पहले अपने घर में धर्म को पुनर्जीवित कीजिये तब उड़ाइए किसी की खिल्ली

श्री श्री की खिल्ली उड़ाना उचित नहीं. वे क्या हासिल कर पाते हैं मुद्दा ये नहीं है.

हर पहल के दो पहलू होते हैं. एक अच्छा एक खराब.

कोई मुरारी बापू की खिल्ली उड़ाता है तो कोई श्री श्री रविशंकर की.

ये तरीका सही नहीं है.

आज के समय में कोई भी spiritual leader कहलाने वाला व्यक्ति स्कूल, कॉलेज, अस्पताल चलाता है.

लोक कल्याण के बहुत से ऐसे काम करता है जो सरकारें नहीं कर सकतीं. इससे हिंदुत्व परोक्ष रूप से मजबूत होता है. ये एक पक्ष है.

दूसरी बात ये कि हिन्दू धर्म पर प्रहार करने वालों का आक्रमण ‘संगठित’ है. उनका लक्ष्य एक है.

जब वे ‘संघी’ कहते हैं तो इसमें भेद नहीं करते कि आप किस ‘गुरुजी’ के अनुयायी हैं.

हमारा समर्थन भी संगठित होना चाहिए. मेरा समर्थन भगवा ध्वज को है. जो इसे थामने में हाथ लगाएगा वो सही है.

मेरे लिए मोदी, भाजपा, संघ, शंकराचार्य, श्री श्री, जग्गी वासुदेव गुरु, रामदेव, अखाड़ा सब सही हैं. क्योंकि मुझे पता है कि हिंदुत्व के शत्रु कौन हैं और उनकी रणनीति क्या है.

मैं भावनात्मक धाराओं में नहीं बहता. मुझे रणनीतिक चिन्तन करने वाले लोग चाहिए.

श्री श्री की पहल एक जरुरी कदम था. कल को मुसलमान ये नहीं कह सकते कि आपने तो बातचीत की कड़ी ही तोड़ दी थी.

श्री श्री की पहल ने शिया-सुन्नी का मतभेद भी सामने ला दिया.

जो लोग ये कहते हैं कि अब तक केवल बातचीत ही हो रही है उन्हें यह समझना चाहिए कि आज का समय 1992 नहीं है.

बातचीत की निरर्थकता में वातावरण बनाने की सार्थकता देखने की आवश्यकता है.

पूछिए अपने बच्चों से. वे अयोध्या के बारे में क्या जानते हैं? आपने उन्हें क्या बताया है? उनकी क्या राय है? वे श्रीराम के बारे में क्या सोचते हैं? पहले अपने घर में धर्म को पुनर्जीवित कीजिये तब किसी की खिल्ली उड़ाइए.

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