सच्चा इतिहास : अकबर कितना महान

अकबर जिसे हम महान मानते हैं. जिसको किताबों के अंदर महान बनाकर ‌‌‌पढ़ाया जाता है. क्या आप उसका सच जानते हैं. शायद नहीं आप उस वहशी का‌‌‌ आदर करते हैं. सच ही बोला है किसी ने जो दिखता है वो होता नहीं और जो होता है वो दिखता नहीं.

उसके दरबार में रहने वाले दो कौड़ी के इतिहासकार उसी का नमक खाकर उसके बारे में कैसे लिखते. वे तो वही बातें लिखते जो वास्तव में अकबर को इतिहास के अंदर एक अच्छा इंसान साबित कर दे.

आज मैं कुछ तथ्य रखता हूँ निर्णय आप कीजिये अकबर कितना महान था.

अकबर की चित्तौड़ विजय के विषय में अबुल फजल ने लिखा था- ”अकबर के आदेशानुसार प्रथम 8000 राजपूत योद्धाओं को बंदी बना लिया गया, और बाद में उनका वध कर दिया गया.

उनके साथ-साथ विजय के बाद प्रात:काल से दोपहर तक अन्य 40000 किसानों का भी वध कर दिया गया जिनमें 3000 बच्चे और बूढ़े थे.”चित्तौड़ की पराजय के बाद महारानी जयमाल मेतावाडिया के साथ 12000 क्षत्राणियों ने मुगलों के हरम में जाने की अपेक्षा जौहर की अग्नि में स्वयं को जलाकर भस्म कर लिया.

(अकबरनामा, अबुल फजल, अनुवाद एच. बैबरिज)

माँ का बलात्कारी

बैरम खान जो अकबर के पिता तुल्य और संरक्षक था, उसकी हत्या करके इसने उसकी पत्नी अर्थात अपनी माता के तुल्य स्त्री से शादी की. बैरम खान की बीबी वर्तमान हरियाणा प्रांत के मेवाती राजपूत जमाल खाँ की सुंदर एवं गुणवती कन्या सुल्ताना बेगम थी. अकबर को जिसने अपने पुत्र के रूप में पालन किया उसी अकबर ने अपनी ही माँ समान पालक माँ का जबरन बलात्कार करके उसे हरम में ठूंस दिया..

बहू का बलात्कारी

मुस्लिम समझते हैं कि अपनी बहू के साथ कामवासना पूरी करना इस्लाम में लिखा है अकबर अपने हिसाब से मजहब को समझाकर अपने ही कानून बनाता था.

वो जहाँगीर को लम्बे युद्ध पर भेजकर उसकी बीबियों के साथ संबंध बनाता था जब जहाँगीर को ये बात पता चली तो उसने राजद्रोह कर दिया. जहाँगीर को जब समझा कि उसका एक बेटा असल में उसका भाई तो उसने उसे जान से मार दिया.

अकबर ने मजहब के नाम पे अपनी बहू उज़-ज़मानी का बलात्कार किया और जब उसके लड़के ने इसका विरोध किया तो उसने कहा कि उसे दैवीय अधिकार मिल गया अपनी बहू से शादी करने का या उसके साथ सोने का. “अल-तबरी-नबी की जीवनी” के हिसाब से, नबी ने खुद की बहू से निकाह किया क्योंकि अल्लाह ने उन्हें कहा कि उसकी खूबसूरती को ना नकारे क्यों नबी ने उसे नग्न देख लिया था. इस किताब में ये भी कहा गया है कि उनका निकाह जन्नत में हो गया था. इसी रीति के अनुसार, उसने अपनी बहू के साथ सोना शुरू कर दिया बिना शादी के.

बेटी का बलात्कारी

अकबर ने अपनी सगी बेटी आराम बेगम की पूरी जिंदगी शादी नहीं की और पूरी ज़िंदगी उसका बलात्कार करता रहा और यदि कोई विरोध करता तो उसे एक हदीस का जिक्र कर देता कि फिर से कुरान, सहीह बुखारी और नबी की जिवनी, के हिसाब से नबी ने 6 साल की अपनी बेटी से शादी की जिसका नाम आयशा था और उसके साथ उसकी 9 साल के उम्र में यौन संबंध बनाये. नबी ने ऐसा किया क्योंकि उसे अल्लाह का हुक्म था कि तुम ये सब करो. और मुझे भी अल्लाह का हुक्म मिला है.

