मैं प्रेम में हूँ, मैं ध्यान में हूँ

तुम जानते हो, शोना
हर लम्हा, हर पल
चलते फिरते, उठते बैठते
काम करते, बतियाते या फिर घूमने जाते
मैं ध्यान में हूँ
और यह तुम्हारी वजह से है…

उस प्रेम की वजह से है जो तुम्हे देखते ही उज्जवल हुआ मेरे हृदय में
एक लौ की तरह जलने लगा मेरे भीतर भीतर
एक साज की तरह बजने लगा मेरी हर साँस में…

प्रेम में होना है ध्यान में होना
हर लौकिक चीज़ का दिव्य हो जाना
शाम और सुबह का घुलमिल जाना
बादलों और सूर्य का एक सा लगना
अमावस में भी चाँद दिखना
और चाँद में प्रेमी
फूलों से बातें करना…
हवाओं को शॉल की मानिंद लपेट लेना
परिंदों की उड़ानों में उड़ान भरना…

ध्यान में जाने के लिए साँसों के आरोह अवरोह पे दिमाग स्थिर करने की ज़रुरत नहीं है मुझे
हर सांस में प्रेम बसा है, हर सांस जपती है बस एक ही नाम
मैं हो गई हूँ वो नाम, वो ख़ूबसूरत अहसास
तो सुबह हो या शाम, रात हो या दुपहर
खाना खा रही हूँ या बना रही हूँ
काम कर रही हूँ या सो रही हूँ
मैं प्रेम में हूँ
मैं ध्यान में हूँ

आँखें बंद कर चौकड़ी मार बैठने की भी ज़रूरत नहीं है मुझे
न कोई माला फेरने की, न कोई मन्त्र जपने की, न किसी स्थल पे जाने की

मैं कभी भी नाचने लग जाती हूँ, गाने लग जाती हूँ
गोल गोल घूमने लग जाती हूँ, दरविशों के जैसे
हाँ, मुझे याद है, एक बार बताया था तुमने वो उल्टा घूमते हैं धरती के जैसे

तुम्हारी बातें ही तस्बीह के मनकों की तरह हैं मेरे लिए
मेरी ज़िंदगी के पोरों पे रहते हैं वो मनके
हर स्वाल का जवाब है उनमें
ब्रह्माण्ड के सब राज हैं उन में…

सच पूछो तो राज़ कोई है ही नहीं, सिर्फ़ प्रेम है,
सिर्फ़ प्रेम

हाँ, हमारे वेदों में, शास्त्रों में दरियाफ्त हैं अनगिनत मूलयवान मंत्र, उनके उच्चारण, उनकी मुद्राएं
फिर भी सब से ऊपर आता है प्रेम

प्रेम में लबालब थिन्नन शिकारी ने अपनी मासूमियत, अपनी अज्ञानता में शिवलिंग पे मांस चढ़ाया
अभिषेक किया उस पानी से जो वह मुहँ में भर के लाया था पास की किसी नदी से
पाँव का अँगूठा भी रख दिया शिवलिंग पे

पर प्रेम इतना कि अपनी आँख निकाल के रख दी जब, शिवलिंग की एक आँख से देखा बहता हुआ लहू
शिव की आँखों में भी आ गए आंसू, साक्षात प्रगट हो, बढ़ के लगाया गले

कितना शिवमय है सब, कितना प्रेममय
प्रेम में होना ही है योग में होना
ध्यान में होना
ईश्वर के संग होना और शायद ईश्वर ही हो जाना
जैसे एक फूल की पत्ती में छुपा होता है पूरा गुलाब

तो तुम्हारा शुक्रिया, शोना, मुझ में प्रेम ज्योति जगाने के लिए
वैसे सोचती हूँ जब सब एक ही है
न तुम्हारा कोई वजूद है, न मेरा
तो शुक्रिया किस का अदा करना चाहिए
शायद उस शक्ति का जिस ने रचा यह सब कि हम मिट सकें, मर सकें
और पहुँच सकें वापिस उसी स्रोत में जहाँ से हम आए हैं

खज़ाना तो वहीँ है जहाँ से चले थे पर सफर ज़रूरी था
नहीं तो तुमसे कैसे मिलती, कैसे सीखती ढेर सारी ख़ूबसूरत सी बातें
कैसे जानती खुदा मुझ में ही है, मैं ही है
और मैं जो समझती है कि मैं हूँ कभी थी ही नहीं

ओह! प्रेम में होना है खुदा हो जाना
तुमने भी तो यही कहा था
यही एक रास्ता है, यही मंज़िल भी
बस प्रेम करती रहो

– तुम्हारी सोनप्रिया

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