समानता का अधिकार

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कुछ समय से महिलाओं की गरिमा और सम्मान का मुद्दा काफी गरमाया हुआ है. आज इस विषय पर कुछ विचार रखना चाहूंगा.

भारत में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध बहुत ही भयावह और जघन्य होते है.

मैंने फेसबुक में मित्रों की फोटो में देखा कि कैसे वह अपनी बच्चियों को राजकुमारी की तरह पालते हैं; कैसे वह अपनी बहनों को सर माथे पर रखते है; और अपनी माताओं की चरण वंदना करते हैं.

लेकिन पता नहीं क्यों उनमें से कई पुरुष जब सड़क पर निकलते हैं तो लफंगो और उचक्कों की तरह व्यवहार करते हैं.

बहुत दूर जाने की आवश्यकता नहीं है. उन्हीं पुरुष मित्रों की फेसबुक पोस्ट देख लीजिए. कई पुरुष काफी भद्दी बातें लिख देते हैं; चाहे वह इंजीनियर हो या व्यवसायी.

अपने बच्चे की महिला टीचर के बारे में भी भद्दी और अश्लील बातें लिख देंगे और उसे ‘मज़ाक’ के रूप में टालने की कोशिश करेंगे. यकीन मानिए मुझे वह परले दर्जे के गंवार और विकृत मानसिकता के लगते हैं.

इस समस्या से निपटने के लिए तीन सुझाव देना चाहूंगा.

सबसे पहले, स्त्री पुरुष की समानता, आसान शब्दों में, लड़कियों और लड़कों को एक समान रूप से देखने के बारे में है; सभी को एक समान अवसर के बारे में है; सभी को एक समान अधिकार मिलने के बारे में है – उन अधिकारों में पारिवारिक संपत्ति का हिस्सा भी शामिल है.

स्त्री और पुरुष की समानता हमारे घर से शुरू होती है. हमारे अपने माता पिता, हमारी अपनी बहन और बच्चों से.

स्त्री पुरुष समानता का मतलब यह नहीं है कि हमें महिलाओ का सम्मान करना है. अगर हम किसी व्यक्ति का आदर करते हैं तो उतनी ही आसानी से हम उस व्यक्ति का अनादर कर सकते है, ‘सम्मान’ लूट सकते हैं.

इसके अलावा अगर हम सम्मान के रास्ते को अपनाते हैं तो एक तरह से हम अभिशप्त हैं. क्योंकि फिर हमें इस बात को हर समय सिद्ध करना होगा कि हमारी सभ्यता, हमारा धर्म, हमारा संप्रदाय, हमारे देवी-देवता, हमारे पैगंबर, हमारे गुरु, हमारा दैवीय ज्ञान इत्यादि, इत्यादि… सर्वश्रेष्ठ है.

हमें ‘लव जिहाद’ करके किसी भी तरह से अपने आप को सर्वश्रेष्ठ साबित करना है. दूसरे शब्दों में क्योंकि अब हम सर्वश्रेष्ठ हैं, तो हमारे आचरण में सुधार या संशोधन की कोई गुंजाइश ही नहीं है. प्रथम सुझाव को हम सभी अभी इसी क्षण अपना सकते हैं, लागू कर सकते हैं.

दूसरा सुझाव, स्त्री पुरुष समानता के अनुरूप शिक्षा और भाषा को अपनाना चाहिए. हमें अपने शैक्षणिक संस्थानों के पाठ्यक्रम में ऐसे विषय पढ़ाने चाहिए जिनसे स्त्री-पुरुष समानता को वैज्ञानिक, कानूनी, और व्यवहारिक तरीकों से समझाया जा सके.

इस पाठ्यक्रम में हमें इस बात से दूर रहना होगा कि महिलाएं पूजनीय है. अगर महिलाएं पूजनीय है तो पुरुष भी उतने ही पूजनीय है.

हमारी भाषा ऐसे शब्दों से भरी हुई है जिनसे पुरुषों की शक्ति का भाव प्रगाढ़ होता है. उदाहरण के लिए, क्या कोई मुझे समझा सकता है कि हिंदी भाषा में ट्रक पुल्लिंग क्यों है जबकि बस या कार स्त्रीलिंग है?

ऐसे उदाहरण और भी भारतीय या विदेशी भाषाओं में मिल जाएंगे. क्या हमें इस भेदभाव को समाप्त नहीं करना चाहिए? क्योंकि यही भाषाई भेदभाव हमारे मन में अनजाने में स्त्री-पुरुष के बारे में रूढ़िवादी विचारों को गहरा करता है. इस सुझाव को अपनाने में काफी समय लगेगा.

तीसरा और अंतिम सुझाव कानून-व्यवस्था को मजबूत करने के बारे में हैं. कानून-व्यवस्था बहुत व्यापक शब्द है, लेकिन वर्तमान समय में इसका अर्थ है कि ठीक से प्रशिक्षित पुलिस बल और शीघ्र और सक्षम न्याय.

सभी सब-इंस्पेक्टर और उससे वरिष्ठ सभी पुलिस अधिकारियों की वार्षिक मूल्यांकन रिपोर्ट महिलाओं के विरुद्ध अपराधों के प्रति उनकी कार्रवाई के आधार पर भी होना चाहिए.

हो सकता है कि विपरीत मूल्यांकन के डर से वह ऐसे अपराधों को संज्ञान में नहीं लेना चाहेंगे. लेकिन अगर किसी भी ऐसे अपराध को अगर वह पुलिस अधिकारी रजिस्टर नहीं करता तो उसकी और उससे दो या तीन स्तर के वरिष्ठ अधिकारियो की पदोन्नति और वेतन वृद्धि कुछ वर्षो के लिए रोक देनी चाहिए.

महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अपराधों की जांच होनी चाहिए और इस तरह के अपराध में लिप्त व्यक्तियो के केस न्यायपालिका के सामने तेजी से लाना चाइये.

ऐसे मामलों में न्यायालय को त्वरित और हतोत्साहित करने वाला निर्णय देना चाहिए, जो भारत में महिलाओं के खिलाफ अपराधों के लिए अपराधियों के मन में भय पैदा करेगा. ये उपाय अभी भी ऐसे अपराधों को मिटा नहीं सकते हैं, लेकिन मुझे यकीन है कि ये उनकी घटनाओं को कम कर देंगे.

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