ये मुफ़्त का प्रचार पाने और हिन्दुओं को अराजक सिद्ध करने का षड्यंत्र तो नहीं!

पद्मावती फिल्म का ट्रेलर बहुत सम्मोहक है, और मुझे ये फिल्म बहुत बड़ी सुपरहिट लग रही है.

मुझे इसी का अंदेशा भी था इसीलिये इसपर लिखने से बचता रहा!

‘ड्रीम सीक्वेंस’ का जान बूझकर… विवाद पैदा करने के लिए… शगूफा छोड़ा गया था ताकि हम भड़कें…

मुफ्त की मार्केटिंग होगी और हिन्दू अराजकता या आतंकवाद जैसा कुछ भी सिद्ध हो जायेगा… एक तीर से कई शिकार…

दरअसल हमारे देश में कई स्तरों पर… कई प्रकार के वैचारिक युद्ध चल रहे हैं…

ये सामान्य जनता के इतने ऊपर हैं कि कई बार उन्हें ये समझाना मुश्किल हो जाता है कि एक सामान्य सी फिल्म का इतना विरोध क्यों?

मैंने आखिरी बार किसी फिल्म का विरोध किया था… तो वो थी ‘पीके’…

उसमें कई सामान्य लोगों से बहस की, फेसबुक पर उनकी ‘समझ’ समझने की घंटों कोशिश की… पर असफल रहा… फिल्म सुपरहिट हो गयी…

तब से सोच लिया कि फिल्मों का विरोध करना समाधान नहीं बल्कि उस प्रोड्यूसर के ‘गाला डिनर’ में ‘गाजर मूली’ बन जाना है… जो सलाद उसने जान बूझ कर ‘सर्व’ किया है.

वैचारिक युद्धों को सड़कों पर लड़ना ठीक वैसे ही है जैसे ‘गेस्ट्रिक पेन’ को ‘हार्ट पेन’ समझकर बाईपास करवा लेना…

ये बहस अनंत है और रहेगी… कुछ लोग हमेशा इसे गेस्ट्रिक पेन समझेंगे और हार्ट पेन समझने वालों की खिल्ली उड़ाएंगे…

वहीं हमें ये भी नहीं भूलना चाहिए कि कुछ लोग ऐसे भी हैं जो सचमुच के गेस्ट्रिक पेन को हमेशा हार्ट पेन बताकर ‘फियर साइकोसिस’ पैदा करते रहेंगे ताकि उनकी एंजियोग्राफी की दूकान चलती रहे.

पूरा पद्मावती विवाद बड़ा रोचक है… इसमें कोई भी पक्ष नुकसान में नहीं दिख रहा… भंसाली जहाँ करोड़ों के मुनाफे में में खेलने वाले हैं, साथ ही रिलीज़ से पहले लिबरल समुदाय के ‘जीसस’ बन बैठे हैं जिसे सूली पर चढ़ाया जा रहा है… इससे ज्यादा एक वामपंथ प्रभावित बम्बइया व्यापारी ने और क्या चाहा होगा.

दूसरी ओर कर्णी सेना ने अपनी दुकान देश के हर गाँव कसबे में सजा ली… राजपूतों को आज़ादी के बाद पहली बार ‘एक’ कर लिया जिसकी कई दशकों से कोशिश की जा रही थी.

अपने आस पास देखिये… इस विवाद में सबसे ज्यादा सक्रिय वे तथाकथित राजपूत भाई हैं जिन्हें सनातन धर्म या देश के किसी मुद्दे पर पहले कभी बोलते नहीं देखा… वे आज ‘जय राजपुताना’ के उद्घोष करते दिख रहे हैं…

ऐसे लोगों को थोड़ा चिढ़ाने का भी मन होता है… कि बंधु, रानी पद्मिनी सिर्फ राजपूतों की शान नहीं है… इस मिट्टी में पैदा हुए हर हिंदुस्तानी की शान हैं… इसलिए हमें क्यों इससे अलग कर रहे हो?… जय राजपुताना के बाद… वन्दे मातरम लगाना मत भूलो.

खैर, समस्या ये है कि चाहे ये हार्ट पेन हो या गेस्ट्रिक पेन… इसका इलाज सही डॉक्टरों द्वारा होना चाहिए, ना कि नुक्कड़ के नीम हकीमों द्वारा…. हिन्दुओं को बम्बइया दुकानदारों की ‘गाजर मूली’ बन जाने से रोका जाना चाहिए…

अगर इस लोकतंत्र में बहुसंख्यक आबादी सिर्फ ‘निहत्थी भीड़’ है… जिसकी संवेदनाएं कभी भी किसी के भी द्वारा पैरों तले कुचली जा सकती हैं तो हमें बहुत जल्द एक थोपे हुए गृह युद्ध के लिए तैयार रहना चाहिए…

एक व्यवस्थित कानून सम्मत तंत्र के तहत ऐसे कुत्सित प्रयास नहीं रुके तो बम्बइया भांड बाजीराव को आशिक सिद्ध करते रहेंगे… इधर कर्णी सेना जैसी संस्थाएं स्थापित होती जाएँगी… और उनकी अराजकता के पीछे एक भारी भरकम ‘रीज़निंग’ भी होगी जिसकी काट किसी के पास नहीं होगी.

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