कृण्वन्तो विश्वमार्यम का उद्घोष और सबको एक ही डंडे से हिंदुत्व की ओर हांकने की ज़िद!

श्री श्री रविशंकर पर अपनी बात बढ़ाते हुए कहूँगा कि किसी ने अपने जीवन में आज से कुछ वर्ष पूर्व क्या किया, इससे उसका वर्तमान अथवा भविष्य निर्धारित नहीं होता.

मैं पुस्तकें पढ़ता हूँ ये तो आप जानते ही हैं. तो अपने अनुभव से एक बात बताता हूँ. गत वर्ष मैंने इस पर चिन्तन किया कि बाबरी ढांचा गिरने के बाद मास मीडिया में इस घटना का किस प्रकार चित्रण किया गया.

[पहले अपने घर में धर्म को पुनर्जीवित कीजिये तब उड़ाइए किसी की खिल्ली]

पढ़ने के लिए मैंने 1992 के जमाने की ढेर सारी पुस्तकें जुटायीं. मुझे जानकर आश्चर्य हुआ कि उस समय और उसके कई वर्ष बाद तक लेखक और पत्रकार ‘सेकुलरवाद’ से ही ग्रसित रहे. वे ढांचा गिराए जाने को अनैतिक ही मान रहे थे.

विश्वास कीजिये उसी दौर के लेखक-पत्रकार आज ट्विटर पर हिंदूवादी बने घूम रहे हैं. उनके लेख प्रामाणिक माने जाते हैं और उन्हें बाकायदा टीवी डिबेट में हिन्दुओं के पक्षधर के रूप में प्रस्तुत किया जाता है.

एक-एक कर के बखिया उधेडना प्रारंभ करूँ तो लोग विचलित हो उठेंगे और एक नया हंगामा खड़ा हो जाएगा. परन्तु प्रश्न यह नहीं है कि किसी ने आज से बीस साल पहले कौन सी घुट्टी पी थी. आज का संगठित प्रयास हमें कहाँ ले जायेगा इस पर विचार करने की आवश्यकता है.

यह संभव है कि श्री श्री कभी किसी बहस में ज़ाकिर नाइक का उत्तर न दे पाए हों. इससे उनकी उपयोगिता पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगता.

किसी ने इस पर गौर नहीं किया कि NIA का शिंकजा ज़ाकिर नाईक पर कसा हुआ है, श्री श्री पर नहीं. गर्दन ज़ाकिर की दबोची जाएगी श्री श्री की नहीं.

आप हिंदुत्व को कुछ किताबों में बाँट कर नहीं रख सकते. यह तो इस्लामी तरीका है. विश्व में हिंदुत्व का प्रसार करने में कई संगठनों की भूमिका है. Iskcon से लेकर ईशा फाउंडेशन तक सब अपने तरीके से लगे हैं.

यदि आपको उनका तरीका ठीक नहीं लगता तो यह समझिये कि आपके लिए भगवान ने कोई दूसरा तरीका बनाया है.

जब हम कृण्वन्तो विश्वमार्यम का उद्घोष करते हैं तो वैश्विक परिदृश्य की कल्पना करते हैं. विश्व में कई प्रकार के लोग हैं और उन्हें एक ही डंडे से हिंदुत्व की ओर नहीं हांका जा सकता.

इसके लिए हजारों वर्ष पूर्व आदि शंकर ने मार्गदर्शन किया. सौ वर्ष पूर्व स्वामी विवेकानन्द की आवश्यकता पड़ी थी. महर्षि अरविन्द ने उस समय हिंदुत्व की व्याख्या की जब अंग्रेजी पढ़े लिखे लोग शनैः शनैः ईसाईयत की ओर अग्रसर हो रहे थे.

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात ओशो, महर्षि महेश योगी, जैसे कई गुरु आये जिन्होंने उस कालखंड के हिसाब से विदेशियों का परिचय हिंदुत्व से करवाया. आलोचना का शिकार उन्हें भी होना पड़ा था लेकिन इससे उनकी उपयोगिता समाप्त नहीं हुई.

आज भूमंडलीकरण के दौर में श्री श्री रविशंकर, जग्गी वसुदेव भी यही कर रहे हैं. इन्होंने मॉडर्न हो चुके युवाओं को उनकी कॉर्पोरेट भाषा में हिंदुत्व समझाया है. आज की यही आवश्यकता है.

आज से तीन वर्ष पूर्व मैं भी सेकुलर कीड़ा हुआ करता था. मेरी पुरानी पोस्ट पढ़िए मैं आपको रावण के गुण गाता दिख जाऊंगा. परन्तु मैंने खुद को बदला. यह बदलाव एक दिन में नहीं आया. बहुत सी पुस्तकें पढ़ीं, लोगों से मिला, उनके अनुभव जाने तब मेरी सोच में परिवर्तन आया. याद रखें कि प्रकृति परिवर्तनशील है और हिन्दू प्रकृति का पुजारी है.

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