इतिहासबोध का जीवंत शिलालेख है राजस्थान

हीगल ने लिखा है कि “किसी युग का महापुरुष वह व्यक्ति होता है जो उस युग की आकांक्षाओं को शब्द दे सके, उस युग को बता सके कि उसकी आकांक्षायें क्या हैं और उसे कार्यान्वित कर सके. वह जो करता है वह उसके युग का दृश्य और सार तत्व होता है, वह अपने युग को रूप देता है.”

राजस्थान की धरती ने अनेक महापुरुषों को जन्म दिया है जिन्होंने अपने शौर्य से अपने युग की आकांक्षाओं को प्रत्येक नगर और गाँव के शिलालेखों पर अंकित किया है.

लोककथा है कि एक बार दस-बारह राजपूत राणा जी की सहायता के लिए जा रहे थे. तभी मार्ग में उन्हें चालीस दस्यु भीलों ने घेर लिया. राजपूतों में से एक बुजुर्ग ने अन्य राजपूतों से पूछा, ‘अठै क बठै?’ अर्थात् यहाँ (इन भीलों से) लड़ना चाहते हो या वहाँ (मुगलों से)? सबने कहा ‘बठै’ यानि वहाँ और भीलों से बिना लड़े ही सारे जेवरात उतार कर दे दिए. ऐसा इसलिए किया क्योंकि मुगलों के विरुद्ध युद्ध में प्रत्येक राजपूत की जान कीमती थी. एक भी जान भीलों से लड़ने में गंवाई नहीं जा सकती थी.

समूचे राजस्थान में भारत की सामरिक संस्कृति संरक्षित है. उदयपुर और जयपुर में पर्यटकों के लिए दो पुस्तकें खूब बिकती हैं. एक तो Robert Elgood की “Rajput Arms and Armour” और दूसरी महारानी गायत्री देवी की जीवनी.

रॉबर्ट एलगुड की पुस्तकें बहुत महंगी हैं. इसमें जोधपुर के मेहरानगढ़ दुर्ग में प्रदर्शित प्राचीन अस्त्र-शस्त्रों का वर्णन है. दो वॉल्यूम का सेट बारह हजार पाँच सौ रुपये का है. ये उत्कृष्ट पुस्तकें महाराजा गज सिंह जी ने प्रकाशित करवाई हैं.

बनारस में एक बुक शॉप में हम और बाऊ साब ने इसे देखा था. भीतर कुछ पन्ने पलटे तो आंखें फटी की फटी रह गयीं. एक पृष्ठ पर युद्ध में जाने वाले हाथियों का विवरण था. युद्ध में जाने से पूर्व पचास से अधिक सामग्री से हाथियों की पूजा की जाती थी.

ये पुस्तकें प्रकाशित करवाने का ध्येय उस पर लिखे संक्षिप्त विवरण से स्पष्ट हो जाता है: “…For political and more recently commercial reasons the cultural history of the subcontinent has been largely expressed through the Mughal experience of India. Whilst it is true that the Muslim Mughals dominated India the empire they ruled was predominantly Hindu. This book reclaims the Hindu contribution to the military culture of the Mughal period. The Rajputs were very closely aligned to the Mughals from the reign of Akbar in the sixteenth century but they retained their own distinctive values: in the military sphere their preferences were extremely conservative. A Rajput warrior’s sword was his most valued possession, guardian of his honour and his women, the means to fame and spiritual release…”

जयपुर में राजस्थानी थाली खाते हुए अमित भाई जी ने एक शाकाहारी व्यंजन के बारे में बताया (मैं नाम भूल गया) जो राजपूत सैनिक युद्ध अभियान के दौरान बनाते खाते थे.

मैंने उनसे कहा कि हमने तो टीवी के माध्यम से यही सुना था कि राजपूत युद्ध के समय मांसाहार का सेवन ही करते थे. विषय शाकाहार बनाम मांसाहार नहीं है. मैं मांसाहार का विरोधी नहीं हूँ. विषय यह है कि आप अपनी धरोहर को किस प्रकार सहेज कर रखना चाहते हैं और आने वाली पीढ़ियों को क्या बताना चाहते हैं.

जैसे किसी ने लिखा कि राजपूत युद्ध कौशल में पारंगत नहीं थे इसलिए हारते रहे. यहाँ यह बताना आवश्यक है कि एक समय में राणा कुंभा ने गुजरात से हरियाणा तक के मुसलमान शासकों को पराजित किया था जिसके लिए उन्हें ‘हिन्दू सुरत्राण’ की उपाधि मिली थी. अर्थात् ऐसा हिन्दू शासक जिसकी अधीनता सभी सुल्तानों ने स्वीकार की हो.

उदयपुर के समीप हल्दी घाटी में राणा कुंभा के ही वंशज महाराणा प्रताप को समर्पित संग्रहालय स्थित है. इसमें पर्यटकों को महाराणा प्रताप के जीवन पर एक लघु चलचित्र दिखाया जाता है. चलचित्र में प्रमुखता से बताया जाता है कि हल्दी घाटी का युद्ध ‘सांप्रदायिक’ नहीं था क्योंकि राणा की सेना में हकीम खान सूर नामक एक मुसलमान सेनापति था.

मुझे यह समझ में नहीं आया कि हम सेकुलरवाद के अपराध बोध से क्यों ग्रसित हैं? महाराणा प्रताप के 23-24 अन्य सेनापति थे जो हिन्दू थे जिनके विशाल चित्र उसी संग्रहालय में लगे हैं किन्तु बात हकीम खान सूर की ही क्यों की जाती है? हमें ‘सांप्रदायिक’ न होने का सर्टिफिकेट क्यों देना पड़ता है?

