पूरी तरह जायज़ है पद्मावती का विरोध

सबसे बड़ा झूठ जो आजकल परोसा जा रहा है, और जो कि वामपंथी इतिहासकारों की किताबों में भी घुसेड़ दिया गया है वो ये कि चित्तौड़ अपनी महारानी को शीशे में या तालाब की परछाईं में दिखाने को राजी हो गया था.

आप चित्तौड़गढ़ घूम आइये… वहां बच्चे बच्चे की ज़ुबान से आपको ये सुनने को मिल जाएगा कि ऐसा असंभव है… ऐसा कभी कुछ नहीं हुआ…

जो लोग राजपूती अस्मिता, मान मर्यादा से लेश मात्र भी परिचित हैं वो जानते हैं कि समाज में किस हद तक पर्दा प्रथा प्रचलित थी…

आज से करीब 30 साल पहले मेरे पिता जी के एक सहकर्मी जो राजस्थान के राजपूत थे, वो बताया करते थे कि सामान्य गृहस्थों में भी महिलाएं सार्वजनिक स्थानों में अपने पति से भी पर्दा करती थीं.

50 और 60 के दशक तक तो ये दशा थी कि देर रात गए, पति चोरी छिपे, दबे पांव, चोरों की तरह, सबकी नजरें बचा के ही अपनी पत्नी के शयन कक्ष में प्रवेश करते थे और कब घुसे, कब निकले, किसी को कभी पता भी नहीं चला…

मुझे अच्छी तरह याद है कि 80 के दशक तक ही मेरे सबसे बड़े चचेरे भाई नई पीढ़ी के लड़कों को गरियाते थे कि ये साले तो दिन दहाड़े भी अपनी बीवियों के कमरों में घुसने की फिराक में रहते हैं…

आजकल के Cool Dudes को ये तमाम बातें दकियानूसी और अविश्वसनीय लग सकती हैं पर पुराना ज़माना ऐसा ही था.

मैं तो आज से सिर्फ 20 या 30 साल पुरानी बात कर रहा हूँ, महारानी पद्मिनी का काल तो सदियों पुराना है.

ग्रामीण समाज में तो महिलाएं आज भी रिश्तेदारों/ मेहमानों के सामने नहीं आती… मने ढकी छुपी पर्दे में भी नही आती… तो मुंह दिखाना तो दूर की बात है…

जब रिश्तेदार के सामने आना भी avoid किया जाता है तो दुश्मन के सामने आएगी??? वहां, जहां कि सवाल आन बान शान का था???

चित्तौड़गढ़ का बच्चा बच्चा सिर्फ इसी बात पे उबल जाता है जब ये कहा जाता है कि उनकी माँ दादी कक किसी ने शीशे में ही देख लिया ……….

दूसरा सवाल है रानी के घूमर नृत्य और उसमें पहनी गयी राजपूती पोशाक का…

आज तो ये ज़माना है कि साड़ी के साथ जो blouse पहना जा रहा है उसकी शक्ल ब्रा नुमा होती है.

मैंने जब पहली बार एक शादी में ब्रा-नुमा blouse पहने महिला देखी तो अपनी धर्मपत्नी से कहा कि हाय राम… ये औरत तो ब्रा के ऊपर blouse पहनना ही भूल गयी… तो धर्मपत्नी ने बताया कि हे पतिदेव, वो कुछ नहीं भूली है… और वो ब्रा नहीं Blouse ही है…

तो वो पीढ़ी जो मानुषी छिल्लर की बिकनी शूट की फोटो देख-देख तारीफ करती नहीं अघा रही उसको घूमर नाचती हुई रानी का पेट और नाभि देखने से कोई परहेज नहीं…

पर शायद संजय लीला भंसाली और दीपिका पादुकोण को पता नहीं होगा कि भारत की महिलाएं पुराने ज़माने में साड़ी या लहंगे के साथ जो blouse पहनती थीं उसकी लंबाई पूरी कमर तक होती थी.

राजस्थानी पोशाक में आज भी संभ्रांत महिलाएं वहीं पोशाक पहनती हैं जिसमे पेट या नाभि नहीं दिखती… उनकी चोली बैकलेस या स्लीवलेस नहीं होती…

सवाल है कि भंसाली रानी पद्मिनी की कहानी का adaptation नहीं दिखा रहे हैं जैसे कि अनुराग कश्यप ने Dev D में देवदास का adaptation फिल्माया था, या बहुत से फिल्मकारों ने Romeo and Juliet का adaptation फिल्माया है…

पद्मिनी एक पीरियड फ़िल्म है और पद्मिनी एक ऐतिहासिक पात्र है… वो कोई काल्पनिक पात्र नहीं है… फिल्मकार का ये नैतिक कर्तव्य है कि फ़िल्म का periodic treatment सही हो और सत्य के करीब हो… देश काल के अनुरूप हो…

रानी पद्मावती हमारी आस्था की प्रतीक हैं, हमारी अस्मिता की प्रतीक हैं… आस्था और अस्मिता से खिलवाड़ नहीं होना चाहिए… पद्मावती का विरोध पूरी तरह जायज़ है…

क्रमशः…

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