The Imitation Game के बहाने : गीता उपदेश

कंप्यूटर और नेटवर्क के जरिये आज की दुनिया जैसे चलती है इसका निर्माण करीब सौ साल पहले शुरू हुआ था.

अगर कभी ब्लैकबेरी के सरकारों को कूट भाषा में रखी जानकारी ना देने, एप्पल-फेसबुक जैसी कंपनियों के जानकारी बेचने, आधार कार्ड और निजता-गोपनीयता के अधिकारों की बहस सुनी देखी हो तो आप डाटा एन्क्रिप्शन (Data encryption) के बारे में सुन चुके हैं.

आपको पता है कि व्हाट्स-एप्प और दूसरे ऐसे सन्देश भेजने के माध्यमों में भी आपके भेजे सन्देश को किसी तरीके से कूट-भाषा में बदलते हैं, ताकि बीच में ही हैकर उसे चुरा ना सके.

अप्रासंगिक हो चले रूस सहित, चीन-अमेरिका जैसे कई देशों की सरकारें ऐसे कूट को तोड़ने समझने के लिए कंपनियों पर दबाव बनाये रखती है.

सोशल मीडिया, ईमेल सन्देश जैसी संवाद-संचार की जो प्रणाली है वो विश्व युद्ध के दौर बननी शुरू हुई थी.

सेनाएं अपने गुप्त सन्देश भेजती और शत्रुओं की गुप्त सूचनाओं को पढ़ने की भी कोशिश करती.

ब्रिटेन में उसी दौर में कंप्यूटर का विकास हुआ, क्रिप्टोग्राफी जैसे विषय पढ़े-सीखे जाने लगे और उसी से धीरे धीरे आज की हमारी कंप्यूटर की दुनिया बनी.

इन सबके निर्माण के पीछे एलन टूरिंग (Alan Turing) नाम के ब्रिटिश वैज्ञानिक का बहुत बड़ा योगदान था.

विज्ञान और गणित से जुड़े विषय कठिन और उबाऊ होंगे, कुछ क्रिप्टोलोजी गुप्त रखने की ही विद्या है, इन वजहों से ऐसे विषय पर भारत में फ़िल्में नहीं बनती.

इन पर अंग्रेजी फिल्म बनना भी मुश्किल ही होगा क्योंकि एलन टूरिंग समलैंगिक भी थे.

इसी एलन टूरिंग पर लिखी एंड्रू हॉज्स (Andrew Hodges) की किताब पर आधारित अमेरिकी फिल्म ‘द इमीटेशन गेम’, 2014 में आई थी.

इसे कई ऑस्कर के लिए नामांकित किया गया, एक ऑस्कर के अलावा दूसरे भी पुरस्कार मिले. व्यावसायिक रूप से भी ये काफी हिट फिल्म थी.

इसकी कहानी सन 1951 में एक गणितज्ञ के घर शुरू होती है जहाँ कुछ पुलिसकर्मी पूछ-ताछ के लिए आये होते हैं. उसके घर चोरी की कोशिश हुई होती है और पूछ-ताछ में पता चलता है कि दस साल पहले, ये गणितज्ञ, ब्लेचली पार्क में काम करता था. अब ये अपनी पूरी जीवन गाथा सुना रहा होता है.

बोर्डिंग स्कूल में दूसरे छात्र (1927 में) एलन को परेशान करते होते हैं और उसकी दोस्ती वहीँ क्रिस्टोफर से हो जाती है. वो क्रिप्टोग्राफी में एलन की रूचि जगा देता है, और एलन को पसंद आने लगता है. क्रिस्टोफर की अचानक टी.बी. से मौत हो जाती है.

जब 1939 में ब्रिटेन जर्मनी से युद्ध की घोषणा करता है तो एलन, कमांडर एलेस्टर डेनिसटन (Alastair Denniston) के निर्देशन में ब्लेचली पार्क में चल रही क्रिप्टोग्राफी की टीम के काम में शामिल हो जाता है.

हूघ एलेग्जेंडर, जॉन केयर्नक्रॉस, पीटर हिल्टन, कैथ फरमन और चार्ल्स रिचर्ड्स जैसों की ये टीम उस कोड को तोड़ने की कोशिश कर रही थी जिस से नाज़ी अपनी एनिग्मा मशीन के सन्देश भेजते थे.

