ब्रह्मपुत्र : ओ ज़िंदगी के सखा यूं ही बहना…

चाहे नदियाँ कहीं से भी उतरे, धरती पर आने के बाद वो धरती की जायी हो जाती हैं. धरती की सारी बाधाएं, सारी पीड़ाएं नदी के रूप में भी परिवर्तन करती हैं.

धरती की ही तरह इन नदियों को भी हम माँ कहते हैं. माँ कहते ही हमारी आस्था का रूप बदल जाता है. याद आने लगता है अस्तित्व का उद्गम बिंदु, याद आने लगती है जन्म के समय की माँ प्रसव पीड़ा. और याद आती है उद्गम से समंदर तक की नदी यात्रा.

लेकिन एक नदी ऐसी भी है जिसे माँ नहीं पुत्र कहा गया… ब्रह्मपुत्र. ब्रह्मा के पुत्र. जगत रचयिता के पुत्र. जो बांग्लादेश की सीमा में जमुना के नाम से दक्षिण में बहती हुई गंगा की मूल शाखा पद्मा के साथ मिलकर बंगाल की खाड़ी में जाकर मिलती है.

आज अचानक इस जादुई गीत को प्रकट होना था.. सो हुआ जिसे मैंने धरती बनकर सुना… फिर और कोई रूप बाकी न रहा… धरती बनते ही माँ हो जाना ही तो वो रूपांतरण प्रक्रिया है जिसके लिए ध्यान की न जाने कितनी विधियां सर्वत्र बिखरी पड़ी है. और हम ध्यान की मूल अर्थ को छोड़कर प्रक्रियाओं में ही उलझकर रह जाते हैं…

आध्यात्मिक परिभाषाओं में ध्यान को हमेशा निर्लिप्तता से जोड़ा गया है, साक्षी भाव से जोड़ा गया है. लेकिन आज इस गीत को सुनते हुए एक नया अनुभव जुड़ गया कि जब आप किसी एक भाव में पूरी तरह से लिप्त हो जाते हैं, इतने कि ब्रह्माण्ड की सारी घटनाएं आपके लिए विलुप्त हो जाती हैं. तब आप ध्यान के उन आयामों को छू पाते हैं जहाँ निर्लिप्तता भी उस भाव में लिप्त होने के लिए उत्कंठ हो उठती है…

ये वो क्षण था जब यह धरती अपने ब्रह्मपुत्र के लिए पूरी आशीर्वाद में बदल गयी थी… गीत पूरा होने के बाद वो क्षण तो जाता रहा, लेकिन छोड़ गया आशीर्वाद का वो भाव जो ब्रह्माण्ड में शक्ति कणों के रूप में हमेशा विद्यमान रहेगा.

और जब जब ब्रह्मपुत्र पर कोई विपदा आएगी… वो शक्ति-कण उसकी लहरों को उस आशीर्वाद की याद दिलाती रहेंगे कि

तेरी लहरों में
जीवन की आहट मिले,
तेरी बूंदों से
दुनिया के आंसू धुले
नदियाँ नहीं नद कहे तुझको
कभी क्रोध ना दिखाना
तेरा सदियों से जारी है बहना
तुझे क्या क्या नहीं पड़ा सहना
यहाँ बसी हर धड़कन का तू ही है रखवाला
ओ ज़िंदगी के सखा यूं ही बहना…

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