पांच हज़ार साल तक प्रकृति की मार सहती रही वो स्याही

इसकी शुरुआत तब हुई जब मैंने एक शैलचित्र की इमेज देखी. बड़ा ही दिलचस्प शैलचित्र. इसे साइबेरिया के खाकास्या में खोजा गया है.

कार्बन डेटिंग बता रही है कि इसे (5000-8000) ईसा पूर्व बनाया गया था. ये शैलचित्र शोधकर्ताओं और गूढ़ लिपि पढ़ने वालों के लिए अबूझ पहेली बना हुआ है.

मेरी इसमें दिलचस्पी की वजह इस शैल चित्र का आर्कटिक वृत (आर्कटिक सर्कल) में पाया जाना है.

ये वही ठंडा रेगिस्तान है जिसके बारे में महान खोजी/ इतिहासकार/ खगोल शास्त्री/ लेखक/ राजनीतिज्ञ बाल गंगाधर तिलक ने अपनी ऐतिहासिक किताब ‘द आर्कटिक होम इन वेदाज़’ में उल्लेख किया है.

आर्कटिक (3000 -5000 ईसा पूर्व) मृग नक्षत्र काल में एक अज्ञात ‘देव पुरुष’ ने वेदों का ज्ञान कहा था और कुछ विवेकवान दिव्य मानवों ने उसे ‘सुना’ था.

उस अमूल्य थाती को सूत्र में बाँधने के लिए ‘संगीत’ का उपयोग किया गया.

लिपिबद्ध होने से सैकड़ों साल तक तो वेद पीढ़ी दर पीढ़ी लोकसंगीत की स्वर लहरियों पर यात्रा करते रहे.

क्या सुंदर काल रहा होगा वो. जैसे मृग नक्षत्र की अनुपम दिव्यता भूमि में आच्छादित हो गई थी.

विवेकवान दिव्य मानवों ने हृदय और भाव से वेदों को अंगीकार किया और तभी वे लिपिबद्ध हो सके.

तिलक जी ने अपनी थ्योरी के पक्ष में ऋग्वेद और अवेस्ता का हवाला दिया है. ऋग्वेद में छः महीनों की रात और छ: महीने के दिन का उल्लेख मिलता है.

आर्कटिक (आर्कटिक सर्कल) 17,662 किलोमीटर (10,975 मील) लंबा है. साइबेरिया इसी क्षेत्र का एक ठंडा प्रदेश है.

इस 17 हज़ार किमी लम्बे क्षेत्र में बीस हज़ार साल से मानव रहते आए हैं. इनुइत यहाँ की सबसे प्राचीन प्रजाति मानी जाती है.

तिलक जी की थ्योरी के अनुसार उत्तरी ध्रुव आर्यों का घर था. (8000-10,000) ईसा पूर्व प्रलय जैसे हालात बने और उन्हें घर छोड़ना पड़ा. इसके बाद वे उत्तरी यूरोप और एशिया में फ़ैल गए.

तिलक जी की ये किताब ‘द आर्कटिक होम इन वेदाज़’ सन 1903 में पुणे में प्रकाशित हुई थी. दुर्भाग्य ये है कि तिलक जी की महान थ्योरी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर छोड़िये, अपने देश में ही मान्यता नहीं मिल सकी है.

कहानी बाकी है…..

आप सोच रहे होंगे शैलचित्र इनमे कहाँ ग़ुम हो गया. इस शैलचित्र के कई विश्लेषण पढ़ने के बाद एक शोध पर निगाह ठहर गई.

बेहद शानदार विश्लेषण लेकिन शोधकर्ता अपना नाम छुपा गया. खोजने पर भी नहीं मिला.

वर्डप्रेस पर ‘ग्रेवेटर’ के नाम से शोध प्रकाशित हुआ था पिछले साल नवंबर में. लीजिये ‘ग्रेवेटर’ महोदय का विश्लेषण प्रस्तुत है.

1- दाहिनी तरफ का वृक्ष विश्व वृक्ष है जो ‘एक्सिस मुंडी’ का संकेत दे रहा है. इसे विश्व का केंद्र माना गया है. सभी धर्मों के ‘दर्शन’ में इस वृक्ष के बारे में कहा गया है कि ये स्वर्ग और पृथ्वी को कनेक्ट करता है. और हम सभी जानते हैं कि हर धर्म के अनुसार पृथ्वी का केंद्र भिन्न है.

2- शोधकर्ता सात सिरों की आकृति को ‘मनसा देवी’ से जोड़कर देख रहा है. मैं उसके पहले तर्क से सहमत हूँ लेकिन दूसरे से थोड़ा असहमत. वह सात सिरों को ‘नाग’ समझकर ऐसा कह रहा है.

मेरे अनुसार ये सात सिर सूरज की सात किरणों का संकेत दे रहे हैं. उस समय में आर्य सभ्यता की उपस्तिथि इस बात पर बल दे रही है. और सभी जानते हैं कि विश्व को सूर्य की सात किरणों का ज्ञान आर्यों ने ही दिया था.

ऊपर वृत्ताकार चिह्न को शोधकर्ता भारत के पर्वों पर लगाए जाने वाले धार्मिक चिन्ह से जोड़ता है, जिससे मैं कुछ हद तक सहमत हूँ. वैसे ये चिन्ह सूर्य का प्रतिनिधित्व करता लग रहा है.

3- सात सिरों वाली आकृति के पीछे जो चिन्ह दिखाई दे रहे हैं, उन्हें शोधकर्ता ब्राह्मी लिपि बता रहा है. यहाँ मैं बेबस हूँ क्योकि ये लिपि मैं नहीं जानता. कोई जानकार हो तो बताए कि जो विश्लेषण किया गया है, कितना सत्य है.

इस शैलचित्र ने श्री तिलक जी की थ्योरी को नए सिरे से प्रासंगिक बना दिया है. यह बौद्धिक स्तर की चित्रकारी किसी साधारण मानव ने तो नहीं की होगी.

हालांकि गुफा काफी दूर साइबेरिया में पाई गई है लेकिन ये भी ध्यान रखने की जरूरत है कि उस काल में मौसम परिवर्तन के चलते बड़ी संख्या में माइग्रेशन हुआ था.

जब ‘नॉन बिलिवर्स’ कहते हैं ‘यूएफओ’ बकवास है तो गुफाओं में शैलचित्र मिलते हैं, खुदाई में मिट्टी के अंतरिक्ष यात्री निकलते हैं.

उस काल में प्राचीन मानवों ने जो देखा/ सीखा/ महसूस किया, वही दीवारों पर उकेरा/ शिल्पों में गढ़ा है.

उन्हें नहीं मालूम था ‘नॉन बिलिवर्स’ नाम की कोई जमात भी होती है. एक गुफा तो मैंने और अम्बुज माहेश्वरी ने रायसेन के जंगलों में खोज निकाली थी.

आर्कटिक की वो ‘पवित्र गाथाएं’ एक गुफा की दीवार ने पुनर्जीवित कर दी है. दीवार पर पहेलीनुमा चित्र बनाने वाला आदिमानव दरअसल ‘विलक्षण मानव’ था.

जो स्याही उसने प्रयोग की है, वो स्याही पांच हज़ार साल तक प्राकृतिक मार सहती रही है. उस चित्रकार ने एक संकेत रख छोड़ा था. वो जानता था कि कई हज़ार साल बाद इसे पढ़ा जाएगा.

और मित्रों ये बताने की जरुरत नहीं है कि कौन इतना ‘बौद्धिक’ था, जो नक्षत्रों की स्थितियों की जानकारी अपने ग्रंथों में दे सकता था.

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