एलन का किरदार हाल में ही शर्लाक होम्स का किरदार निभाने वाले बेनेडिक्ट ने निभाया है. जिसके साथ काम करना मुश्किल हो, जो खुद को महान किस्म का और बाकी सबको तुच्छ माने, ऐसे एलन का किरदार भी इस फिल्म की ख़ास बात है.

कमांडर एलेस्टर डेनिसटन जब कोड तोड़ने वाली मशीन के लिए फण्ड देने से मन करता है तो एलेन प्रधानमंत्री चर्चिल को चिट्ठी लिख देता है और इस तरह एनिग्मा का कोड तोड़ने वाली टीम का काम चर्चिल, एलन को दे देते हैं.

अख़बारों में मुश्किल क्रॉसवर्ड के जरिये वो नए लोगों की टीम जुटाना शुरू करता है. यहाँ कैंब्रिज की एक ग्रेजुएट लड़की, जोन क्लार्क उसे मिलती है, जो उसके हर टेस्ट को पास कर जाती है.

पुरुष सत्तात्मक, ब्रिटिश इसाई समाज की इस लड़की के माँ-बाप नहीं चाहते थे कि लड़की पुरुषों के साथ काम करे, लोग क्या कहेंगे जैसे कई सवाल थे। आखिर एलन ये इंतजाम करता है कि लड़की, महिला क्लर्कों वाले हिस्से में ऑफिस में बैठे और काम कर सके.

ऐसी ही तरह तरह की मुश्किलों, फण्ड की कमी और डेनिसटन के एनिग्मा मशीन का कूट तोड़ने वाली मशीन बनाने की योजना को ध्वस्त करने की कोशिशों के बीच समाज से कटा सा एलन, जोन क्लार्क के साथ मशीन बनाने में जुटा होता है.

इसी बीच उसे समझ में आने लगता है कि वो समलैंगिक है. इसी वजह से स्कूल के दौर में उसे क्रिस्टोफर पसंद था, अब भी उसकी शारीरिक रूचि जोन क्लार्क में कम ही थी.

वो एक साथी क्रैनक्रॉस को अपने समलैंगिक होने के बारे में बताता है. इसाई मजहब और स्थानीय कानूनों में प्रतिबंधित इस भयावह जुर्म के बारे में क्रैनक्रॉस उसे चुप्पी साध लेने कहा है.

एक दिन उसे सूझता है कि जिन संदेशों में उसे पता है कि क्या लिखा गया, उनके जरिये क्या वो एनिग्मा का कोड तोड़ सकता है? अब एलेन कामयाब होने लगता है.

एलेन को ये भी समझ आ जाता है कि अगर उसने एनिग्मा का हर कोड सन्देश तोड़ा तो जर्मन समझ जायेंगे कि उनका कोड तोड़ लिया गया है और मशीन बदल देंगे.

इसी बीच उसे ये भी समझ आता है कि जिस साथी क्रैनक्रॉस को वो अपना दोस्त मान रहा था वो सोवियत जासूस है.

वो क्रैनक्रॉस की पोल खोलना चाहता है लेकिन क्रैनक्रॉस कहता है कि सोवियत भी तो उन्हीं जर्मनों को हराने में लगे हैं, वो तो साथी हैं! ऊपर से एलेन का समलैंगिक होने का राज भी उसके पास था.

उस वक्त तो एलेन चुप लगा जाता है मगर जब एम.आई. सिक्स वाले जोन क्लार्क को धमकाते हैं तो वो राज उगल देता है. लड़की को बचाने के लिए वो उसे अपना समलैंगिक होना भी बता देता है और ब्लेचली पार्क के काम से दूर भी हो जाने कहता है.

युद्ध ख़त्म होने पर क्रिप्टोग्राफर्स का सारा काम नष्ट कर दिया जाता है और राज़ राज़ ही रहे इसलिए वो कभी एक दूसरे से भविष्य में ना मिलें, ये सुनिश्चित किया जाता है.

एलेन पर 1950 के दशक में समलैंगिकता के कारण मुकदमा हुआ और उसे जेल के बदले नपुंसक होने की सजा दी गई. रासायनिक तरीकों से उसका बंध्याकरण कर दिया गया.

अंत में गिरती शारीरिक और मानसिक अवस्था में उस से जोन क्लार्क मिलने आती है, वो उसे तसल्ली देती है कि उसके काम से लाखों लोगों की जिन्दगी बचायी जा सकी है.