और अंत में उस की मौत अविवाहित ही जहाँगीर के शासन काल में हुई.

ये तो रहा उस कथित महान अकबर का व्यक्तिगत जीवन अब जरा उसके सामाजिक जीवन को देखते हैं-

अकबर ने खुद को दिव्य आदमी के रूप में पेश किया. उसने लोगों को आदेश दिए कि आपस में “अल्लाह ओ अकबर” कह कर अभिवादन किया जाए. भोले भाले मुसलमान सोचते हैं कि वे यह कह कर अल्लाह को बड़ा बता रहे हैं पर अकबर ने अल्लाह के साथ अपना नाम जोड़कर अपनी दिव्यता फैलानी चाही. अबुल फज़ल के अनुसार अकबर खुद को सर्वज्ञ (सब कुछ जानने वाला) की तरह पेश करता था. ऐसा ही इसके लड़के जहांगीर ने लिखा है.

अकबर ने अपना नया पंथ दीन ए इलाही चलाया जिसका केवल एक मकसद खुद की बड़ाई करवाना था. उसके चाटुकारों ने इस धूर्तता को भी उसकी उदारता की तरह पेश किया!

हिन्दुओं से नफरत करने वाला

आपको हमेशा यही बताया जाता रहा है कि अकबर ने सभी धर्मों को समान दर्जा दिया था और सभी धर्म की इज्जत करता था तो अब इन तथ्यों को देखे आप —

अकबर के एक दरबारी इमाम अब्दुल कादिर बदाउनी ने अपने इतिहास अभिलेख, ‘मुन्तखाव-उत-तवारीख’ में लिखा था कि 1573 में जब शाही फौजे राणाप्रताप के विरुद्ध युद्ध के लिए अग्रसर हो रहीं थीं तो उसने (बदाउनीने) ”युद्ध अभियान में सम्मिलित होकर हिन्दू रक्त से अपनी इस्लामी दाढ़ी को भिगों लेने के विशिष्ट अधिकार के प्रयोग के लिए इस अवसर पर उपस्थित होने में अपने लिए आदेश प्राप्त करने के लिए शाहन्शाह से भेंट की अनुमति के लिए प्रार्थना की.”

अपने व्यक्तित्व के प्रति इतने सम्मन और निष्ठा, और जिहाद सम्बन्धी इस्लामी भावना के प्रति निष्ठा से अकबर इतना प्रसन्न हुआ कि अपनी प्रसन्नता के प्रतीक स्वरूप मुठ्ठी भर सोने की मुहरें उसने बदाउनी को दे डालीं.

(मुन्तखाब-उत-तवारीख : अब्दुल कादिर बदाउनी, खण्ड II, पृष्ठ 383, वी. स्मिथ, अकबर दी ग्रेट मुगल, पृष्ठ 108)

हल्दी घाटी में जब युद्ध चल रहा था और अकबर से संलग्न राजपूत, और राणा प्रताप के निमित्त राजपूत परस्पर युद्ध रत थे और उनमें कौन किस ओर है, भेद कर पाना असम्भव हो रहा था, तब अकबर की ओर से युद्ध कर रहे बदांउनी ने, अपने सेना नायक से पूछा कि वह किस पर गोली चलाये ताकि शत्रु को ही आघात हो, और वह ही मरे. कमाण्डर आसफ खाँ ने उत्तर दिया था कि यह बहुत अधिक महत्व की बात नहीं कि गोली किस को लगती है क्योंकि सभी (दोनों ओर से) युद्ध करने वाले काफ़िर हैं, गोली जिसे भी लगेगी काफिर ही मरेगा, जिससे लाभ इस्लाम को ही होगा.”

(मुन्तखान-उत-तवारीख : अब्दुल कादिर बदाउनी, खण्ड II, अकबर दी ग्रेट मुगल : वी. स्मिथ पुनः मुद्रित 1962,हिस्ट्री एण्ड कल्चर ऑफ दी इण्डियन पीपुल, दी मुगल ऐम्पायर : सं. आर. सी. मजूमदार, खण्ड VII, पृष्ठ 132 तृतीयसंस्करण, बी. वी. बी.)