वास्तुकला की बात करें तो कुम्भलगढ़ दुर्ग देखकर आश्चर्य होता है कि पहाड़ी पर ऐसी विराट संरचना का निर्माण कैसे किया गया होगा. दुर्ग से जो दीवार निकलती है उसकी लम्बाई 36-38 किमी बताई जाती है और उस पर तीन घोड़े अगल-बगल एक साथ दौड़ सकते हैं.

आज बनाये जाने वाले पुलों की हालत देखिये. वे पांच साल नहीं टिकते और यहाँ इतना बड़ा दुर्ग पांच सौ सालों से सीना तान के खड़ा है. राणा कुंभा जैसे राजा भारत में नगण्य ही होंगे. उनके एक हाथ में शस्त्र तो दूसरे में शास्त्र था. युद्धनीति के साथ ही उन्होंने संगीतराज नामक ग्रन्थ की रचना भी की थी.

मेवाड़ के शासक स्वयं को राजा नहीं मानते थे. उनकी मान्यता थी कि राज तो भगवान एकलिंग जी (शिव) करते हैं. इसीलिए वे स्वयं को ‘राणा’ कहते थे. आज भी एकलिंग जी का मंदिर मेवाड़ राजघराने के अधीन है.

राजपूतों का धर्म के प्रति अत्यधिक अनुराग था. इसका एक उदाहरण मिलता है जयपुर महल में प्रदर्शित ‘गंगाजली’ में. चौदह हजार चांदी के सिक्कों को गलाकर महाराजा सवाई माधो सिंह द्वितीय ने बड़े-बड़े दो पात्र बनवाये थे जिनमें वे गंगाजल भर कर इंग्लैंड ले गए थे ताकि धार्मिक शुचिता यथावत रहे.

मुगलों द्वारा तोड़े गए सहस्रबाहु जैसे मन्दिरों के अवशेष स्मरण कराते हैं उन नीच इस्लामी हमलावरों की मानसिकता का जिनके इतिहासबोध के गुण वामपंथी इतिहासकार गाते हैं. वामपंथियों ने लिखा है कि हिन्दू शासकों की अपेक्षा इस्लामी शासकों का इतिहासबोध उच्चकोटि का था. प्रश्न है कि ऐसे इतिहासबोध की अतिरंजना का क्या महत्व जो दूसरे के स्थापत्य का विनाश कर उस पर अपनी इबारत लिखे?

राजस्थान के लोग और उनकी जीवनशैली इसके प्रतीक हैं कि उनमें इतिहासबोध का अभाव नहीं है और वे अपनी धरोहर को संरक्षित रखने के प्रति सजग और निरंतर प्रयासरत हैं.

राजस्थान पत्रिका में ‘नगर परिक्रमा’ नाम से लगातार पच्चीस वर्षों तक स्वर्गीय नंदकिशोर पारीक “नागरिक” जी का स्थायी स्तम्भ प्रकाशित हुआ था. इस स्तम्भ में जयपुर की गलियों का इतिहास प्रकाशित होता था.

उदयपुर की गलियाँ भी बनारस जैसी ही संकरी और यहाँ से अधिक उतार चढ़ाव लिये हुए हैं परन्तु वहाँ गंदगी नहीं है. बागोर की हवेली में एक घंटे का राजस्थानी लोक नृत्य का प्रदर्शन होता है जिसमें अनेक जनजातियों की संस्कृति की झलक देखने को मिलती है.

राजस्थान में कोटा के अतिरिक्त भी कुछ विशिष्ट शिक्षण संस्थान हैं. उदयपुर में सोलर ऑब्जर्वेटरी है जहाँ 2015 में Multi application Solar Telescope (MAST) स्थापित किया गया था. यहाँ सोलर फिजिक्स में पीएचडी की जा सकती है. यहाँ स्कूली बच्चे औपचारिक अनुमति लेकर सौर भौतिकी की जटिलताएं समझने जा सकते हैं. जयपुर में देश का प्रथम राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान (NIA) स्थित है जो 1976 से अनवरत आयुर्वेद को छद्म विज्ञान की संज्ञा देने वाली पश्चिमी अवधारणा को चुनौती दे रहा है.

राजस्थान जाकर कुछ अनोखी बातों का भी पता चला जिनका उल्लेख प्रचलित पुस्तकों में नहीं मिलता. समय की कमी के कारण हम चित्तौड़गढ नहीं जा पाए. चित्तौड़ दुर्ग में उन रानियों और महिलाओं के हाथों की छाप है जिन्होंने जौहर किया था. वह चित्र स्मरण कर ही मन विचलित हो उठता है.

एडवर्ड हैलेट कार ने अपनी पुस्तक ‘इतिहास क्या है’ में लिखा है कि “तथ्यों से विहीन इतिहासकार बिना जड़ का और बेकार होता है. इतिहासकार के बिना तथ्य मृत और अर्थहीन होते हैं. अतः इतिहास क्या है इस प्रश्न का मेरा पहला उत्तर यह होगा कि इतिहास, इतिहासकार और उसके तथ्यों की क्रिया प्रतिक्रिया की एक अनवरत प्रक्रिया है, अतीत और वर्तमान के बीच एक अंतहीन संवाद है.”

इसी संवाद का निचोड़ पाने के लिए और तथ्यों को प्रमाण के रूप में प्रत्यक्ष देखने लिए यह आवश्यक है कि लोक कथाओं, साहित्य और संगीत में जीवित उन राजपूत स्त्रियों के प्रति सम्मान प्रत्येक भारतवासी के हृदय में उसी तरह जीवंत हो जिस प्रकार आम्बेर दुर्ग में शिला माता के रूप में देवी विराजमान हैं. वहाँ स्थानीय महिलाएं आज भी पूजा करने आती हैं.

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