कुछ लोगों ने विज्ञान और गणित से जुड़ी होने की वजह से, कुछ ने अच्छी स्क्रिप्ट के लिए और कई लड़कियों ने बेनेडिक्ट के लिए ये फिल्म देखी होती है. इसकी कहानी से हम आपको भगवद्गीता के दूसरे अध्याय में तीसरे श्लोक पर ले चलते हैं :

क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप।।2.3।।

मोटे तौर पर यहाँ श्री कृष्ण समझा रहे हैं अर्जुन कायर मत बनो. यह तुम्हारे लिये अशोभनीय है. यहाँ अर्जुन के एक दूसरे नाम पार्थ का इस्तेमाल, बैकग्राउंड रिफरेन्स जैसा है.

युद्ध शुरू होने से पहले कुंती की दुविधा थी युद्ध में कुशल होने पर भी, क्या मेरे बेटे लड़कर अपना हक़ लेंगे? ये याद दिलाया जा रहा होता है तुम पृथानन्दन हो, माँ की इच्छाओं को पूरा करना तुम्हारा धर्म है. क्लीव जो शब्द यहाँ इस्तेमाल हुआ है वो ज्यादातर नपुंसक के अर्थ में बताया जाता है.

क्लीव का एक अर्थ क्रॉस ड्रेसर जैसा भी होगा, जो कि होता तो कुछ और है, लेकिन खुद को दिखाना कुछ और चाहता है. ये फिल्म के एलन जैसा चरित्र है जो लड़की से प्यार दर्शा के उस से कोड तुड़वाना चाहता है, जबकि असल में उसे लड़की से प्यार-व्यार कुछ नहीं. सोवियत एजेंट की पोल खोले, या उसे भी अपना साथी माने, उसके लिए ये भी एक दुविधा है। ये अर्जुन की शुरूआती दुविधा है :

येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च।
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च।।1.33।।
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः।
मातुलाः श्चशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा।।1.34।।

अर्जुन व्यथित हो रहा था कि जिनके लिये सब सुख-सुविधाएँ जुटाई जाती हैं, वही सब तो ऐसी राज-पाट जैसी कामना त्याग कर युद्ध में खड़े हैं. उनमें कोई गुरु, कोई चाचा-मामा, भतीजे-पोते तो कोई दूसरे रिश्ते-नाते के लोग ही तो हैं.

यहाँ अर्जुन की समस्या ये कतई नहीं है कि वो किसी को मारे कैसे. बिलकुल वैसे ही जैसे एलन की समस्या ये नहीं कि सोवियत जासूस को मरने दे या नहीं. उसके किये से लोग मर ही रहे हैं. उसकी दिक्कत है कि अपनी पहचान वाले, अपने साथी को पकड़वाए या नहीं. जब लड़की की बात आती है तो ज्यादा प्रिय कौन है ये भी फ़ौरन तय हो जाता है.

यही आपको यहाँ तक की भगवद्गीता में भी दिखेगा. धर्म की ओर खड़े लोगों वाली ही अपने-पराये की ये समस्या अर्जुन के लिए है. पहले ही श्लोक में धृतराष्ट्र बिलकुल स्पष्ट हैं. उनके लिए अपने और पराये का भेद साफ़ है :

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय।।1.1।।

यहाँ जब धृतराष्ट्र पूछते हैं तो वो बिलकुल स्पष्ट फर्क कर रहे हैं कि मेरे (मामकाः) और पांडु के पुत्रों (पाण्डवाश्चैव) ने क्या किया?

धार्मिक लोगों के लिए ये समस्या रहती है, आपका अधिकार छीनने के लिए आये लोगों को स्पष्ट पता है कि अपना कौन है पराया कौन है. आप “वसुधैव कुटुम्बकम्” जपते ‘सब तो अपने ही हैं’ के पशोपश में ना रहें, सही-गलत में ही नहीं, एक सही और दूसरे सही के बीच बेहतर कौन है उसका चुनाव कर सकें, भगवद्गीता ये भी सिखाती है.

बाकी ये जो हमने धोखे से पढ़ा डाला वो नर्सरी लेवल का है. पीएचडी के लिए आपको खुद ढूंढ कर पढ़ना पड़ेगा, ये तो याद ही होगा?

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