी.

ऐसे वामपंथी जो अपने को वामपंथी नहीं कहते. ऐसे वामपंथी जिन्हें खुद भी पता नहीं है कि वो वामपंथी हैं.

सर्दियाँ आ रही हैं. जुकाम फैल रहा है. जुकाम एक वायरल इन्फेक्शन है… सामान्य फ्लू. आप इसे बड़ी बीमारी नहीं समझते. हालांकि हर साल दुनिया में कई लाख लोग फ्लू से मरते हैं. पर आप इसे फिर भी बीमारी नहीं समझते.

लोग बीमार पड़ते हैं, वेंटिलेटर तक पर जाते हैं, मर तक जाते हैं. पर ज्यादातर लोग बस नाक सुड़कते, अदरक की चाय पीकर बिस्तर में पड़े या अपना काम काज करते दो-तीन दिन निकाल देते हैं.

आप पूछेंगे, तबीयत खराब है? तो जवाब आता है – कुछ नहीं, यूँ ही जुकाम है. पूछें कि आपको जुकाम कहाँ से मिला, तो पता भी नहीं होगा.

ऑफिस में कोई छींक रहा होगा, बस में कोई बगल में खड़ा नाक सुड़क रहा होगा… आपने नोटिस भी नहीं लिया होगा. पर बिना बीमारी गिने गए भी यह वायरस हर साल लाखों जिन्दगियां ले लेता है… और अपने आप को कम्युनिटी में मेन्टेन कर लेता है.

वामपंथ एक थॉट-वायरस है. बीमारी के संदर्भ में ही नहीं, कंप्यूटर के संदर्भ में भी सोचें तो यह एक वायरस है. लोगों के सोच की पूरी फॉर्मेटिंग बिगाड़ देता है.

16 साल की लड़की माँ-बाप को नकार के मोहल्ले के सलीम पंचर वाले के साथ भाग जाती है…

दिन रात स्त्री-विमर्श पर बोलने वाली 20 साल की लड़की महारानी पद्मिनी के बलिदान का मजाक उड़ा रही है और एक हत्यारे बलात्कारी का महिमा-मंडन कर रही है…

यह सब उसकी प्रोग्रामिंग के वायरस ही तो हैं…फॉर्मेटिंग बिगड़ गई है.

बच्चों को बचाइए… एन्टी-वायरस इनस्टॉल करवाइए… धर्म संस्कृति की शिक्षा ही वह एन्टी-वायरस है. आत्म-सम्मान ही इम्युनिटी है.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY