कल, आज और कल : समय के साथ बदलती साहस की परिभाषा

विज्ञान कहता है कि समय एक रिलेटिव एंटिटी है. तो उससे जुड़ी हर चीज भी, जैसे संस्कृति और शायद ‘साहस’ भी. इनकी परिभाषा बदलती रहती है समय के अनुसार.

आज हम तमाम औरतें जब स्त्री विमर्श करती हैं तो शिक्षा, पति चुनने की आज़ादी, कपड़े पहनने की आज़ादी, बराबरी के अधिकार पर बात करती हैं.

हममें से कुछ, बातों से कुछ ज्यादा करती हैं और समाज की बनाई प्रचलित धारा को तोड़ते हुये, अपनों से लड़ते हुये, शायद शादी से मना कर के आगे की पढ़ाई करती हैं.

या फिर घूंघट लिए परिवार में जीन्स पहन लेती हैं, या फिर माहवारी जैसे विषय पर बात करती हैं, और हम कहते हैं ये औरतें साहसी हैं. लीक से हटकर चलने वाली.

पर सोचती हूँ कि क्या मेरी परपोती वाली पीढ़ी इन बातों को साहस मानेगी? शायद नहीं. वो बोलेगी, “जब आप औरत को पुरुष के बराबर मानती थी तो आपने सिर्फ घूंघट या बुर्के से छुटकारा पाने की कोशिश क्यों की, हमारी तरह टॉपलेस विरोध क्यों नहीं किया? इंटरकास्ट शादी ही क्यों की, अठारह की उम्र में लिव-इन में क्यों नहीं रही? आप कमजोर थी. You know… the correct word is conservative.”

पद्मावती फ़िल्म का कितना विरोध होना चाहिए ये आपकी बहस है, पर एक औरत होने के नाते पद्मावती के साहस को आप इक्कीसवीं सदी में बैठ कर जज कर रहे/ रही हैं, तो इससे मेरा विरोध है.

जब युद्ध हुआ करते थे पहले, तो ज़मीन, धन, सल्तनत, बहादुरी दिखाने का गौरव के साथ ही एक बड़ा मोटिवेटिंग फैक्टर होता था दुश्मनों की स्त्री के शरीर पर कब्ज़ा. युद्ध में पुरुष मरते थे और औरतें हवस का शिकार बनती थीं.

आज इक्कीसवीं सदी में जब आपने बॉक्सिंग से लेकर दंगल करती स्त्रियों को देख लिया है, तो कह रही हैं कि पद्मावती इतनी बहादुर थी तो उन सोलह हज़ार औरतें को साथ लेकर लड़ क्यों नहीं गयी?

मैं सिर्फ उस ज़माने को देखूंगी जिसमें उन सोलह हजार स्त्रियों को मालूम था कि दुश्मन के सैनिक जीतने के बाद उनको नोचने-काटने के सपने बुन रहे हैं, और उन्होंने इंकार कर दिया उन मंसूबों को अंजाम तक पहुंचने देने से.

जहां तमाम इतिहास रंगा पड़ा है युद्ध के बाद औरतों की दुर्गति से, वहाँ उन सोलह हज़ार ने सिर उठा कर आग में छलांग मार दी.

वहाँ सिर्फ पति की मौत का दु:ख नहीं था, ‘मेरे शरीर पर मेरा हक़’ का नारा भी था. हाँ, वह नारा आपके आज के वन-नाइट-स्टैंड की आज़ादी को मैच नहीं करता, पर अपने समय से मीलों आगे था.

अगर यह बहादुरी नहीं तो दुनिया में कोई भी औरत बहादुर नहीं जो अपने समय से पाँच सौ साल आगे के पैमाने पर खरी ना उतर रही हो.

महज आप साहसी नहीं हैं अगर आप सिर्फ स्त्री की बराबरी की बात करती है, घूंघट उतार फेंकती है. नंगे होकर सड़क पर घूम आइये तब आप होंगी साहसी क्योंकि बदलाव के मद्देनज़र अगले पांच सौ साल बाद औरतें आराम से कर लेंगी ऐसा.

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