अकबर ने एकलिंग की मूर्ति तोड़ी और उस स्थान पर नमाज पढ़ी… और कहा कि आज हिन्दुओं के ईश्वर से मैं बड़ा हूँ मैं अल्लाह का भेजा हुआ पैगम्बर हूँ दीन-ए-इलाही की शुरुआत यहीं से मानी जाती है!

मतलब अकबर भी एक मुस्लिम जिहादी ही था न कि कोई सर्वधर्म समभाव का पालन करने वाला राजा..

व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन दोनों अकबर का महान नहीं कहा जा सकता तो क्या एक कुशल शासक था अकबर एक महान योद्धा जिसकी वजह से उसे महान कहा जाता है यदि ऐसा है तो आपको पुनः विचार करना चाहिए —

अकबर को कुल 6 राजाओं ने हराया था जिनमें राणा प्रताप भी थे कुछ के उदाहरण मैं आपको दे रहा हूँ —

सिंध के शासक भाटी राजपूत झूम्मा शाह ने अकबर को 7 बार हराया

16 वीं शताब्दी में सिंध का शासक भाटी राजपूत झूम्मा शाह था. झूम्मा शाह एक बहादुर, निडर, निर्भीक राजा था. उसे अपने बाहुबल पर विश्वास था. जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर के शासकों ने अकबर के आगरा दरबार में संधि मान लिया था. इन नरेशों ने अकबर के चरणों में तलवार भेंट कर दी थी. परन्तु झूम्मा शाह को अपने शौर्य पर विश्वास था. उसने मुगल शासक अकबर के आगे आत्मसंपर्पण करने से इंकार कर दिया था.

अकबर ने सिंध पर चढ़ाई की, उसे उम्मीद थी कि जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर के राजा उसकी मदद करेंगे. यें नरेश अकबर को खिराज ज़रूर देते थे, पर उसके नौकर नहीं थे. फलत: झूम्मा शाह ने अकबर को बुरी तरह पराजित किया. कहते हैं कि अकबर ने सिंध पर सात बार की चढ़ाई, और हर बार मुँह की खाई. हर जीत के बाद सिंध नरेश झूम्मा शाह का पराक्रम तेज होता गया, उसने हर बार अकबर को पराजित किया.

गोंडवाना की रानी दुर्गावती ने अकबर को तीन बार हराया

रानी दुर्गावती के समकालीन मुग़ल जनरल ख्वाजा अब्दुल मजीद असफ खान, जिन्होंने रेवा के शासक रामचंद्र को परास्त किया था.

रानी दुर्गावती के सुखी और सम्पन्न राज्य पर मालवा के मुसलमान शासक बाज बहादुर ने कई बार हमला किया, पर हर बार वह पराजित हुआ. तथा कथित मुगल शासक अकबर भी राज्य को जीतकर रानी को अपने हरम में डालना चाहता था. उसने विवाद प्रारम्भ करने हेतु रानी के प्रिय सफेद हाथी (सरमन) और उनके विश्वस्त वजीर आधार सिंह को भेंट के रूप में अपने पास भेजने को कहा. रानी ने यह मांग ठुकरा दी.

इसपर अकबर ने अपने एक रिश्तेदार आसफ खां के नेतृत्व में गोंडवाना पर हमला कर दिया. एक बार तो आसफ खां पराजित हुआ, पर अगली बार उसने दुगनी सेना और तैयारी के साथ हमला बोला. रानी दुर्गावती के पास उस समय बहुत कम सैनिक थे. उन्होंने जबलपुर के पास नरई नाले के किनारे मोर्चा लगाया तथा स्वयं पुरुष वेश में युद्ध का नेतृत्व किया. इस युद्ध में 3,000 मुगल सैनिक मारे गये लेकिन रानी की भी अपार क्षति हुई थी.

