भेड़ बनोगे तो कोई न कोई भेड़िया किसी दिन खा ही जायेगा

मीडिया में एक सात वर्षीय बच्ची के इलाज में Fortis Hospital द्वारा 18 लाख रूपए का बिल बनाने का मामला सुर्खियों में है.

प्राइवेट अस्पताल और प्राइवेट डॉक्टर कैसे अपने मरीजों को लूटते हैं ये किसी से छिपा नहीं है. पर इस सिस्टम के लिए मैं सिर्फ इन अस्पतालों को ही दोषी नहीं मानता हूँ.

मेरे पिता जी कहा करते थे… जब तक भेड़ें रहेंगी, शेर कभी भूखे नहीं मरेंगे. जब तक मूर्ख इस धरती पे रहेंगे, चालाक लोग कभी भूखे नहीं मरेंगे.

व्यापारी जानते हैं कि इस दुनिया में कुछ इतने मूर्ख लोग हैं जो brand के लिए कोई भी कीमत चुकाने को तैयार हैं…

तो जब ऐसे लोग मौजूद हैं तो उन लोगों की इन मूर्खतापूर्ण ज़रूरतों को पूरा करने के लिए नित नए व्यापारी, नए नए ब्रांड ले के मैदान में उतरते रहते हैं.

इसके अलावा भारत देश में एक नवधनाढ्य वर्ग पैदा हुआ है… इस वर्ग का आदमी अपनी जड़ें तुरंत भूल जाता है. अपना अतीत भूल जाता है.

अपनी पुरानी हैसियत, अपना गांव गिरांव, उसके अपने लोग, उसके अपने माँ बाप, भाई बंधु, उसे हीनता का बोध कराते हैं…

इन लोगों को गरीब मेहनतकश लोगों से बड़ी भयंकर बू आती है… ये इन्हें देखना तक नहीं चाहते.

हर वो जगह जहां आम हिंदुस्तानी आता जाता है, ये नव धनाढ्य वर्ग उसके पास भी नहीं फटकना चाहता. इसे मेहनतकश आदमी के पसीने से भयंकर बू आती है…

तो ऐसे में ये उन बसों, रेलों, अस्पतालों, सिनेमाघरों में कैसे जा सकते हैं जहां एक गरीब मजदूर जाता है???

कभी सोचा है कि Starbucks में 300 रूपए की कॉफ़ी कौन पीता है? कौन हैं वो लोग जो Starbucks की एक कप कॉफ़ी पीने के लिए घंटों लाइन में खड़े रहते हैं?

मैं अपने इर्द गिर्द बहुत से ऐसे लोगों को देखता हूँ जिनको यदि रेल की स्लीपर क्लास में यात्रा करने को कह दो तो नानी मर जाती है.

लोगों ने ऐसी छोटी छोटी बातों को अपना स्टेटस सिंबल बना लिया है. वो कहाँ खाते पीते, उठते बैठते हैं, उनका बच्चा किस branded स्कूल में पढ़ता है, वो किस Brand के अस्पताल में इलाज कराते हैं… वो किस ब्रांड के कपड़े पहनते हैं, कौन सा चश्मा पहनते हैं… उनका सारा जीवन इन्ही brands में ही उलझा रहता है.

जालंधर पंजाब का एक Medical Hub बन चुका है. गली गली में प्राइवेट अस्पताल खुले हुए हैं. और ये प्राइवेट अस्पताल चूंकि छोटे छोटे परिसरों में चल रहे हैं इसलिए इनमे जगह की किल्लत तो रहती है है.

मुझे तो ये सभी प्राइवेट अस्पताल पोल्ट्री फ़ार्म लगते हैं… इनकी तुलना में जालंधर का PIMS Hospital और Medical College 50 एकड़ में फैला एक विशाल आधुनिक अस्पताल है… जहां सरकारी रेट पर इलाज होता है.

क्षेत्र के सबसे अच्छे और सीनियर डॉक्टर्स हैं यहां… इसके बावजूद पूरा अस्पताल खाली पड़ा है…

मेरे बेटे का डेंगू का इलाज इस अस्पताल में हुआ और 4 दिन में सिर्फ 5400 रूपए का बिल बना.

मेरे एक डॉक्टर मित्र बता रहे थे कि यही इलाज किसी प्राइवेट अस्पताल में होता तो कम से कम 1 लाख रूपए का बिल बनता.

PIMS पिछले 7 – 8 साल से चल रहा है इसके बावजूद लोग इसमे इलाज कराने क्यों नहीं आते?

क्यों जाते हैं इन प्राइवेट अस्पतालों में अपनी खाल उतरवाने? और जब गए हो तो रोते क्यों हो? भेड़ मत बनो… भेड़ बनोगे तो कोई न कोई भेड़िया किसी दिन खा ही जायेगा.

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