नवानगर (जामनगर) के राजा जाम सताजी जडेजा ने अकबर को 3 बार हराया

विक्रम सम्वंत 1633 (1576 ईस्वी) में मेवाड़, गोंड़वाना के साथ साथ गुजरात भी मुगलों से लोहा ले रहा था. गुजरात में स्वयं अकबर और उसका सेनापति कमान संभाले थे. अकबर ने जूनागढ़ रियासत पर 1576 ईस्वी में आक्रमण करना चाहा तब वहां के नवाब ने पड़ोसी राज्य नवानगर (जामनगर) के राजा जाम सताजी जडेजा से सहायता मांगी! क्षत्रिय धर्म के अनुरूप महाराजा ने पड़ोसी राज्य जूनागढ़ की सहायता के लिए अपने 30000 योद्धाओं को भेजा जिसका नेतृत्व कर रहे थे नवानगर के सेनापति वीर योद्धा भान जी दल जाडेजा.

नवानगर की सेना ने मुगलों का 20 कोस तक पीछा किया, जो हाथ आये वो मारे गए. अंत में भान जी दल जाडेजा ने मजेवाड़ी में अकबर के शिविर से 52 हाथी 3530 घोड़े और पालकियों को अपने कब्जे में ले लिया. उस के बाद यह काठियावाड़ी फ़ौज नवाब को उसकी कायरता की सजा देने के लिए सीधी जूनागढ़ गयी. जूनागढ़ किले के दरवाजे उखाड़ दिए गए. ये दरवाजे आज जामनगर में खम्बालिया दरवाजे के नाम से जाने जाते है और आज भी वहां लगे हुए हैं.

कुछ समय बाद बदला लेने की मंशा से अकबर फिर 1639 में आया किन्तु इस बार भी उसे “तामाचान की लड़ाई” में फिर हार का मुँह देखना पड़ा. इस युद्ध का वर्णन गुजरात के अनेक इतिहासकारों ने अपनी पुस्तकों में किया है, जिनमें मुख्य हैं – नर पटाधर नीपजे, सौराष्ट्र नु इतिहास के लेखक शम्भूप्रसाद देसाई, Bombay Gezzetarium published by Govt of Bombay, विभा विलास, यदुवन्स प्रकाश की मवदान जी रतनु आदि में इस शौर्य गाथा का वर्णन है.

विशेष

अकबर निहायत ही घटिया मक्कार चालबाज और हिंदूद्रोही व्यक्ति था यदि कोई उसे महान कहता है तो वो हिन्दू तो कतई नहीं हो सकता.. भारतीय इतिहास के साथ इस खिलवाड़ के मुख्य दोषी वे वामपंथी इतिहासकार हैं, जिन्होंने स्वतंत्रता के बाद नेहरू की सहमति से प्राचीन हिन्दू गौरव को उजागिर करने वाले इतिहास को या तो काला कर दिया या धुँधला कर दिया और इस गौरव को कम करने वाले इतिहास-खंडों को प्रमुखता से प्रचारित किया, जो उनकी तथाकथित धर्मनिरपेक्षता के खाँचे में फिट बैठते थे.

ये तथाकथित इतिहासकार अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की उपज थे, जिन्होंने नूरुल हसन और इरफान हबीब की अगुआई में इस प्रकार इतिहास को विकृत किया. भारतीय इतिहास कांग्रेस पर लम्बे समय तक इनका कब्जा रहा, जिसके कारण इनके द्वारा लिखा या गढ़ा गया अधूरा और भ्रामक इतिहास ही आधिकारिक तौर पर भारत की नयी पीढ़ी को पढ़ाया जाता रहा.

वे देश के नौनिहालों को यह झूठा ज्ञान दिलाने में सफल रहे कि भारत का सारा इतिहास केवल पराजयों और गुलामी का इतिहास है और यह कि भारत का सबसे अच्छा समय केवल तब था जब देश पर मुगल बादशाहों का शासन था. तथ्यों को तोड़-मरोड़कर ही नहीं नये ‘तथ्यों’ को गढ़कर भी वे यह सिद्ध करना चाहते थे कि भारत में जो भी गौरवशाली है वह मुगल बादशाहों द्वारा दिया गया है और उनके विरुद्ध संघर्ष करने वाले महाराणा प्रताप, शिवाजी आदि पथभ्रष्ट थे.

आगे और भी हिन्दू राजाओं का सत्य इतिहास आपसे शेयर करूँगा जिन्हें वामपंथी इतिहासकारों ने छुपा रखा है.

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